मध्यम मध्यम : चार

*चार*


प्रत्येक परिवार के सामने हर समय कोई-न-कोई चुनौती रहती है, सामान्यतया अस्तित्व और सम्मान का संकट. वैसे तो सारा खेल मनोविज्ञान का है लेकिन शतरंज की चाल की तरह उलझा हुआ है. सामने वाला खिलाड़ी समय है जिसकी चाल समझ नहीं आती क्योंकि वह खेल के नियम को नहीं मानता जबकि हम अपनी चाल खेल के नियम के अनुसार चलते हैं. यहीं गड़बड़ हो जाती है, वह बाज़ी जीतते जाता है और हम उसका विजयी विद्रूप चेहरा देखते रह जाते हैं.

रज्जो समर्पित गृहिणी है. उसने अपनी इच्छाओं को आलमारी में रखे कपड़ों की तह में दबाकर रख छोड़ा है. साफ़-सफाई के दौरान यदा-कदा वे यादें उभर कर सामने आ जाती हैं तब दो आंसू टपक पड़ते हैं, बस हो गया. जब से रज्जो ससुराल आयी है, सिर्फ ससुराल की होकर रह गयी. वैसे तो इलाहाबाद और जबलपुर दोनों नदियों के किनारे बसे हैं लेकिन उनमें बहुत फर्क है. गंगा का पाट बहुत चौड़ा है, वैसे ही वहां के लोगों का दिल भी चौड़े हैं जबकि नर्मदा का पाट औसतन छोटा है उसका असर जबलपुर में रहने वालों पर भी है. औरतों के लिए घर के बाहर की दुनिया भी घर के अन्दर की दुनिया जैसी संकुचित है. दुनिया केवल उनके लिए अवश्य खुल गयी है जो संपन्न घरों से हैं लेकिन जो संघर्षरत हैं, वे अब भी सिमट-सिमट कर अपना घूँघट सम्हालते चल रही हैं.

घर में रज्जो की पोजीशन नंबर दो की है. नंबर एक पर रज्जो की सास रत्ना हैं. रज्जो ने कई बार कोशिश की कि कमान अपने हाथ में ले ले लेकिन विद्याशंकर ने वैसा होने न दिया. रज्जो की बात मानी नहीं जाती थी और रत्ना की कभी टाली नहीं गयी. रज्जो जब से इस घर में आई है, परिवार की सत्ता सास के हाथ में केन्द्रित रही. वजह यह थी कि वे जबलपुर की थी इसलिए यहां के रीति-रिवाज़ की जानकारी, रिश्तेदारी और जान-पहचान का उनका दायरा बहुत बड़ा था. फिर, रज्जो को बेफिक्री भी थी, 'जो जानें, अम्माजी जानें'. उचित-अनुचित, भला-बुरा उनको सौंप कर रज्जो अपने पति और बच्चों के साथ आर्थिक असुविधा में भी खुश रहती थी. खुश क्या रहती थी? खुश रहना सीख गयी थी.

रज्जो के चार बच्चे थे, बच्चे एक त्रिकोण में फंसे थे. एक कोण दादी थी, दूसरा मम्मी और तीसरा पापा. तीनों का तरीका अलग था, तरीका मतलब, बच्चों के लालन-पोषण के प्रति उनका रवैया. दादी सर्वकालिक आलोचक की भूमिका में रहती, मम्मी सुधारक की और पापा रक्षक की. तीनों के तरीके एक दूसरे से सर्वथा भिन्न थे. बच्चों के मुद्दे पर इस त्रिकोण में अक्सर टकराहट होती रहती थी लेकिन एक साथ नहीं बल्कि जोड़े में हुआ करती थी जैसे दादी बनाम मम्मी और मम्मी बनाम पापा, हाँ, दादी बनाम पापा का जोड़ा नहीं बनता था क्योंकि पापा सदैव दादी के विचारों के समक्ष आत्म समर्पण कर देते थे.

संध्या विदयोत्तमा से डेढ़ साल छोटी है. पांच फुट दो इंच की गुड़िया जैसी खूबसूरत लडकी. बी.एस॰सी. कर रही है, डाक्टर बनने के सपने देख रही है लेकिन उसकी तैयारी में दम नहीं है. डाक्टर बनने का शौक है लेकिन संकल्प लापता है. नाटक में भाग लेने का शौक है लेकिन उसे डायलाग याद नहीं होते और गाने का भी मन है लेकिन रियाज़ नहीं करती. वैसे, हर जगह, जहाँ वह खड़ी हो जाती है, उसे उसकी सुन्दरता का लाभ मिलता है लेकिन अकेले इस गुण के भरोसे तात्कालिक लाभ मिल जाता है लेकिन कठिन लक्ष्य हासिल नहीं होते. सच पूछेंगे तो उसे खुद भी पता नहीं है कि उसको क्या बनना है?

