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*पाँच*


विद्योत्तमा का सिविल जज के रूप में चयन नहीं हुआ. यह खबर उसे प्रेस में मिल गयी. खबर पढ़ते ही उसका दिल डूबने लगा. उसने खुद से पूछा, 'क्या मैं जज बनाने के काबिल नहीं?'

शाम को प्रेस से छुट्टी मिली, वह अपनी दूकान गयी. उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर पापा ने पूछा, 'क्या बात है? आज बहुत उदास दिख रही है.'
'पापा, मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ.'
'अरे, कैसे?'
'क्या पता?'
'फिर?'
'अभी मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है. बाद में देखूँगी कि क्या करना है.' विद्योत्तमा ने अपनी रुलाई रोकते हुए कहा.

उस रात विद्योत्तमा सो न सकी. प्रतियोगिता की तैयारी का परिश्रम, अखबार की नौकरी और संध्या का ब्याह उसकी बंद आँखों में तैरता रहा. बीच-बीच में आंसू बहते और उसके गाल पर लुढ़क जाते. सुबह उसकी आँखें लाल थी. मम्मी ने पूछा, 'बेटा, रात को सोयी नहीं क्या?'
'नींद नहीं आयी मम्मी.'
'क्या इतना दुःख हो गया तुझे?'
'नहीं होना चाहिए?'
'होना चाहिए लेकिन इतना नहीं होना चाहिए.'
'मम्मी, मेरा सपना टूट गया.' कहते हुए वह रो पड़ी.
'सब सपने सच नहीं होते बेटी.' मम्मी ने समझाया.
'तो क्या सपने नहीं देखना चाहिए?'
'हो सकता प्रयास कमजोर रहा हो.'
'मैंने बहुत मेहनत की थी मम्मी.'
'मैंने देखा है तुम्हें रात-रात भर जागकर पढ़ते हुए.'
'फिर, फिर क्या मिला मुझे?'
'सफलता मिली .'
'क्या यह सफलता है?'
'हाँ, सफलता की ओर तेरा एक कदम बढ़ गया.'
'क्या मतलब?'
'इस साल सिलेक्ट नहीं हुई, अगली बार हो जाओगी.'
'आपको कैसे मालूम?'
'मुझे नहीं मालूम लेकिन विद्योत्तमा की मां को मालूम है, वह विद्योत्तमा को अच्छे से जानती है.'
'मेरी मम्मी.' कहते हुए उत्तमा मम्मी से लिपटने के लिए आगे बढ़ी लेकिन रज्जो पीछे हट गयी और बोली, 'रुक बेटा, मेरे हाथ में आटा छपा हुआ है.'
'लगे रहने दो आटा, मैं तो आज प्यार करूंगी अपनी मम्मी से.' विद्योत्तमा ने कहा और मम्मी से कसकर लिपट गयी. दोनों के आंसू बह रहे थे.

प्रेस में ख़ामोशी रही. किसी ने कुछ पूछा नहीं क्योंकि सबको मालूम था कि विद्योत्तमा का चयन नहीं हुआ है. कुछ ऐसे भी थे जो दिखावटी चुप थे लेकिन उनके भीतर विद्योत्तमा के लिए परिहास चल रहा था, 'जज बनेगी...ये मुंह और मसूर की दाल.' ग्यारह बजे बॉस का संदेशा आया, 'सर बुला रहे हैं.'
'विद्योत्तमा, मुझे अफ़सोस हो रहा है.' बॉस बोले.
'मुझे भी समझ में नहीं आ रहा है सर. मार्कशीट आएगी तब समझ में आएगा, आखिर ऐसा कैसे हुआ?'
'चलो, कोई बात नहीं. अगली बार फिर कोशिश करना. तुम अभी यहाँ काम तो करोगी न?'
'जी सर.' उत्तमा ने कहा.

*****

बस्तियां नदियों के किनारे बसती हैं, जबलपुर नर्मदा के तीर बसा. पहाड़ के पत्थरों और तालाबों के इर्द-गिर्द बसा हुआ यह शहर संस्कारधानी है, न्यायधानी है, आध्यात्मधानी है, साहित्यधानी है और खास तौर से नाट्यधानी है. यहाँ के रहवासियों ने अपने शहर अपने ढंग से पाला-पोसा है. इस शहर को अपनी परम्पराओं से बहुत प्यार रहा है, खास तौर से धार्मिक और पारिवारिक रीति-रिवाज़ के प्रति बहुत गंभीर हैं.

विद्याशंकर और रज्जो ब्राह्मण परिवार के हैं इसलिए अन्य हिन्दू परिवारों की तुलना में अधिक कर्मकांडी हैं. घर में प्रतिदिन भगवत-पूजन होता है, भोजन करने के पूर्व भगवान को भोग लगाया जाता है, गौ-माता के लिए ग्रास निकाला जाता है. संध्याकाल में दीप जलाकर भगवान की आरती होती है जिसमें घर में उपस्थित प्रत्येक सदस्य का सम्मिलित होना अनिवार्य होता है. पूजा-पाठ का संचालन घर की बुजुर्ग रत्ना करती हैं.

