मध्यम मध्यम : आठ :
*आठ*
मध्यमवर्गीय परिवार बेहोशी में जीते हैं. बेहोशी शब्द का प्रयोग इसलिए किया कि ऐसे परिवारों की कोई पूर्व योजना नहीं होती. इन्हें भगवान और सरकार की व्यवस्था पर अकूत भरोसा होता है. हर ख़ुशी में भगवान को ख़ुशी-ख़ुशी प्रसाद चढ़ा देते हैं और यदि कोई दुःख आया तो उसके सामने बैठकर आंसू बहा लेते है. सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह मंहगाई दूर कर देगी, शिक्षा और स्वस्थ्य का मुफीद इंतजाम करेगी, अदालतों में न्याय फटाफट मिलने लगेगा, पुलिस सज्जनता की प्रतिमूर्ति बन जाएगी, सरकारी दफ्तरों में रिश्वत बंद हो जाएगी, रेल समय पर चलेगी, वह सुबह कभी-न-कभी तो आएगी !
ये सपने हैं, मधुर सपने, जो नींद खुलते ही टूट जाते हैं लेकिन अगली रात को जब सोते हैं और वही सपने देखते हैं और फिर से खुश हो लेते हैं. वे ये भी सोचते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ने-लिखने में तेज निकलेंगे, अच्छी नौकरी में लग जाएंगे या बड़ा व्यापार करेंगे, या इंडस्ट्री लगाएंगे और ढेर सारा पैसा कमा कर लाएंगे.
ये सब दिमाग में चलता है लेकिन कार्यरूप में परिणित नहीं होता, होनी को ग्रहण लग जाता है क्योंकि सारे प्रयास सार्थक योजना और पर्याप्त अर्थ के अभाव में भसक जाते हैं. अर्थाभाव आम हिन्दुस्तानी की ला-इलाज़ बीमारी है, इधर कमाई बढ़ती है, उधर मंहगाई बढ़ जाती है. घर में दो लोग ऐसे होंगे जो एक-एक पैसा बचाकर जोड़ते होंगे तो दो ऐसे होंगे जिनके हाथ एकदम खुले होंगे. मान लो सब बचतवीर हैं तो भी जन्मदिन मनाना पड़ेगा, रिश्तेदारी में जाना होगा, विवाह धूमधाम से होगा, तेरहवीं में खर्च होगा जैसे अनेक धन-प्रवाहक प्रपंच हर समय सिर उठाए घूमते रहते हैं. बिना पैसे और बिना योजना के जीवनयापन का अभूतपूर्व कारनामा दिखाते-करते वे इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उनको समझ में ही नहीं आता कि वे अपने परिवार के स्टेज में जादूगर जैसा बेमिसाल प्रदर्शन कर रहे हैं.
मध्यमवर्गीय लोग किसी की सम्पन्नता को देखकर विचलित होने लगते हैं क्योंकि वे भी सम्पन्नता के सिंहासन पर बैठकर गर्व से मुस्कुराना चाहते हैं, पर क्या करें? गौर कीजिएगा, सम्पन्न व्यक्ति मध्यम और निम्न वर्ग के व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखता है, जैसे अंग्रेज हमारी गुलामी के दिनों में हम हिन्दुस्तानियों को देखकर कहां करते थे, 'ये, जमीन पर बैठकर हगने वाला काला आदमी..'; मध्यवर्ग गरीब व्यक्ति को कामचोर और परम आलसी मानता है और अवसर मिलने पर उसका आर्थिक और शारीरिक शोषण करता है; वहीं पर गरीब व्यक्ति सम्पन्न और मध्यवर्ग से घनघोर घृणा करता है क्योंकि उसे लगता है कि उस सुख से वह क्यों वंचित है?
असुविधाओं की छाँव में जीता हुआ मनुष्य संतोषी हो जाता है लेकिन यदि उसे अनायास धनप्राप्ति हो जाए तो दबी हुई इच्छाएँ सिर उठाने लगती हैं. इस स्थिति में मध्यमवर्गीय बहक जाता है और गरीब आदमी पगला जाता है. विद्याशंकर का परिवार असुविधाओं से ग्रस्त मध्यमवर्गीय परिवार है, इसके उलट प्रभुशंकर सतना में तहसीलदारी का सुख भोग रहे हैं. आर्थिक खींचा-तानी के दौर में विद्याशंकर के परिवार को मकान बिकने से अच्छी धनप्राप्ति हुई तो कई दिल मचलने लगे लेकिन रत्ना के रहते दिल मचले और मचल कर चुप बैठ गए. दरअसल, उस पैसे पर रत्ना का एकल नियंत्रण था, रत्ना से कुछ कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी. रत्ना 'केल्कुलेटिव्ह' महिला थी, 'इमोशनल' नहीं. उसकी नज़र में नए घर को व्यवस्थित करना सर्वोच्च प्राथमिकता थी. रजिस्ट्री होने के बाद तुरंत पेंटर और बढ़ई का काम लगवा दिया ताकि मंगली सोनार को निर्धारित समयसीमा के पहले ही मकान का कब्जा दिया जा सके. रत्ना चाहती थी कि घर में एक बाइक आ जाए तो विद्याशंकर और विद्योत्तमा को आने-जाने का आराम हो जाए इसीलिए उसने विद्योत्तमा को स्कूटर का पता करने के लिए कहा था.