संध्या को लेकर आज दादी और मम्मी में वार्तालाप हुआ है. रज्जो भोजन बनाने की तैयारी में लगी है. रत्ना सब्जी को छील-काटकर फारिग हो गयी है, अपने चश्मे के कांच को रूमाल साफ़ कर रही है. लम्बी चुप्पी के बाद रत्ना शुरू हुई, 'काहे रज्जो, संध्या के लिए क्या सोचा है?'
'हम क्या बताएं अम्माजी?'
'जो सोच रही हो, वह बताओ.'
'हम सोच रहे हैं कि सब्जी को कैसे छौंकें? हींग से या जीरा से?'
'हम संध्या की पूछ रहे हैं, सब्जी की नहीं.'
'आपकी बात हमने भी सुनी लेकिन अभी हमारा ध्यान सब्जी में लगा है.'
'ठीक है, जब सब्जी बन जाए तो हमें बताना कि संध्या के लिए क्या सोचा है?'
'इनको आने दीजिए, फिर तीनों मिलकर चर्चा करेंगे.'
'तुम्हारी इस बारे में विद्याशंकर से बात हुई है क्या?'
'कई बार हुई. हर समय वे कहते हैं कि जैसा आप कहोगी, वैसा होगा.'
'लो, हमारे ऊपर डाल दी तुम लोगों ने.'
'निर्णय तो आप करोगी न? आप घर में स्यानी हो.'
'हमारी मानता कौन है?
'हम आपकी सब बात मानते हैं, आप जैसे कहोगी, वैसा करेंगे.'
'हमारी मानो तो संध्या के ब्याह की बात चलाओ, इलाहाबाद वाले जज से हो जाए तो अच्छा है.'
'पर संध्या तो और आगे पढ़ने के लिए कह रही है!'
'हमें तो उसकी पढ़ाई में कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ता. उसे समझा-बुझा कर काम निकालो. समझी तुम?
'हाँ अम्माजी,' रज्जो ने कहा. 
'संध्या सुन्दर है, उनको पसंद आना चाहिए.' अम्माजी ने कहा.

रात को भोजन के बाद महफिल सजी. रज्जो की सास, पति और दोनों बड़ी लड़कियां गोल घेरा बना कर बैठ गए. विद्योत्तमा ने बात शुरू की, 'पापा, मामाजी से बात किये?'
'किस बारे में?' विद्याशंकर ने पूछा.
'इलाहाबाद वाले लड़के के बारे में.'
'तुमने तो मना कर दिया था न?'
'हाँ, मैंने मना किया था लेकिन संध्या के लिए कहा भी था.'
'अब मैं कैसे बात करूं? तुमने मना कर दिया तो संध्या भी मना कर सकती है, क्यों संध्या?'
'हाँ पापा, अभी मुझे पढ़ने दो आप लोग.' संध्या ने तुरंत 'वीटो' लगाया.
'लो, सुनो. बड़ों की बात मानना नहीं है, घर में सब अपनी-अपनी मर्जी के हो गए हैं.' विद्याशंकर ने कहा, 'क्यों अम्मा, सब लड़कियां कुँवारी बैठेंगी घर में?'
'अम्मा क्या कहें? अम्मा तो बैठी है कुर्सी में, चुपचाप देख रही है नए जमाने का हाल-चाल.' रत्ना बोली.
'मैं शादी के लिए मना नहीं करती दादी, करूंगी लेकिन थोड़ा और पढ़ लेने दो मुझे. मैं घर में भार हो गयी हूँ क्या ?' संध्या ने प्रश्न किया.
'लड़कियां मां-बाप पर भार नहीं होती बेटा, पर ज़िम्मेदारी तो हैं न!'
'मैं मानती हूँ.'
'फिर, तुम तीन बहनें हो घर में. तुम्हारे पापा के पास न पैसा है न जमीन-जायदाद है. ये पुश्तैनी घर है जिस पर तुम्हारे चाचा की नज़र गड़ी हुई है. मैं जब तक जिंदा हूँ, तब तक यह घर पूरा है, जिस दिन मेरी आँखें मुंदी, चौदहवें दिन यह आधा हो जाएगा. तुम लोग ऐसे अड़ंगे लगाओगी तो कैसे बनेगा?'
'दादी एक बात पूछूं? क्या लड़कियों के लिए शादी करना ज़रूरी है?' विद्योत्तमा ने हस्तक्षेप किया.
'हाँ, ज़रूरी है क्योंकि यह संसार का नियम है. सबके लिए ज़रूरी है, लड़कियों के लिए और लड़कों के लिए भी.' दादी ने उत्तर दिया।
'ऐसा नियम क्यों बनाया गया?'
'समाज को सीमाबद्ध करने के लिए. विवाह मनुष्य की मानसिक और शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, सुरक्षित वातावरण देता है और बच्चों के लालन-पोषण की ज़िम्मेदारी निश्चित करता है.'
'और कोई न करे तो?'
'न करे, विवाह करने के लिए समाज की ओर से कोई बाध्यता नहीं है. हमारी मुश्किल यह है कि हम लोग सामाजिक प्राणी हैं, अकेले जीना बहुत कठिन होता है. जब किसी से साथ बन जाता है तो दोनों अपने दुःख-सुख बांटकर जीवन व्यतीत करते हैं, जीना आसान हो जाता है.'
'पर मैं मम्मी को देखती हूँ तो मुझे लगता है कि उन्हें यहाँ कष्ट अधिक है, सुख कम मिला.'
'घर के काम को तुम कष्ट समझती हो? काम तकलीफदेह तब होता है जब अनमने होकर किया जाए, वहीँ पर ख़ुशी से किया गया काम मन को सुख देता है. हाँ, परिवार में असहमतियों और आपसी क्लेश से दुःख होता है जिससे बचना चाहिए.'
'असहमति और क्लेश तो हर घर का किस्सा है, दादी.'
'होता है लेकिन जिन घरों में खुले दिमाग से, बैठकर बात होती है, वहां आपसे मतभेद कम होते हैं. संसार में ऐसी कौन सी समस्या है जिसका समाधान नहीं होता?'
'ठीक है दादी, मैं शादी करूंगी परन्तु जज बन जाने के बाद.' विद्योत्तमा ने अपने निर्णय में संशोधन किया.
अचानक संध्या बोल पड़ी, 'मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता, बहुत 'बोरिंग' है. चलो, मैं शादी कर लेती हूँ पापा लेकिन मैंने सुना है कि जज लोग भी 'बोर' होते हैं? मेरी सहेली के पापा जज हैं वो घर में किसी से बात नहीं करते. हर समय कुछ लिखते रहते हैं या पढ़ते रहते है. ऐसे में मैं आसमान से गिरूंगी और खजूर में लटक जाऊँगी.'
'वैसा पुराने टाइप के जज करते थे, नए लड़के काम का ज्यादा 'लोड' नहीं लेते, खुशनुमा ज़िन्दगी जीते हैं.' विद्याशंकर ने समझाया.
'फिर ठीक पापा, मुझे मंज़ूर है.' संध्या ने मुस्कुराते हुए कहा. दादी और मम्मी भी प्रसन्न हो गये. दोनों लड़कियां वहां से उठकर चली गयी और बड़ों के बीच आगे की रणनीति पर विचार होने लगा.