रत्ना ने अपनी वृद्धावस्था प्रभु की सेवा में अर्पित कर दी है. कोई भी ऋतु हो, भोर होते तक उनका स्नान हो जाता है. उसके बाद वे घर के पास स्थित सभी मंदिरों में भगवान को प्रणाम करने जाती हैं. लौटकर घर में विराजित देवी-देवताओं की मूर्तियों के समक्ष आसन लगाकर मन-ही-मन में संस्कृत के श्लोक उच्चारित करती हुई बैठ जाती हैं. उनके मंदिर में अनेक देवी-देवता हैं. शंकर जी की संगमर्मर से निर्मित मूर्ति है, राधा-कृष्ण और राम-सीता की पीतल की प्रतिमाएं हैं, दुर्गामाता व हनुमान जी के चित्र कांच के फ्रेम में स्थापित हैं. और भी अनेक छोटे-बड़े आराध्य उस छोटे से मंदिर में स्थापित हैं. सब मिला कर दो घंटे का पूजन और ध्यान. गर्मी के दिनों में भगवान को पंखा झलती हैं. ठण्ड के दिनों में रात्रि के समय भगवान की मूर्तियों पर हस्त-निर्मित-लघु-रजाई ओढ़ाती हैं ताकि भगवान को ठण्ड न लगे और वे सुखपूर्वक शयन कर सकें. पूजा अनुष्ठान करते समय रत्ना का सुन्दर मुखड़ा कुछ अलग सी आभा बिखेरने लगता है, उस समय उन्हें देखने पर विशेष प्रकार की ऊर्जा की अनुभव होने लगता है.

कहते हैं कि प्रार्थनाएं ऊपर जाती है और आशीर्वाद सूर्य की किरणों की तरह नीचे आते हैं लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि भगवान से सफलता के लिए की गयी प्रत्येक प्रार्थना सफलीभूत हो ही. मामला फिफ्टी-फिफ्टी रहता है. यदि सफलता मिल गयी तो भगवत-कृपा अन्यथा 'भगवान की इच्छा नहीं है' जैसे नरम भाव से दुखी मन को समझा लिया जाता है. विद्योत्तमा के जज बनने के लिए रत्ना ने भगवान से बहुत अनुनय-विनय किया परन्तु काम सिद्ध नहीं हुआ लेकिन रत्ना का विश्वास डिगा नहीं. उसने अगले प्रयास की सफलता के लिए पूजा-अर्चना का समय और बढ़ा दिया. वे प्रत्येक एकादशी को व्रत रखती थी, अब पूर्णमासी को भी रखने लगी. इसके उलट विद्योत्तमा की छोटी बहन सुगंधा ने संध्याकाल की आरती में सम्मिलित होना बंद कर दिया. वह अपनी दादी की सोच से इत्तेफाक़ नहीं रखती थी. बहस छिड़ गयी.
'क्यों, आरती में क्यों नहीं आती तुम?' रत्ना ने गरजते हुए पूछा.
'दादी, मन नहीं होता.' सुगंधा ने धीरे से उत्तर दिया.
'क्या हो गया तेरे मन को?' दादी ने अपना स्वर बदला.
'आपने विद्योत्तमा के लिए इतनी पूजा की, प्रार्थना की, उपवास रखा लेकिन क्या हुआ?'
'हो सकता है कि विद्योत्तमा की तैयारी कमजोर रही हो.'
'तो भगवान क्या कर रहे थे? उन्होंने मदद क्यों नहीं की?'
'उनको पूरा संसार देखना पड़ता है बिटिया. करोड़ों की दुनिया, उनके करोड़ों काम. कहाँ-कहाँ देखें?'
'तो फिर इंसान और भगवान में फर्क क्या हुआ? कम-से-कम भगवान से चूक तो नहीं होनी चाहिए.'
'ऐसी कैसी बात करती है भगवान के बारे में? उनके काम में खोट निकालती है, नास्तिक हो गयी है क्या?'
'आस्तिक-नास्तिक मैं नहीं जानती दादी. मैं यह जानती हूँ कि जितनी गलती दीदी से हुई, उतनी ही गलती भगवान की भी है.'
'अरे, तेरी स्कूल में यही पढ़ाते हैं क्या?'
'स्कूल में हमें यह पढ़ाया जाता है कि मनुष्य को किसी पर भी आँख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए. कोई भी हो, उसे तर्क की कसौटी पर कसना चाहिए.'
'तो क्या भगवान को भी तर्क की कसौटी पर कसेगी?'
'नहीं, भगवान को नहीं पर उनके काम-काज पर प्रश्न किया जा सकता है.'
'फिर हो सकता है कि मेरी प्रार्थना में कोई कमी रह गयी हो.' दादी की आवाज बहुत धीमी हो गयी. 'इस बार पूरे दिल से प्रार्थना करूंगी.'
'ठीक है दादी. मैं शाम की आरती में अब दीदी के सिलेक्ट होने के बाद आऊंगी.' सुगंधा ने अपना मंतव्य बताया.
'ऐसा नहीं बोलते सुगंधा, भगवान का अपमान होता है.'
'अपमान नहीं कर रही हूँ दादी, उनसे सौदा कर रही हूँ.'
'भगवान से सौदा?'
'हाँ, मंदिर में जाकर भक्त कहते हैं न, कि हमारी मनोकामना पूरी हो जाएगी तो आपको प्रसाद चढ़ाएंगे?'
'वो अलग बात है.'
'कैसे अलग बात है? यह भी तो सौदेबाजी है दादी.'
'तू कुतर्क कर रही है.'
'मेरी बात का जवाब नहीं है तो आपने उसे कुतर्क कह दिया?'
'देख, अभी तेरी सवाल करने की उम्र है, ठीक है. लेकिन याद रख, बहुत सी बातें बाद में समझ आती हैं.'
'फिर आप बताओ दादी, मैं क्या करूं?'
'मेरी अकेले की प्रार्थना से काम नहीं चलेगा. हम सबको मिलकर अर्जी लगानी पड़ेगी. क्या तू अपनी बहन के लिए भगवान से नहीं कहेगी?'
'आप जैसा कहो. मैं दीदी के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हूँ.'
'फिर, कल की संध्या आरती में तुम सम्मिलित हो रही हो?' दादी ने पूछा.
'जी, मैं भी आपके साथ मिलकर जोर लगाती हूँ.' सुगंधा ने हंसते हुए कहा. 