*****
प्रेस में फुर्सत थी. ज़रूरी समाचार प्रिंट के लिए भेजे जा चुके थे. चाय का समय होने वाल था. विद्योत्तमा अपनी सीट से उठकर विवेक के सामने आकर बैठ गयी. 'आप मेरी एक सहायता करेंगे?' उत्तमा ने पूछा.
'आदेश कीजिए, जज साहिबा.' विवेक ने कहा.
'क्या मैं जज बन गयी?'
'नहीं बनी हो तो बन जाओगी, अब कितनी देर है?'
'ताना कस रहे हो?'
'नहीं, मैं व्यक्ति की योग्यता को आसानी से समझ लेता हूँ. लक्ष्य के लिए जैसा फोकस होना चाहिए, वह आप में है.'
'इंटरव्यू में वे मुझसे न जाने क्या पूछेंगे? मेरा जी बहुत घबरा रहा है.'
'अभी घबरा लीजिए, कोई बात नहीं लेकिन इंटरव्यू देते समय घबराहट नहीं होनी चाहिए.'
'ओके.'
'अच्छा ये बताइये, मेरी क्या सहायता चाहिए?'
'एक स्कूटर खरीदना है, कौन सी लूं?'
'एक डीलर मेरा दोस्त है, शाम को छुट्टी मिलने पर उसके शोरूम चलेंगे, बात कर लेते हैं.'
'ठीक है.'
'लौटते में काफी पिलानी पड़ेगी.'
'हाय राम, छोटा सा काम करवाने के फीस देनी पड़ती है?'
'वह बात नहीं है, काफी पीना तो साथ बैठकर बतियाने का बहाना है. जज बनने के बाद आप कहाँ, मैं कहाँ?' विवेक ने कहा. विद्योत्तमा मुस्कुरा दी.
स्कूटर एजेंसी से विवरण हासिल करने के बाद दोनों इन्डियन काफी हाउस पहुँच गए. 'क्या लोगी?' विवेक ने पूछा.
'डोसा, मसाला डोसा.' विद्योत्तमा ने कहा।
'वेटर, दो मसाला डोसा.' विवेक ने आर्डर दिया।
'सुनाइये.'
'क्या सुनाऊं? दिल बैठा जा रहा है.'
'अरे, क्या हो गया?'
'आप जानती हो फिर भी अन्जान बनकर प्रश्न करती हो.'
'आपके दिल का हाल मुझे कैसे मालूम होगा भला? दिल आपका है, आपको जानकारी होगी.'
'फिर छोडिए, यह बताइए कि इंटरव्यू कब है?
'आज से पंद्रह दिन बाद, उस दिन मंगलवार है.'
'मंगलवार? कोई विशेष बात?'
'मंगल को मंगल होता है.'
'इसका मतलब यह हुआ कि आपका जज बनना पक्का हो गया.'
'क्या पता, इस बेढब माहौल में मेरी जगह कहाँ है. अगर बन गयी तो मेरा सपना साकार हो जाएगा, मेहनत सफल हो जाएगी.'
'और मेरा पत्ता साफ़ हो जाएगा?'
'किसका किससे जोड़ा बना हुआ है, कौन जीवन भर साथ देगा, किसकी कैसे निभेगी, कल की कौन जानता है विवेक जी?'
'यह सही है कि कल का किसी को नहीं मालूम लेकिन मेरी सोच है कि मनुष्य अपना भविष्य खुद लिखता है. क्या आप अगर कोशिश नहीं करती तो जज बनने के इतना नज़दीक पहुँच जाती? वैसा ही जीवन साथी के मामले में होता है. कितने लोग हैं जो सोच-समझ कर जोड़ा बनाते हैं? अधिकतर लोग जोड़ा बन जाने के बाद सोचने-समझने का काम करते हैं.'
'यह बताइए, आपने किसे खोजा है? '
'आपको नहीं मालूम?'
'मैं तो पहले ही आपकी सूची से निकल चुकी.'
'आप खुद निकल गयी लेकिन मेरी सूची में आप आज भी हो, एकदम अकेली.'
'अगर मैं जज बन गयी तब?'