*****

'अगर संध्या का रिश्ता वहां पक्का हो गया तो कैसा करोगे?' रज्जो ने बिस्तर में लेटे-लेटे अपने पति से पूछा.
'सिविक सेंटर में दूकान खरीदने के लिए पैसा जोड़कर रखा, उसे शादीे में लगा देंगे, और क्या करेंगे?' विद्याशंकर ने उत्तर दिया.
'नहीं, यह सही नहीं होगा. दूकान तो लेना ही है. सिविक सेंटर में आ जाओगे तो तुम्हारा व्यापार चमक जाएगा,  आगे के शादी-ब्याह में सुविधा रहेगी. एक काम करते हैं, मेरे गहनों में से कुछ संध्या के लिए बनवा लेंगे, बाकी बेच देंगे.'
'तुम्हारे गहने बेचने से कितना पैसा आएगा?'
'इसके बारे में बाद में सोचेंगे, पहले यह पता करो कि शादी में कितना खर्च लगेगा? लड़का जज है तो उन लोगों का मुंह ज्यादा खुलेगा.'
'पहले वो लोग हाँ तो बोलें, फिर देखेंगे.'
'कल मैं भैया को फोन करके बात आगे बढ़ाने के लिए बोलती हूँ.' रज्जो ने कहा.
'यह काम हो जाए तो समझो हमने पुण्य कमा लिया.' विद्याशंकर ने कहा. दोनों तकिया में अपना सिर लगाए कुछ-कुछ सोचते रहे फिर एक दूसरे की पीठ करके चादर ओढ़कर सो गए.

*****

विद्योत्तमा को पत्रकारिता का काम समझ में आने लग गया है. कैश को छोड़कर हर डेस्क पर उसने काम कर लिया. वह अकेली लड़की थी प्रेस में इसलिए उसकी बहुत पूछ थी. हर उम्र के पुरुष उसके सामीप्य का लाभ उठाना चाहते थे इस कारण वह जब भी किसी के पास कोई काम सीखने जाती तो लोग मन लगाकर सिखाते और अधिक समय देते थे. कुछ ऐसे थे जो साहित्य से जुड़े हुए थे लेकिन आजीविका के लिए अखबारी नौकरी कर रहे थे, वे उसे उपन्यास, कविता, कहानी और नाटक की पुस्तकों के बारे में बताते थे और पढ़ने के लिए अपने घर से लाकर देते थे. उनमें कई लोग ऐसे भी थे जिन्हें काम से दिलचस्पी नहीं थी, वे विद्योत्तमा को प्रेस की अंदरूनी उठापटक के बारे में बताते थे.

प्रेस में समर्पित होकर काम करने से विद्योत्तमा की पकड़ अच्छी होती जा रही थी, कुछ समय और टिक जाती तो नौकरी पक्की हो जाती लेकिन एक दिन उसने अपना त्यागपत्र अखबार के प्रबंधसंचालक को भेज दिया. प्रबंधसंचालक के केबिन में उसकी पेशी हुई. 'क्या हो गया? तुम प्रेस क्यों छोड़ रही हो?'
'सर, मैंने आपको बताया थी कि मैं सिविल जज की परीक्षा की तैयारी कर रही हूँ, 'टेस्ट' नज़दीक हैं, मुझे तैयारी करनी है.' विद्योत्तमा ने बताया.
'तो 'रिजाइन' क्यों कर रही हो? छुट्टी ले लो.'
'दो महीना लग जाएगा, इतनी लम्बी छुट्टी मिलेगी?'
'उसकी चिंता तुम मत करो. देखो, तुम्हारे परिणाम आने और नियुक्ति की खबर में समय लगेगा, तब तक यहाँ काम करती रहो. एक बात बताओ, क्या तुम्हें पत्रकारिता पसंद नहीं आई?'
'यहाँ मुझे बहुत अच्छा लगा सर. यहाँ रहकर मुझे दुनिया कुछ अलग ही नज़र आयी, इस दुनिया को मैं जानती न थी. सबके साथ काम करना सीखा और सामान्यजन की समस्याओं को देखने और समझने की तमीज आई मुझे यहाँ पर, सर.'
'तो फिर पत्रकारिता को ही अपना जीवन लक्ष्य क्यों नहीं बनाती?'
'सोचूंगी सर, अगर जज न बन पायी तब.' विद्योत्तमा ने मुस्कुराते हुए कहा.