घर के वरांडे में धूप बिखरी हुई है. ठण्ड के दिनों में धूप सुखद लगती है. रत्ना की पूजा-अर्चना का काम संपन्न हो गया है. बेंत से बनी गोल कुर्सी पर आँखें मूंदे बैठी हुई नास्ता का इंतज़ार कर रही है. रज्जो पराठा सेंक रही है. भीनी-भीनी खुशबू फ़ैल रही है. रत्ना ने आवाज़ लगाई, 'बहू, पराठा के साथ खाने के लिए चटनी बनाई हो क्या?'
'घर में टमाटर नहीं हैं अम्मा जी.' रज्जो ने रसोईघर से काम करते हुए जोर से कहा.
'तो मंगवाई नहीं?'
'कही तो थी लेकिन...'
'कोई बात नहीं, आम का अचार दे देना.'
'जी, अम्मा जी.' रज्जो स्टील की प्लेट में नास्ता लेकर आई. 'अपने लिए भी नास्ता यहीं  ले आओ.' रत्ना ने रज्जो से कहा. सास-बहू नास्ता करने लगी. रत्ना ने खाते-खाते पूछा, 'विद्योत्तमा के लिए क्या सोचा?'
'हमारे सोचने के लिए कुछ बचा है क्या?' रज्जो ने कहा.
'ऐसा क्यों कहती हो?'
'क्या करें? वह जिद में अड़ी है कि उसे जज बनना है. जज बन जाए तब कुछ आगे सोचें.'
'न बनी तो?'
'अभी उसने हार नहीं मानी है.'
'संध्या का क्या हाल है?'
'कल रात को फोन आया था, मज़े में है.'
'भोले भंडारी की कृपा बनी रहे.'
'आजकल भोले भंडारी हम लोगों से नाराज चल रहे हैं.'
'ऐसे बोल अपने मुंह से क्यों निकालती हो बहू?'
'देखो न अम्माजी, विद्योत्तमा जज नहीं बनी और उधर उसके पापा सिविक सेंटर में एक दूकान का सौदा किये  थे. शादी में पैसा खर्च हो गया इसलिए रजिस्ट्री नहीं हो पा रही है. बेचने वाले ने सौदा केन्सिल करने की धमकी दी है.'
'कितना कम पड़ रहा है?'
'डेढ़ लाख.'
'मैं देखती हूँ, मेरे पास कितना है, शाम को बताउंगी.'
'ठीक है अम्मा जी.' रज्जो ने कहा.

दोपहर को विद्याशंकर घर आये. भोजन के समय रज्जो ने सुबह वाली बात बतायी. विद्याशंकर दुखी हो गये, 'अम्माजी से क्यों कहा?'
'क्यों नहीं कहना था?' रज्जो ने पूछा.
'उनके पास कौन सा धन गड़ा हुआ रखा है? जीवन भर बेचारी तकलीफ में रही हैं.'
'पर वो कह रही थी कि उनके पास है.'
'हो सकता है लेकिन अपनी ज़रूरत भर शायद हो.'
'जितना भी होगा उसमें कुछ मैं मिला दूंगी. जो कम पड़ेगा, मेरे गहने बेच देना.'
'तुम गहने बेचने की बात मुझसे मत किया करो.'
'तो क्या हुआ? जब कमाना तो नए बनवा देना.' रज्जो की वाणी में आत्मविश्वास झलक रहा था. विद्याशंकर सकुचा गए. भोजन समाप्त करके अपनी थाली उठायी और मांजने के लिए बाहर आँगन में रख दिया. गमछा से अपना मुंह पोछते हुए बोले, 'अपनी तनख्वाह का पैसा विद्योत्तमा ने बैंक में जमा किया है, उससे भी उधार ले लूँगा. देखो, शायद काम बन जाए!'