'तब भी.'
'अगर न बनी तब?'
'तब भी.' विवेक ने कहा.
'यह तो आपकी पसंद की बात हुई. आपने मुझसे तो पूछा नहीं कि मुझे कौन पसंद है?'
'मुझे मालूम है.'
'अच्छा? कौन है?'
'कोई नहीं है इसीलिए मैं प्रयास में लगा हूँ.'
'और अगर कोई होता?'
'तो मैं उसमें हस्तक्षेप कभी नहीं करता.'
'हाल-फिलहाल, डोसा आ गया है, खा लीजिए.'
'मुझे लगता है कि आप पिघलने वाली नहीं हैं.'
'मैं अपने जीवन के फैसले खुद लेती हूँ और अपनी मम्मी से 'सेकेण्ड ओपीनियन' लेती हूँ. आपके बारे में उनसे चर्चा कर चुकी हूँ. आपके लिए खुशखबरी है कि वे आपके पक्ष में हैं लेकिन मैं इस विषय में कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेना चाहती. जज बनने का फैसला हो जाने दीजिए. आप तो यह मनाइए कि मेरा सिलेक्शन न हो.'
'लेकिन मैं कामना रहा हूँ कि आपका सिलेक्शन अवश्य हो, मेरा विवाह आपसे हो, न हो.' विवेक ने मजबूती से कहा.
*****
साक्षात्कार की तारीख नज़दीक आ रही थी इसलिए विद्योत्तमा ने तैयारी करने के लिए प्रेस से अवकाश ले लिया. रविवार की रात को वह अपने पापा के साथ नर्मदा एक्सप्रेस से इंदौर के लिए रवाना हो गयी. इंदौर पहली बार गयी थी, उसे शहर बहुत अच्छा लगा. शाम को राज्य लोक सेवा आयोग का लोकेशन देखने गयी, अगली सुबह नौ बजे वहां पहुँचना जो था.
राज्य लोक सेवा आयोग के कार्यालय में खास चहल-पहल नहीं थी. कुछ लोग दिखे जो साक्षात्कार देने के लिए आए हुए थे. दो घंटे की उबाऊ प्रतीक्षा के पश्चात विद्योत्तमा को बुलाया गया. सधे कदमों से वह कमरे के अन्दर प्रविष्ट हुई. उस बड़े कमरे में दो बड़ी टेबल को जोड़कर रखा गया था जिसके पीछे चार लोग बैठे हुए थे. उनके पीछे महात्मा गांधी का फ्रेम-जटित चित्र लगा हुआ था. विद्योत्तमा ने सबसे पहले महात्मा गाँधी के चित्र को हाथ जोड़कर प्रणाम किया, उसके बाद सभी को अलग-अलग अभिवादन किया और प्रश्नवाचक मुद्रा में वहां रखी एक कुर्सी के पीछे खड़ी हो गयी. एक ने पूछा, 'आप विद्योत्तमा मिश्र हैं?'
'जी.'
'बैठिये.'
'धन्यवाद.'
'आप जज बनना चाहती हैं, क्यों?'
'क्योंकि यह जिम्मेदारीपूर्ण कार्य है.'
'क्या अन्य कार्य ज़िम्मेदारी वाले नहीं होते?'
'प्रत्येक काम ज़िम्मेदारी वाला होता है लेकिन इस पद की ज़िम्मेदारी का असर केवल कर्ता पर नहीं होता, न्याय की आस में आए दोनों पक्षों पर भी होता है.'
'न्याय से आपका तात्पर्य क्या है?'
'किसी प्रकरण-विशेष को विधि की कसौटी में कसकर जांचना और उसका निष्कर्ष निकालना.'
'एक प्रकरण है जिसकी सेशन्स अदालत सुनवाई कर रही है. मान लीजिए, आप जज हैं. मामला खुले-आम हत्या का है. सुनवाई के दौरान घटना के दौरान प्रत्यक्षदर्शी गवाह पुलिस को दिए पूर्व बयान से मुकर गए हैं. परीक्षण और प्रतिपरीक्षण के समय भी वे अभियोजन की कहानी में भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं लेकिन परिस्थितिजन्य प्रमाण हैं कि मृतक के पेट में छुरा घुसेड़कर हत्या की गयी है और वह अपराध किसी एक व्यक्ति के द्वारा किया गया है. सुनवाई के दौरान आपको समझ में आ गया कि हत्या इसी अभियुक्त ने ही की है लेकिन पुलिस, गवाह और उनके बयानों से स्पष्ट संकेत नहीं मिल रहा है कि हत्या उसी आरोपी ने की है. आप क्या अभियुक्त को दोषी मानेंगी?'
'ऐसी स्थिति में मैं अभियुक्त को संदेहलाभ देकर बरी कर दूंगी.'