विद्योत्तमा ने खुद को अध्ययन में समेट लिया. कानून की पुस्तकों के अतिरिक्त सामान्य ज्ञान पर उसने ध्यान दिया और मनस्थ करने का प्रयास किया. देखते-देखते 'टेस्ट' का दिन आ गया. एक ही दिन में दो पालियों में परीक्षा थी, सुबह और दोपहर. सुबह घर से निकलने के पहले उसने दही-शक्कर खाया, दादी, मम्मी और पापा के पैर छुए, उनका आशीर्वाद लिया. परीक्षा हो गयी और परिणाम की प्रतीक्षा होने लगी.

*****

जबलपुर में जितनी ठण्ड पड़ती है, उतनी ही गर्मी. यहाँ का कमानिया गेट खाने-पीने की चीजों का समारोह-स्थल है. मौसम के हिसाब से सामानों की खपत बढ़ती-घटती रहती है. ठण्ड में आलू की टिकिया के लिए कतारबद्ध होकर खड़ा होना पड़ता है तो गर्मी के दिनों में लस्सी के लिए. यहाँ की लैया भी लोकप्रिय है. लैया का मतलब है, तिल, मुर्रा. राजगीर, दलीय और मूंगफली की मीठी पपड़ी.

कमानिया गेट के बगल में है, बड़कुल की सौ साल पुरानी  दूकान जहाँ खोवा की जलेबी मिलती है. गरम घी की 'तइयापर हाथ घुमा कर जलेबी बनाते हुए कारीगर को देखकर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि जलेबी का फंदा बनाना और उसे सीखना कितना कठिन है। पुराने समय अपने देश में मैदे की जलेबी बनती चली आ रही है। किसी अक्ल वाले इन्सान ने प्रचलित जलेबी को एक नई विधि से बनाने की बात सोची। उसने मैदे की जगह भीगी हुई उड़द दाल का छिलका निकाल कर और बारीक पीसकर उसे जलेबी जैसा रूप दिया और उसके घेरे को कंगूरे से सजा दिया। ये कंगूरे राजस्थान और उत्तरप्रदेश के इमारतों के बाहर निकले छज्जों की सज्जा-शैली से लिए गए प्रतीत होते हैं। इसे केसरिया रंग दिया गया और नाम रखा गया- इमरती। इन्हीं इमारतों से आया हुआ शब्द लगता हैइमरती। उसके बाद फिर किसी नवोन्मेषी कारीगर ने मैदे की जलेबी को गुलाबजामुन से जोड़ दियाअर्थात मैदे के घोल को गुलाबजामुन की 'मल्लीमें मिलाकर, 'लतनाका छेद बड़ा करके उसकी मोटी-मोटी जलेबी बना दी। जब प्रयोग सफल रहालोगों को उसका स्वाद अच्छा लगा तो इसे उपवास में खाई जाने वाली फलाहारी मिठाई के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। चूंकि उपवास में मैदा वर्जित है इसलिए उसमें मैदा के बदले खोवासिंघाड़े का आटा और तीखुर मिला कर बनाया गया। आपकी जानकारी के लिएसिंघाड़ा एक फल है जो तालाब में बोया-उगाया जाता है और तीखुर जंगल की जमीन में होने वाला कन्द-मूल है जिसे व्रत-उपवास में खाना स्वीकार्य है। इस प्रकार जलेबी की एक नई किस्म विगत शताब्दी में विकसित हुई जो 'खोवा की जलेबीके नाम से लोकप्रिय हुई।

जिस दिन संध्या को देखनेवाले इलाहाबाद से आ रहे थे, घर में नास्ते के लिए 'मेनू' तैयार हो रहा था. खोवा की जलेबी का भी ज़िक्र था उसमें. तर्क-वितर्क होने के बाद जलेबी का नाम मिट गया और रसमलाई जुड़ गया. रसमलाई कहाँ से, समोसा कहाँ के, कचोरी कहाँ की आएगी, कौन क्या पहनेगा, यह सब तय हुआ. बैठक कक्ष को व्यवस्थित किया गया. संध्या के मामाजी की खबर आयी वे लड़के और उसके माता-पिता के साथ जबलपुर आएँगे. होटल में उनके रुकने की व्यवस्था हुई. शाम को पांच बजे वे सब संध्या को देखने घर आए.

सब आए, एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए, बैठे और मौसम की बातचीत करने लगे, 'बहुत गर्मी है आपके जबलपुर में! हम तो समझते थे कि इलाहाबाद ही गर्म है.'
'इलाहाबाद और जबलपुर में फर्क क्या है भाई साहब? आपके यहाँ गंगाजी का किनारा है और हमारे यहाँ नर्मदाजी का.' विद्याशंकर बोले. 