रात के समय सब भोजन करने बैठे. रोटी, दाल और आलू-गोभी की टमाटर डालकर सब्जी बनी थी. विद्योत्तमा रोटी बेल रही थी, रज्जो तवे पर सेंक रही थी और सुगंधा परोस रही थी. सब चुप थे. रत्ना ने भोजन समाप्त किया अपने हाथ धोये और बाहर बैठक में आकर तखत पर बैठ गयी. 'बहुत मिर्ची थी आज सब्जी में, हमारा मुंह भरभरा गया.' रत्ना बोली, 'कोई मिठाई है घर में ?'
'मिठाई तो नहीं है, गुड़ ला दें दादी?' सुगंधा ने कहा.
'ले आओ, तनिक चैन पड़े.'
'अभी लायी.'
'विद्याशंकर, आज रज्जो बता रही थी कि दूकान के सौदे में कुछ परेशानी है?'
'हाँ अम्मा, पैसा कम पड़ रहा है.' विद्याशंकर ने उत्तर दिया.
'हमारे पास बत्तिस हजार है, उसमें से तीस हजार हम दे देंगे. दो हजार अपने पास रखेंगे, रिश्तेदारी में देना-लेना पड़ता है.'
'जैसा उचित समझो अम्मा.'
'दादी सास का एक सोने का करधन हमारी सास ने हमें दिया था, बहुत वजनदार है, वह भी रखा हुआ है. सराफे में मगन-मन्नू की दूकान में चले जाओ, उसको गलवा कर सोना बनवा लो. आधा हमें वापस कर दो क्योंकि वह प्रभुशंकर के हिस्से का है, बाकी बेच दो और जो पैसा मिले उसको दूकान खरीदने में लगा दो.' रत्ना ने कहा. विद्याशंकर और रज्जो एक दूसरे का चेहरा देखते रह गए. रज्जो ने हस्तक्षेप किया, 'अम्मा जी, करधन पुश्तैनी है, हमारे बुजुर्गों के निशानी है, उसे मत बेचिए. मेरे पास गहने हैं, मैंने इनसे कहा है कि मेरे गहने बेच दें.'
'अपने गहने अभी मत बेचो, तुम्हें तीन बच्चे और ब्याहने को हैं. मैं तो अकेली बहू थी इसलिए यह करधन अक्षत रह गया लेकिन अब इसके टुकड़े होने का समय आ गया क्योंकि इसके दो दावेदार है, तुम और तुम्हारी देवरानी. आज तुम लोगों को पैसे की ज़रुरत है तो इसका उपयोग कर लो. वह कैसा सोना जो ज़रुरत पर काम न आए?' रत्ना ने समझाया.

* * * * * 

सब जोड़-जाड़ कर पैसा इकठ्ठा हो गया और विद्याशंकर को सिविक सेंटर में दूकान मिल गयी. एक शुभ मुहूर्त में पूजन के पश्चात दूकान वहां स्थानांतरित हो गयी. इस दूकान से विद्योत्तमा का प्रेस नज़दीक हो गया इसलिए आने-जाने में सुविधा हो गयी और समय भी बचने लगा. इस बीच विद्योत्तमा की नज़दीकी विवेक के साथ बढ़ गयी. विवेक प्रेस में सहायक सम्पादक के पद पर काम कर रहा था, उत्तमा से दो साल सीनियर था. साथ-साथ काम करते हुए दोनों अक्सर एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते.
'आपकी हैंड-राइटिंग बहुत खूबसूरत है.' एक दिन विवेक ने कहा.
'सच?'
'हूँ.'
'और क्या खूबसूरत है?'
'यहाँ, आफिस में आपके लेख और हस्तलिपि की प्रशंसा कर सकता हूँ.'
'कुछ और भी बताने को है क्या?'
'है.'
'कब बताएंगे?'
'कल सुबह इन्डियन काफी हाउस में आइए, ठीक नौ बजे, साथ में नास्ता करेंगे और मैं आपकी खूबसूरती के बारे में कुछ और बताऊंगा. रात भर में रिहर्सल भी कर लूँगा.'
'इतना लम्बा है कि रिहर्सल करना पड़ेगा?'
'किसी से पहली बार कुछ कहना है तो शब्दों का चयन और आवाज़ का वजन सही होना चाहिए न.' विवेक ने कहा. अगली सुबह नौ बजे का प्रोग्राम पक्का हो गया.

*****

सुबह विद्योत्तमा ने मम्मी से कहा, 'आज मैं नास्ता नहीं करूंगी, केवल टिफिन ले जाऊँगी.'
'क्या हुआ? नास्ता क्यों नहीं कर रही?' रज्जो ने पूछा.
'एक दोस्त है मेरा, प्रेस में. आज उसने नास्ते पर बुलाया है.' 
'कहाँ जा रहे हो तुम लोग नास्ता करने?'
'काफी हाउस में.'
'कितने साल हो गए मुझे जबलपुर आये लेकिन मैं कभी यहाँ के काफी हॉउस में नहीं गयी. इलाहाबाद में मेरे पापा मुझे सिविल लाइंस वाले काफी हाउस में ले जाया करते थे. यू नो? मुझे डोसा बहुत पसंद है.'
'तो पापा से कहती क्यों नहीं? वो ले जाएंगे.'
'अम्माजी का डर लगता है, उन्हें मालूम पड़ेगा तो गुस्सा होंगी.'
'उनको बताने की ज़रुरत क्या है? चुपचाप जा सकती हो.'
'नहीं. ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिसे किसी से छुपाना पड़े.'
'बात तो सही है मम्मी.'
'अगर हम छुपा रहे हैं तो इसका मतलब है कि हमारा दिल उस काम को करने की अनुमति नहीं दे रहा है, फिर भी हम कर रहे हैं.'
'जी.'
'जी क्या? जल्दी निकल. नौ बजने वाले हैं.' रज्जो ने टिफिन देते हुए कहा. विद्योत्तमा ने मम्मी गाल पर चुम्बन की छाप छोड़ी और अपनी सायकल लेकर काफी हाउस के लिए निकल पड़ी.

