संदेश

नवंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मध्यम मध्यम : पांच :

*पाँच* विद्योत्तमा का सिविल जज के रूप में चयन नहीं हुआ. यह खबर उसे प्रेस में मिल गयी. खबर पढ़ते ही उसका दिल डूबने लगा. उसने खुद से पूछा, 'क्या मैं जज बनाने के काबिल नहीं?' शाम को प्रेस से छुट्टी मिली, वह अपनी दूकान गयी. उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर पापा ने पूछा, 'क्या बात है? आज बहुत उदास दिख रही है.' 'पापा, मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ.' 'अरे, कैसे?' 'क्या पता?' 'फिर?' 'अभी मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है. बाद में देखूँगी कि क्या करना है.' विद्योत्तमा ने अपनी रुलाई रोकते हुए कहा. उस रात  विद्योत्तमा  सो न सकी. प्रतियोगिता की तैयारी का परिश्रम, अखबार की नौकरी और संध्या का ब्याह उसकी बंद आँखों में तैरता रहा. बीच-बीच में आंसू बहते और उसके गाल पर लुढ़क जाते. सुबह उसकी आँखें लाल थी. मम्मी ने पूछा, 'बेटा, रात को सोयी नहीं क्या?' 'नींद नहीं आयी मम्मी.' 'क्या इतना दुःख हो गया तुझे?' 'नहीं होना चाहिए?' 'होना चाहिए लेकिन इतना नहीं होना चाहिए.' 'मम्मी, मेरा सपना टूट गया.' कहते हुए वह रो प...