संध्या नास्ता लेकर आई. उसके चेहरे में घबराहट झलक रही थी. घबराहट छुपाते हुए उसने सबको सर झुककर अभिवादन किया और नास्ते की ट्रे को सेंटर-टेबल में रख दिया. संध्या की छोटी बहन अपर्णा ने आगे का काम अपने हाथ में लिया. लड़के के पिता ने संध्या को गौर से देखा और कहा, 'संध्या बिटिया, तुम भी बैठो. सविता अपने पास बैठाओ.' संध्या सकुचाते हुए सोफे पर बैठ गयी. उसने कनखियों से लड़के को देखा, वह जज टाइप तो नहीं लग रहा था. उसकी कल्पना थी कि लड़का जज है तो मोटा चश्मा पहनता होगा, सीरियस होगा लेकिन वह तो आम इंसान जैसा था, हाँ, थोड़ा सांवला ज़रूर था. नास्ते के दौरान लड़के और उसके माता-पिता के मध्य मौन-संभाषण हुआ, तीनों के चेहरे में प्रसन्नता के भाव छलक रहे थे. 'आपको आपत्ति न हो तो दोनों आपस में बात कर लें?' लड़के की मां सविता ने कहा. 
'हाँ, क्यों नहीं.' रज्जो ने कहा. 'संध्या, जाओ जज साहब को हनुमानताल घुमा कर लाओ.' दोनों बाहर निकल गए. इधर विवाह की बातचीत शुरू हुई. लड़की के मामाजी ने बात छेड़ी, 'क्या निर्णय है आपका?'
'हमें बच्ची पसंद है, फिर भी तनिक रुकें. दोनों बात कर लें, एक-दूसरे को समझ लें तब फायनल बताएं. सविता ने उत्तर दिया. 
'आपकी बात उचित है लेकिन इस बीच हम भी यह समझना चाहते हैं कि विवाह कैसा होगा?' 
'साधारण तरीके से होगा. हमारे घर-परिवार के बीस-पच्चीस और लड़के के कुछ मित्र बारात में आएँगे.' 
'हमें क्या करना होगा?'
'खाना खिला दीजिएगा, और क्या?'
'यह भी कोई कहने की बात है क्या भाई साहब? और कैसा करना है?'
'हमारी तरफ से कोई आग्रह नहीं है, हमें बहू नहीं, बेटी चाहिए. वैसे, आप जो करना चाहें, करें, आपकी मर्जी.' 

शाम के समय हनुमानताल खुशनुमा हो जाता है. चाहे जितनी गर्मी हो, हवाएं पानी को छूकर ठंडी हो जाती हैं. प्रदीप और संध्या का वार्तालाप चल रहा था. 'अभी पढ़ रही हो?' प्रदीप ने प्रश्न किया.
'हाँ, बी.एस.सी. फायनल में हूँ.'
'इसके आगे?'
'मुझे डाक्टर बनना था लेकिन सब गड़बड़ हो गया.'
'क्या हुआ?'
'आपके कारण हुआ.'
'मेरे कारण?'
'हाँ, अगर यह शादी हो गयी तो मैं डाक्टर नहीं बन पाऊँगी.'
'तो फिर शादी क्यों कर रही हो? मत करो.'
'संयुक्त परिवार में शादी के फैसले घर के बड़े लेते हैं, हमारे हाथ में क्या है? जिस खूंटे से बांधेंगे, बंध जाएगे.'
'बात तो सच कह रही हो आप.'
'तो क्या यह शादी आपकी मर्जी से नहीं हो रही है?'
'आधी मेरी मर्जी, आधी उनकी.'
'जज होकर भी परिवारिक व्यवस्था के शिकार हो? कैसे जज हो, अपने जीवन का फैसला खुद नहीं कर सकते?'
'जज हैं अपनी अदालत में, घर में तो हम उनके पप्पू हैं. बड़ों की बात माननी पड़ती है.'
'मतलब?'
'मतलब यह है, मेरी नौकरी ट्रांसफर वाली है, आज यहाँ, कल वहां.'
'तो?'
'मैंने मना किया तो माने नहीं ये लोग. घर वालों को बहू चाहिए, वे बहू को अपने घर में रख लेंगे, मेरे साथ नहीं भेजने वाले.'
'हाय राम, फिर मेरा क्या होगा?' संध्या के मुंह से अनायास निकल गया. वह शरमा गयी और ओढ़नी से अपने मुंह को ढांप लिया. प्रदीप ने उसका गुलाबी चेहरा देखा और उसे देखकर मुस्कुराने लगा.

उस शाम हनुमानताल में विद्याशंकर और रज्जो के घर में एक अनुष्ठान हो रहा था. प्रदीप के माथे पर रत्ना ने तिलक लगाया, नारियल और रुपये दिए. प्रदीप की मां ने संध्या के कान में बुंदे पहनाए. सह-भोज हुआ, रात की ट्रेन से वे सब वापस हो गए.

जून की 25 तारीख को बारात आई. जबलपुर में दूल्हे घोड़ी में बैठकर बाजे-गाजे के साथ आया करते हैं लेकिन प्रदीप बारात के साथ होटल से कार में बैठकर गोपाललाल के मंदिर आये, राधा-कृष्ण को प्रणाम किया और पैदल चलकर स्वागत-पंडाल में आ गए, न बैंड-बाजा, न आतिशबाजी, न नाच-गाना. 