*****

'आपके घर में कौन-कौन हैं?' विवेक ने प्रश्न किया.
'मेरी दादी, मम्मी, पापा और दो भाई-बहन. मुझसे छोटी बहन की शादी हो गयी॰'
'आप सबसे बड़ी हैं?'
'जी हाँ.'
'कोई बता रहा था कि आप सिविल जज की तैयारी कर रही हैं?'
'हाँ, एक कोशिश बेकार गयी, फिर से लगूंगी तैयारी में.'
'अखबार की नौकरी भी अच्छी है.'
'बेशक, यह भी जन-सरोकारी काम है लेकिन मेरे सिर पर क़ानून का जूनून सवार है. जज न बन सकी तो वकालत करूंगी.'
'और वकालत न चली तो?'
'जज बनूंगी.' विद्योत्तमा ने कहा और दोनों हंस पड़े. दूर की टेबल में बैठे लोग इनकी ओर देखने लगे.
'अच्छा यह बताओ, आज यहाँ क्या कहने के लिए बुलाया था?' विद्योत्तमा ने पूछा.
'मैंने बुलाया आपको?'
'अरे, बुलाकर भूल गये?'
'सच में, मैं भूल गया. क्यों बुलाया था?'
'सुंदरता की कुछ और बातें बताने के लिए. रात को रिहर्सल की थी या नहीं?'
'बहुत सिर खपाया, फिर समझ आया कि मैं कह नहीं पाऊंगा.'
'तो फिर चलें प्रेस?'
'अरे नहीं. कुछ खाया  जाए, क्या लोगी?'
'डोसा पसंद है मुझे.'
'ठीक है, वही मंगवाता हूँ.'

*****

आज प्रेस में कुछ अधिक गहमा-गहमी थी. नागपुर से मालिकान आने वाले थे. सब तरफ साफ़-सफाई हो रही थी, सीलिंग के कोनों से जाले निकाले जा रहे थे, कांच साफ़ किए जा रहे थे, फर्श की धुलाई हो रही थी. स्टाफ में भी हल्की सी दहशत थी, क्यों थी? मालूम नहीं. सब क्लीन-शेव थे, सबके कपड़े 'रिन की सफेदी' वाले दिख रहे थे, चश्में साफ़ झलक रहे थे. विद्योत्तमा ने आज साड़ी पहनी थी. विवेक ने जब विद्योत्तमा को साड़ी में देखा तो अपनी आँखें चमकायी और पूछ बैठा, 'क्या बात है, आज साड़ी में?'
'आपको मालूम नहीं क्या, आज बड़े मालिक आने वाले हैं?'
'वह मालूम है, लेकिन साड़ी का रहस्य नहीं मालूम.'
'अच्छा यह बताओ, साड़ी में मैं कैसी लग रही हूँ?'
'बहुत अच्छी. खुद पहनी या मम्मी ने पहनायी?'
'तो क्या मैं साड़ी पहनना नहीं जानती?'
'मुझे क्या मालूम? लेकिन अब आपकी बात से समझ में आ रहा है कि आप खुद लपेट लेती हैं.'
'लपेट लेती हैं...क्या मतलब?'
'मतलब यह है कि जो रोज पहनता है उसकी साड़ी का पहनावा अलग दिखता है और कभी-कभार वाले का अलग.'
'इसका अर्थ यह हुआ कि मैंने साड़ी सही ढंग से नहीं पहनी?'
'यह मैं कैसे कह सकता हूँ? मैंने खुद कभी साड़ी पहनी नहीं, हाँ, बहुतों को साड़ी पहने देखा है.'
'देखो मज़ाक मत करो, सच बताओ.'
'सच कह रहा हूँ, आज आप गज़ब ढा रही हो.'
'इस बात को इतना घुमा-फिर कर क्यों कहा?'
'ऐसा नहीं करता तो आप सोचती कि मैं मुंह-देखी तारीफ़ कर रहा हूँ.' विवेक ने उत्तर दिया.

मालिक आये. गुलदस्ते दिए गये. आधा घंटा तक उच्च पदस्थ लोगों से चर्चा के पश्चात उन्होंने स्टाफ को संबोधित किया, 'अखबार निकालना सामाजिक सरोकार का काम है. हमें सामान्यजन की समस्याओं को अपने अखबार के माध्यम से उन तक पहुंचाना है जिनके पास समस्याओं के निराकरण की शक्ति है. इसके लिए जनता के बीच जाकर उनसे संवाद करना, उनकी बात को समझना और निष्पक्ष होकर लेख तैयार करना हमारा दायित्व है. जनमानस को जितना गहराई से समझेंगे, उतनी अच्छी रिपोर्ट तैयार होगी. किसी दबाव में आकर या किसी से प्रभावित होकर लिखी गयी रिपोर्ट अखबार की ख्याति को चोट पहुंचती है और आपकी निष्ठा को भी.
आज हम जबलपुर में पाठकों की पसंद हैं, सर्वोच्च स्थान है हमारा. इस स्थान पर बने रहने के लिए कड़ी मेहनत की ज़रुरत है. ज़रा सी ढील हमें महंगी पड़ेगी क्योंकि 'दैनिक भास्कर' यहाँ अपने पैर जमाने की कोशिश में लगा हुआ है. हमें उससे डर नहीं है लेकिन उसका मुकाबला करने के लिए अपनी गुणवत्ता कायम रखनी होगी. अगर हमारी क्वालिटी अच्छी है तो हम डट कर मुकाबला कर सकते हैं. वे इनाम बाँट रहे हैं, बांटने दो लेकिन हम सच्चाई का सहारा लेकर, जी-जान लगाकर ख़बरें लाएंगे और निष्पक्ष होकर छापेंगे ताकि अखबार खरीदने वाले चाहे कोई भी अखबार खरीदें लेकिन अखबार पढ़ने वाले केवल 'नवभारत' खोजें.' 
'कोई प्रश्न हो तो मुझसे पूछ सकते हैं आप.' उन्होंने भाषण के समापन के बाद कहा.
'मैं एक सवाल करना चाहती हूँ.' विद्योत्तमा ने खड़े होकर कहा.
'हाँ, पूछिए.'
'आपकी 'एन.बी.प्लान्टेशन प्रोजेक्ट' की क्या प्रगति है? मैं जब फील्ड में जाती हूँ तो कुछ लोग मुझसे इस बारे में सवाल करते हैं, तरह-तरह की बातें करते हैं. मैं अभी नयी-नयी हूँ, इसलिए मुझे अधिक नहीं मालूम. सर मैं उनको कैसे समझाऊं?' विद्योत्तमा ने पूछा.
शांति से चल रही बैठक में सन्नाटा खिंच गया, सबकी आँखें विद्योत्तमा की ओर घूम गई और फिर मालिक साहब के चेहरे की तरफ.
'एन.बी.प्लान्टेशन का नवभारत से कोई लेना-देना नहीं है, हमने केवल उनके विज्ञापन प्रकाशित किए थे, जैसे हम सामान्य विज्ञापन प्रकाशित करते हैं. यह ज़रूर था कि उस प्रोजेक्ट को हमारे परिवार के एक सदस्य ने शुरू किया था इस कारण वैसी भ्रम की स्थिति बनी.' मालिक साहब ने बताया.

* * * * * *

'ये आपने क्या किया? सवाल पूछना था तो प्रेस से सम्बंधित सवाल करना था.' विवेक ने विद्योत्तमा से कहा.
'क्यों यह प्रश्न 'नवभारत' से सम्बंधित नहीं था क्या?' विद्योत्तमा ने प्रश्न किया.
'था, प्रेस से सम्बंधित नहीं था.'
'एक बात बताओ विवेक जी, उन्होंने संस्था की ख्याति और व्यक्तिगत निष्ठा की बात कही, आपने ध्यान दिया या नहीं?'
'हाँ, कही थी.'
'तो क्या ख्याति और निष्ठा की बात हमारे लिए लागू है, उनके लिए नहीं?'
'सबके लिए है.'
'क्या उन्होंने अपनी ख्याति का ध्यान रखा? जिनका पैसा डूबा है, उनसे मिलेंगे तब मालूम पड़ेगा कि जीवन भर की कमाई उन लोगों ने नवभारत के नाम के भरोसे सौंप दी और प्रतिफल में उन्हें मायूसी मिली. ठीक है, आप प्रेस वाले हो, शक्तिशाली हो. नेता आपके, पुलिस आपकी, आपका कौन क्या बिगाड़ लेगा? क्या इसका यह मतलब है कि किसी को अपनी शक्ति का दुरूपयोग करने की ऐसी छूट है? अगर ये ईमानदार होते, इनको अपनी ख्याति की फ़िक्र होती तो लोगों के पैसे वापस करते. अब बुचकने की कोशिश कर रहे हैं, कह रहे हैं, 'एन.बी.प्लान्टेशन का नवभारत से कोई सरोकार नहीं है', क्या यही निष्ठा है लोगों के भरोसे के प्रति?'
'तुम्हारी बात सही है लेकिन हम यहाँ मुलाजिम हैं. निरर्थक मामलों में मालिक से टकराना हमारे हित में नहीं है.'
'जो गलत है, वह गलत है और जो गलत को देखकर चुप रहते हैं, वे भी गलत हैं. फिर मेरा क्या कर लेंगे? नौकरी से अलग कर देंगे, यही न? फांसी में तो नहीं चढ़ा देंगे. क्या पूरा संसार इन्हीं का दिया खा रहा है?'
'आप इतनी उत्तेजित क्यों हो रही हो?'
'बात ही ऐसी थी. गलत काम करने वाले जब नैतिक शिक्षा देने लगते हैं तो मेरा बर्दाश्त बेकाबू हो जाता है.' विद्योत्तमा ने कहा. 'चाय मंगवाइए, बेमतलब दिमाग ख़राब हो गया मेरा.'

'कल छुट्टी है, पिक्चर चलोगी?' विवेक ने पूछा.
'अभी नहीं.' विद्योत्तमा ने उत्तर दिया.
'तो कब?'
'शादी के बाद.'
'किसकी शादी के बाद?'
'अपनी शादी के बाद.'
'किससे शादी करने वाली हो?'
'अभी देर है मेरी शादी में. जब शादी करना होगा तब उसी समय तय करूंगी कि किससे करना है.'
'देर किस बात की?'
'जज बनना है मुझे. जज बन जाऊँगी तो किसी जज से शादी करूंगी. जज न बन सकी तो किसी वकील से और वकालत न की तो किसी पत्रकार से.'
'अर्थात मैं तीसरी पायदान में हूँ?'
'अरे वाह, क्या आप भी कतार में हैं?'
'कतार में हूँ लेकिन दो अन्य लड़कियां भी विचाराधीन हैं, आपका नंबर तीसरा है.'
'मेरे चक्कर में मत रहना. मैं इमोशनल लड़कियों में से नहीं हूँ. मेरा खोजो-छोड़ो-खोजो वाला प्रयास चलते रहेगा.'
'क्या तुम सीरियस हो?'
'यस, बेमेल विवाह सफल नहीं होते. मैं जो बनूँगी, वैसा मेरा निर्णय होगा.'
'इसका मतलब यह है कि मैं तुम्हारी आस छोड़ दूं?'
'आस लगाये रहने में क्या हर्ज़ है? आस है तो सांस है. आप तो यह मनाइए कि मेरा सिविल जज में चयन न हो.'
'हे भगवान, मैं आपका बुरा क्यों चाहूँगा?'
'मेरा भला चाहते हैं? तो इस दोस्ती को काफी हाउस तक ही सीमित रखिए, सिनेमा उसी के साथ जाऊँगी जिससे शादी करूंगी.'
'यदि आप किसी दिन मेरे साथ सिनेमा चलने के लिए तैयार हो गयी तो मैं क्या समझूंगा?'
'हूँ....तो समझिएगा कि मैं आपसे शादी करने वाली हूँ.' विद्योत्तमा ने सोच-विचार करते हुए कहा.