मंच पर वरमाला के आदान-प्रदान का कार्यक्रम चल रहा था. विद्योत्तमा खुश होकर देख रही थी, अचानक उसके अन्दर अजीब सा संवाद चलने लगा. दिल ने कहा, 'विद्योत्तमा, ये तूने क्या किया? जो रिश्ता तेरे लिए आया, उसे तूने छोड़ दिया? अरे, जज के घर दुल्हन बनकर जाती तो इज्ज़त और आराम से रहती लेकिन तूने इस मौके को खुद अपने हाथ से जाने दिया? तूने भी तो दुल्हन बनने के सपने देखे थे. देखे थे या नहीं? अब कहती है कि शादी नहीं करूंगी. क्या हो गया है तुझे? अकेले ज़िन्दगी कटती है क्या किसी की? सबको साथ चाहिए, सुख-दुःख का साथ होता है विवाह.  अकेले ज़िन्दगी काटना बहुत मुश्किल होता है रे ! फिर, ऐसा पक्का है क्या कि तू जज बन जाएगी? न बन सकी तो?'
जबकि दिमाग ने कहा, 'ये हुई न बात...घर में बड़े होने की जो ज़िम्मेदारी होनी चाहिए, वह तूने समझी. शाबास विद्योत्तमा. अपने लिए सब सोचते हैं, तूने अपनी छोटी बहन के लिए अपने लिए आया रिश्ता छोड़ा, कोई बात नहीं. ज़िन्दगी बहुत लम्बी होती है, शादी करने का तेरा जब मन होगा, अच्छे-अच्छे रिश्ते मिलेंगे. जज बन गयी तो कोई जज मिल जाएगा, अगर जज न बनी तो भी कोई तो होगा जो तुझे डोली में बिठाकर ले जाएगा. वैसे, तू तो शादी नहीं करना चाहती है न? सबसे अच्छा. आज़ादी की ज़िन्दगी और हर समय मन की मौज. इस दुनिया में पति मिलना आसान है लेकिन मन का मीत मिलना मुश्किल है. अगर शादी हो गयी, सात फेरे घूम लिए, समझ लो ज़िन्दगी भर का चक्कर तय हो गया. विद्योत्तमा, मेरी बात मान, तू शादी के चक्कर में कभी मत पड़ना.'
अचानक मम्मी ने उसके कंधे में हाथ रखा और पूछा, 'कहाँ खो गयी तू बेटा?'
'कहीं नहीं मम्मी, यहीं तो खड़ी हूँ.' उत्तमा बोली. उसकी आँखें डबडबा गयी. कुछ क्षणों के बाद उसने खुद को संभाला और कहा, 'कितनी अच्छी जोड़ी है न मम्मी?'
'हाँ. यह जोड़ी तो तूने बनायी है.' रज्जो ने कहा. 

*****

संध्या विदा होकर अपनी ससुराल चली गयी. सब गुमसुम हो गये. घर की चहल-पहल जैसे कम हो गयी, अजीब सा सूनापन पूरे घर में पसर गया. दरअसल संध्या अपने परिवार में बातचीत के पुल का काम करती थी. कोई किसी से गुस्साया हुआ गाल फुला कर बैठा हो, वह उसे मनाकर और हंसा कर ही मानेगी. घर में दिन भर का हल्ला-गुल्ला और शोर उसी के बलबूते पर था. रत्ना बेंत की कुर्सी पर आँखें मूंदे बैठी हुई जाने क्या सोच रही है. रज्जो के साथ घर-गृहस्थी का काम लगा हुआ है. विद्याशंकर सुबह बिना नास्ता किए दूकान चले गए हैं. विद्योत्तमा टिफिन लेकर प्रेस चली गयी. छोटे भाई-बहन एक कमरे में घुसे हुए कुछ उल्टा-सीधा करने में लगे हैं क्योंकि उनके पास कोई काम नहीं है, गर्मी की छुट्टियां चल रही हैं, स्कूल खुलने में अभी देर है. 

आज सुबह के नास्ते में आलू-पोहा बना है. रज्जो अपनी सास के लिए प्लेट लेकर आई, 'मम्मीजी, थोडा सा नास्ता कर लो.'
'नहीं बहू, मेरा मन नहीं कर रहा है.' रत्ना ने कहा.
'ऐसा कैसे बनेगा? कुछ नहीं खाओगी तो तबीयत बिगड़ जाएगी.'
'मुझसे नहीं खाया जाएगा. तुमको मालूम है रज्जो, मेरी प्यारी बिटिया संध्या चली गयी?' रत्ना ने कहा और फफक-फफककर रोने लगी. रज्जो की आँखों से भी आंसू लुढ़कने लगे. 'सबको हंसाते रखती थी. वह थी तो घर में रौनक थी, अब सन्नाटा छा गया है.'
'आपकी बात सच है मम्मीजी लेकिन हर लड़की को एक दिन दूसरे घर में जाना ही होता है. आप भी एक दिन इस घर में आयी थी, मैं भी आयी हूँ.'
'जहाँ पले-बढ़े, उस घर को सदा के लिए छोड़कर जाना, हम औरतों के जीवन की यह बहुत विकट परीक्षा है.'
'पर मम्मीजी, एक बात समझाइए, उसी लड़की को कुछ समय बाद मायका पराया घर क्यों लगने लगता है?'
'क्योंकि घर का सम्बन्ध आपसी सम्बन्धों से बनाता है. सम्बन्ध निकटता से बनते हैं. जिससे निकटता बनती है उसके साथ सहजता विकसित हो जाती है. जिससे दूरी बन गयी, वह केवल शरीर से दूर नहीं होता, दिमाग से भी दूर हो जाता है.'
'तो क्या लड़की का मायके वालों से मानसिक जुड़ाव कम हो जाता है?'
'हाँ, उसका मानसिक जुड़ाव कम हो जाता है लेकिन लगाव बढ़ जाता है.'
'मैं समझी नहीं मम्मीजी.' 
'आपसी नजदीकी से सरोकार बढ़ता है जबकि दूरी से लगाव बढ़ता है. हर लड़की को शुरू-शुरू में मायके जाने की धुन लगी रहती है, यह धुन उसका लगाव बढ़ने के कारण होती है. कुछ समय बीत जाने के बाद ससुराली सरोकार का प्रभाव उसके मन-मस्तिष्क पर हावी हो जाता है तो फिर मायके की केवल याद आती है, वहाँ जाने की ललक कम हो जाती है.' रत्ना ने समझाया. बातचीत से माहौल हल्का हो गया था. रज्जो ने कहा, 'लो, अब थोड़ा सा खा लो, मैं आपके लिए चाय बनाकर लाती हूँ.'