'बड़े साहब बुला रहे हैं.' संदेशवाहक ने विद्योत्तमा से कहा.
'जाइए, आपका बुलावा आ गया. एक कोरा कागज और पेन साथ में लेते जाना, त्यागपत्र लिखवाएंगे आपसे.' विवेक ने कहा.
'क्विक एक्शन?' विद्योत्तमा ने हंसते हुए कहा.
'मैंने कहा था न? मालिकों से टकराना नासमझी है.'
'देखिए, अपन जबलपुर के हैं. जबलपुरिया के जो दिल में आता है, उसे कहे बिना वह रह नहीं सकता. जो होना होगा, सो होगा॰ हो कर आती हूँ, बड़े साहब के पास से. शाम को डोसा खिलाओगे न?'
'पक्का, पर मुझसे दूर होने की खबर मत लाना.'
'क्या पता? आज क्या होने वाला है?' विद्योत्तमा झटके से उठी और सधे हुए कदमों से बड़े साहब के केबिन की ओर चल पड़ी.

'सर, आपने बुलाया.' विद्योत्तमा ने पूछा.
'हाँ, बैठो. सिहोरा के आसपास सिंघाड़ा की पैदावार होती है. कल सुबह मेरी कार से वहां चली जाओ और एक रपट तैयार करो.'
'जी.'
'किसी को साथ ले जाओ.'
'किसे ले जाऊं सर?'
'जिसे आप कहें.'
'विवेक जी को ले जाओ, मैं उसको इंस्ट्रक्शन्स दे देता हूँ. एक बात ध्यान रखना, मेरे लंच टाइम तक वापस आ जाना.'
'जी सर.' उत्तमा ने कहा और कुर्सी से उठने लगी. 'और सुनो, रपट कल ही तैयार कर लेना, परसों के सिटी एडिशन में देना है.'
'जी, वहां से लौटने के तुरंत बाद तैयार कर लूंगी और आपके घर जाने के पहले रपट टेबल पर आपके सामने होगी.'

*****

'क्या हुआ?' विवेक ने पूछा.
'कल सिहोरा जाना है. सिंघाड़ा का पता लगाना है.'
'सिंघाड़ा का पता? क्यों?'
'सर ने कहा है, उस पर रपट तैयार करनी है. हम दोनों जा रहे हैं.'
'मैं भी?'
'हाँ, सर की कार में जाएंगे, लंच के पहले लौटना है.'
'मेरा क्या काम है वहां?'
'पता नहीं, शायद मार्गदर्शन के लिए आपको भेजा हो, या मेरा हितरक्षक बना कर.'
'इसका मतलब यह हुआ कि सर को पता चल गया कि आपने मेरे साथ सिनेमा जाने के लिए मना कर दिया इसलिए यह नया साथ बन गया.'
'सिनेमा अलग बात है, आफिस का काम अलग.' विद्योत्तमा को हंसी आ रही थी.

रात को विद्योत्तमा ने पापा को बताया कि उसे सुबह सिंघाड़ा के उत्पादन की जानकारी लेने के लिए सिहोरा जाना है. 'सिहोरा जाने की ज़रुरत नहीं है बेटा. सिहोरा के पहले बीसवें किलोमीटर पर एक गाँव है, बुढ़ागर, वहां सिंघाड़ा होता है. बहुत बड़ा तालाब है, वहां जाकर पता करो.'

सिंघाड़ा, जिसे भारत के पूर्वी क्षेत्र में पानीफल कहते हैं, कच्चा या पानी में उबाल कर खाया जाता है. पानी में उबला हुआ सिंघाड़ा मीठा लगता है और स्वादिष्ट भी. सिंघाड़ा को सुखाकर इसका आटा बनाया जाता है जो फलाहार के काम आता है. यह ठहरे हुए साफ़ पानी में उगाया जाता है. पानी के भीतर इसकी जड़ें पंद्रह से बीस फुट तक गहरी जाती हैं. इसके पत्ते खूबसूरत होते हैं और उनमें गर्मी की शुरुआत में चार पंखुड़ियों वाले फूल होते है जो कालांतर में सिंघाड़ा बन जाते हैं.