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रत्ना को उन दिनों की याद आ गयी जब वह इस घर में बहू बनकर आई थी. घर में पुरोहिती वाला पुराना माहौल रत्ना को नहीं सुहाया क्योंकि उसके पापा नौकरी में थे इसलिए उसके परिवार के रहन-सहन में खुलापन था. यहाँ था पुराने विचारों वाले सास-ससुर, नाक तक घूँघट करके लकड़ी की आंच में दोनों समय का खाना तैयार करना. भोजन करवाने के लिए सास, ससुर और पति का इंतज़ार करना बेहद उबाऊ था, लेकिन था. सास ऐसी थी कि जब तक ससुरजी न खा लें, वह नहीं खाती थी. मान लो, ससुर जी के पास कोई यजमान आकर बैठ गया तो खाने की सुध भूल जाते थे या वे किसी यजमान के घर पूजन के लिए चले गए तो उनके लौटने के समय का कोई ठिकाना न था. सास-बहू पानी पी-पीकर अपनी भूख स्थगित करती थी और मन-ही-मन अपनी स्त्री-योनि में जन्म को कोसती बैठी रहती. उस बीच यदि कृपाशंकर दूकान से आ जाते तो उन्हें भोजन परोस दिया जाता.
एक दिन की बात है, खाते-खाते कृपाशंकर ने रत्ना से पूछा, 'क्यों अम्मा ने खा लिया?'
'नहीं खाया. बाबूजी की प्रतीक्षा कर रही हैं.'
'क्यों अम्मा, खाना क्यों नहीं खाया?'
'तुम्हारे बाबूजी आ जाएं तो उनके बाद हम खाएं.' अम्माजी ने उत्तर दिया.
'और वो संझा तक न आएं तो तुम भूखी बैठी रहोगी?
'क्या करें? बैठना पड़ेगा.'
'ये सब पुराने रिवाज़ छोड़ो अम्मा. ऐसे में तो तबीयत बिगड़ जाएगी आपकी. समय से खाना खा लिया करो.'
'जीवन भर निभा लिया कृपा, अब इस उमर में नियम कैसे बदलें?'
'बदल दो. जब तक निभा सकती थी, निभा लिया लेकिन इस उम्र में अधिक समय तक भूखा रहना आपके लिए उचित नहीं है. रत्ना, तुम अम्माजी की थाली लगाओ. बैठो अम्मा, मेरे सामने खाओ.'
'तुम्हारे बाबूजी को मालूम पड़ गया तो वो क्या सोचेंगे?'
'मैं उनको समझा दूंगा.' कृपा ने कहा. 'आज से कोई किसी का इंतज़ार नहीं करेगा. सब समय से अपनी थाली परोसो और खा लो, हम लोग जब आएँगे, तब खा लेंगे.' 

रत्ना और कृपाशंकर की शादी को मुश्किल से तीन माह बीते होंगे, कृपाशंकर के पुराने इश्क की खबर रत्ना तक पहुँच गयी. रत्ना एकबारगी बहुत विचलित हुई परन्तु उसने चुप रहना उचित समझा. वह उस समय की प्रतीक्षा करना चाहती थी जब उस किस्से के बारे में कृपाशंकर खुद बताए लेकिन कृपाशंकर ने कभी चर्चा नहीं की, रत्ना ने कभी पूछा नहीं. रत्ना समझती थी कि विवाह के पूर्व के सम्बन्ध यदि विवाह के बाद के रिश्ते पर हावी हुए तो उनकी ज़िन्दगी में संदेह का जहर घुल जाएगा इसलिए उसने उस प्रकरण पर चुप रहने का निर्णय लिया और चुप रही. रत्ना ने अपने असीम प्यार से कृपाशंकर के अतीत पर हमेशा के लिए एक अ-पारदर्शी पर्दा टांग दिया.