विद्योत्तमा और विवेक बुढ़ागर पहुंचे, मुख्य सड़क से कुछ दूर पर एक बहुत बड़ा तालाब दिखा, झील जैसा,  जिसका कोई ओर-छोर नज़र नहीं आ रहा था. कुछ लोग डोंगियों में बैठकर धीरे-धीरे तालाब में तैर से रहे थे. वे कुछ उखाड़कर अपनी डोंगी में रखते जा रहे थे. डोंगी में उनकी पत्नी या बच्चे या साथी भी थे जो उनकी मदद कर रहे थे. एक अधेड़ तालाब के किनारे मिल गया. 'क्या नाम है तुम्हारा?' विद्योत्तमा ने पूछा.
'मंगल, मंगल केंवट.' उसने उत्तर दिया.
'तुम्हारी रोजी-रोटी इसी तालाब से चलती है?'
'यही काम सीखा है, अपने बाप दादों से.'
'कितने साल से यह काम कर रहे हो?'
'बचपन से.'
'इस तालाब में तुमको क्या-क्या मिलता है?'
'कमल के फूल, पोखरा, सिंघाड़ा और मछली.'
'ये तालाब कितना गहरा होगा?'
'कहीं दो बांस तो कहीं तीन बांस.'
'इस तालाब में कितना सिंघाड़ा होता है?'
'क्या पता? हम तो तौल जानते नहीं. सिंघाड़ा तोड़ना और इकठ्ठा करना जानते हैं. जब फलने का मौसम आता है तो हम मोहन चौरसिया को दे देते हैं. जितना पैसा उसने दे दिया, उतना ले लेते है. यहाँ से ट्रकों में भरकर माल बाहर जाता है, कहते है कलकत्ता, बम्बई, दिल्ली जाता है.'
'फिर?'
'फिर क्या? उसी पैसे से हमारा परिवार चल जाता है.'
'मोहन चौरसिया क्या इसी गाँव में रहता है?'
'हाँ, थोड़ा सा आगे जाएँगी तो उसका दो-मंजिला बड़ा मकान है.'
'क्या तुमने भी अपना मकान बनवा लिया?'
'जो मेहनत-मजूरी करता है, वह झोपड़ी में रहता है, मकान में नहीं. हमारी किस्मत में तो बस पसीना बहाना लिखा है.' मंगल केंवट ने उनसे कहा, 'चलूँ मैं, काम का हर्ज़ा हो रहा है.'

लंच-टाइम के पहले विद्योत्तमा और विवेक प्रेस वापस आ गए. रास्ते में दोनों के मध्य मौन सम्भाषण हुआ लेकिन कोई वार्ता नहीं हुई. विद्योत्तमा को अपने कैरियर में भविष्य नज़र आ रहा था, गृहस्थी बसाने में उसकी रूचि नहीं थी. अगर होती तो जज से शादी न कर लेती! वह विवेक के दिल की बात को समझ रही थी लेकिन जानती थी कि यदि वह गृहस्थी के चक्कर में फंसी तो फिर फंसी, उससे उबरने का कोई उपाय नहीं मिलेगा. पति का क्या है, कई विवेक मिलेंगे.

बुढ़ागर से लौट कर उत्तमा ने एक रपट तैयार की और बड़े साहब के सामने प्रस्तुत कर दी. साहब पढ़ कर खुश दिखे, दोबारा पढ़ा, कुछ काट-छांट की और सम्पादकीय विभाग में अपनी टीप लिखकर भेज दिया. विद्योत्तमा ने पूछा, 'मैं जाऊं सर?'
'बैठो, तुमसे बात करनी है.'
'जी सर.'
'तुम जिम्मेदारी और लगन से काम करती हो. लिखने का तरीका भी अच्छा है. अगर तुम पत्रकारिता में अपना कैरियर बनाना चाहती हो तो बताओ, मैं तुम्हें कन्फर्म करना चाहता हूँ.'
'सर, मैं ज्युडीशरी में जाना चाहती हूँ.'
'यह तो तुम मुझे बता चुकी हो लेकिन इस बार सिलेक्ट तो हुई नहीं.'
'एक कोशिश और करूंगी.'
'क्या अगली बार चांस दिखता है तुम्हें?'
'उम्मीद तो है.'
'सुना है कि तुमसे कम नंबर वाले सिलेक्ट हो गये और तुम रह गयी.'
'क्या करें सर, ब्राह्मण कुल में जन्म लिया है, भुगतना पड़ रहा है.'
'तुम्हें ख़राब नहीं लगा?'
'क्यों नहीं, लेकिन सिलेक्ट न होना उतना बुरा न लगा जितनी यह व्यवस्था अजीब लगी. हमारी पीढ़ी उस अपराध की सज़ा भुगत रही है जो हमने किया ही नहीं है.'
'मतलब?'
'पूर्वजों ने गलतियां की, हमने नहीं. यह भी जरूरी नहीं है कि मेरे पूर्वज ने वैसी गलती की हो। यह कैसा न्याय है? यह तो अन्याय का मुआवज़ा अन्याय हो गया.'
'संविधान में प्रावधान है तो ऐसा ही है.'
'कोई बात नहीं, इस बार मैं अपनी योग्यता को उस स्तर तक ले जाऊँगी ताकि संविधान का प्रावधान भी मेरा कुछ न बिगाड़ सके.'
'मेरी बात मानो, तुम पत्रकारिता को अपना लो, यह काम सम्मानजनक है.'
'आपकी बात सही है सर लेकिन पत्रकारिता में बुद्धि का सम्मान नहीं है, जिसे आप सम्मान कह रहे हैं, वह डर-जनित प्रदर्शन है.'
'यह बात तो ज्युडीशरी में भी है.'
'फर्क है सर. ईमानदार जज बहुत सम्मान पाते हैं.
'ईमानदार पत्रकार भी वैसा ही सम्मान पाते हैं.'
'ईमानदार पत्रकार अभाव में जीता है सर जबकि ईमानदार जज अच्छे वेतन और अन्य सुविधाओं के कारण पत्रकारों से बेहतर ज़िंदगी जीते हैं. सर, आप ऐसा न समझें कि मैं आपकी बात का विरोध कर रही हूँ. आपकी बात से मुझे महसूस हो रहा ही कि आप मेरा भला चाहते हैं, मुझे व्यवस्थित करना चाहते हैं अन्यथा आप मुझे इतना क्यों समझाते? लेकिन मुझे एक बार और कोशिश करने दीजिए, इस बार सफल न हुई तब आपकी बात मान लूंगी.' विद्योत्तमा ने कहा।

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