कृपाशंकर के पिता पंडित जटाशंकर चाहते थे कि उनका पुरोहिती का काम कृपा संभाल ले लेकिन उसे वह काम पसंद न था. जबलपुर के साम्यवादियों की संगत में उसका दिमाग फिर गया था और पूजा-पाठ के नाम से उसे वितृष्णा हो गयी थी. आजीविका चलाने के लिए उसने पुस्तक बेचने की दूकान खोल ली. पंडित जटाशंकर ने कहा, 'तुमको पूजापाठ पसंद नहीं तो कोई बात नहीं, मत करो लेकिन अपनी दूकान में पूजा-पाठ-विधि की पुस्तक तो बेच सकते हो या उसमें भी तुमको आपत्ति है?'
'पुस्तक बेचने में क्या है, कोई भी हो, रख लेंगे.' कृपा ने उत्तर दिया. धीरे-धीरे उसकी दूकान पूरे शहर में 'धार्मिक पुस्तकों की दूकान' के नाम से लोकप्रिय हो गयी. 
कृपाशंकर को पान खाने का बहुत शौक था. सुबह तैयार होकर सबसे पहले पान के पत्ते को धोकर उसके दो टुकड़े करते फिर उसे टेबल पर बिछाते, पान पर चूना और कत्था लगाते और उन्हें करीने से कपड़े में लपेट कर बांस से बने मचला में बनाकर रखते थे जो उनके दिन भर की खुराक थी. एक कपड़े का बटुवा भी उनके साथ रहता था जिसमें सुपारी, सुपारी काटने का सरोता, देसी तम्बाखू, चूने और पिपरमेंट की डिब्बियां भी होती थी. तम्बाखू से इतना लगाव था कि उसे फांके बिना उनका दस्त खुलासा नहीं होता था. सुबह की चाय के बाद तुरंत पान की गिलौरी मुंह में प्रविष्ट होती तो रात्रि-भोजन के बाद तक चलती.  
रत्ना को कृपाशंकर का पान-तम्बाखू  खाना पसंद नहीं था क्योंकि जब वे मुंह में पान भर लेते तो जो बोलते, वह समझ में नहीं आता था, दूसरा थोड़ी-थोड़ी देर में उठकर थूकने जाते और इधर-उधर चित्रकारी करते और तीसरा उनके कुर्ते पर जो पान की पीक टपक जाती थी उसका दाग धोने में बहुत रगड़-घस करनी पड़ती थी. रत्ना ने कई बार समझाया लेकिन कृपाशंकर मानते ही न थे. रात को तो उनके बीच अक्सर कहा-सुनी हो जाती थी क्योंकि रत्ना को तम्बाखू की गंध पसंद न थी. रत्ना बोलती, 'हटो यहाँ से. मुंह में पान-तम्बाखू भरे रहते हो, मुझे बिलकुल पसंद नहीं.'
'पान ख़तम हो गया, मेरे मुंह में झांक कर देख लो चाहे प्रिये.' कृपाशंकर ने कहा.  
'अपनी तम्बाखू मेरे मुंह में घुसेड़ दोगे. मुझे नहीं देखना, जाओ, पहले ठीक से कुल्ला करके आओ.'
'अरे यार, तुम अजीब औरत हो. प्यार करने के मौसम में कानून-कायदा पेल देती हो.' कृपाशंकर खिसियाते हुए आँगन में जाकर कुल्ला किया और लौटकर बोले, 'छोडो, अब रहने दो, तुम  सो जाओ. सारा मूड उखड़ गया.' कहते हुए पान की एक और गिलौरी खाकर सो गये.

कृपाशंकर और रत्ना के तीन बच्चे हुए, सबसे बड़ा विद्याशंकर, मंझला प्रभुशंकर और सबसे छोटी प्रभा. प्रभा का विवाह जिला दमोह के हटा में हो गया. प्रभा के विवाह के कुछ दिनों के बाद कृपाशंकर के गाल में छाले आए जो ठीक होने का नाम नहीं ले रहे थे. डाक्टर ने उन्हें पान-तम्बाखू छोड़ने की हिदायत दी लेकिन वह छूटा नहीं, तकलीफ बढती गयी. 'बायप्सी' हुई, गाल में मसूढ़े के पास कैंसर होने की पुष्टि हुई. विद्याशंकर अपने पिता को लेकर मुंबई गया, टाटा मेमोरियल में इलाज़ करवाया. कैन्सर तीसरे स्टेज पर था. दस महीने तक कृपाशंकर कैंसर से लड़ते रहे, अंततः कृपाशंकर हार गये, कैंसर जीत गया. रत्ना के जीवन में दुःख भरा सूनापन आ घुसा. प्रभा के विवाह और कैंसर के इलाज़ में घर और दूकान का सारा पैसा निकल गया. क़र्ज़ मांगकर  कृपाशंकर की अंतिम औचारिकताएं पूरी हुई. किताबों की दूकान विद्याशंकर देखने लगा, प्रभुशंकर की राजस्व विभाग में सरकारी नौकरी लग गयी.

'मम्मीजी, लो चाय पी लो.' रज्जो की आवाज़ सुनकर रत्ना चौंकी. उसने रज्जो को देखा और उसकी आँखों से आंसू के दो बूँद टपक पड़े. रज्जो ने कहा, 'अरे, आप अभी तक रो रही हो?'
'तेरे पापाजी की याद आ गयी. तूने तो उन्हें देखा नहीं, बहुत अच्छे थे वे.' रत्ना का गला भर आया. 'मुझे असमय छोड़कर चले गए.'

ट्रांजिस्टर में विविधभारती कार्यक्रम में पुरानी फिल्मों के गीत आ रहे थे. लता मंगेशकर का गाया गीत समुद्र की उद्दाम लहरों की तरह पूरे वातावरण में पसर गया, 'चल दिए दे के गम, ये न सोचा कि हम, इस जहाँ में अकेले किधर जाएंगे...'  

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