'क्यों?'
'क्योंकि अभियोजन और प्रत्यक्षदर्शी गवाह यह सिद्ध करने में असफल रहे हैं कि हत्या की वारदात उसी व्यक्ति ने की थी, जो अभियुक्त पेश किया गया है. हो सकता है कि किसी अन्य व्यक्ति ने हत्या की हो.'
'क्या यह न्याय होगा?'
'कानून की कसौटी पर यह न्याय होगा.' विद्योत्तमा ने उत्तर दिया.
'मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य में क्या अंतर है?' दूसरे साक्षात्कार-कर्ता ने प्रश्न किया.
'मौलिक अधिकार के हनन को अदालत में चुनौती दी जा सकती है लेकिन मौलिक कर्तव्य को नहीं.'
'मृत्यु-पूर्व दिए गए बयान का प्रकरण पर कितना प्रभाव होता है?'
'विधि की दृष्टि में मृत्यु के पूर्व मनुष्य झूठ नहीं बोलता. उसके कथन को अकाट्य साक्ष्य माना जाता है और वह निश्चित रूप से फैसले को प्रभावित करता है.'
'पति के द्वारा की गयी क्रूरता के लिए कौन सा प्रावधान है? इस अपराध की अधिकतम सज़ा क्या है?'
'पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा स्त्री के प्रति की गई क्रूरता पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के अंतर्गत 3 वर्ष के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है.'
'क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 197 में क्या निर्दिष्ट है?'
'माफ़ कीजिए, इसके बारे में मुझे नहीं मालूम.'
'वे कौन से सिविल मामले हैं जो सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार में नहीं होते?'
'आयकर, सर्विस मैटर, मोटर-दुर्घटना दावा, किसी व्यक्ति की जाति निर्धारित करने आदि मामलों में दीवानी अदालत को अधिकार नहीं है.'
'क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में किसी को जमानत पर छोड़ने का क्या प्रावधान है?'
'धारा 437 के अधीन मजिस्ट्रेट को आजीवन कैद या मृत्युदंडनीय अपराध होने पर जमानत मंजूर करने का अधिकार नहीं है, हाँ, महिला या नाबालिग या अत्यंत बीमार या शिथिलांग को जमानत पर छोड़ा जा सकता है.'
'आप कहाँ से आई हैं, आई मीन, घर कहाँ है आपका?' तीसरे ने पूछा.
'जबलपुर.'
'जबलपुर और कटनी के बीच रेल यात्रा की है आपने?'
'जी, कई बार.'
'इन दोनों के बीच कौन-कौन से स्टेशन हैं?'
'कटनी से शुरू करूं या जबलपुर से?'
'कटनी से.'
'NSDSGDA.'
'क्या मतलब?'
'निवार, स्लीम्नाबाद रोड, डुंडी, सिहोरारोड, गोसलपुर, देवरी, अधारताल.'
'यह बताइए, अभी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कौन हैं?'
'जस्टिस ए.एस. आनंद.'
'अपराध क्यों होते हैं?' चौथे ने पूछा.
'अपराध के मूल में कई कारण होते हैं, कुसंस्कार, पागलपन, किसी प्रताड़ना का बदला, आपसी विद्वेष, आर्थिक अभाव आदि. वैसे, इन सबके मूल में सहनशीलता की कमी बड़ा कारण होती है.'
'क्या अपराध मनोवृत्ति है?'
'आदतन अपराधी को अपराधिक मनोवृत्ति से जोड़ा जा सकता है, सभी अपराधों के साथ ऐसी बात नहीं होती. जो आदतन अपराधी होते हैं, अपराध करना उनका मनोरंजन है. जैसे आदतन बलात्कारी के समक्ष यदि स्त्री सम्भोग के लिए स्वयं रजामंद हो जाए तो उसे उसमें आनंद नहीं मिलेगा. वह चाहता है कि स्त्री उसका प्रतिरोध करे और वह उससे जबरदस्ती करे. दरअसल उसका आनंद स्त्री को पीड़ित करने में है. वहीँ पर कुछ अपराध क्षणिक आवेग के वशीभूत हो जाते हैं, कई पूर्वनियोजित भी होते हैं.' विद्योत्तमा ने उत्तर दिया.
'आप जा सकती हैं.' पहले ने कहा.
'आप सबको धन्यवाद.' उत्तमा ने सबको झुककर प्रणाम किया और धीरे से कमरे के बाहर हो गयी.
*****
आज शाम को पांच बजे विद्योत्तमा के सम्मान में नवभारत प्रेस में एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया गया है जिसमें विद्योत्तमा के परिवार को भी बुलाया गया है. एक कमरे में अनौपचारिक शैली में कार्यक्रम शुरू हुआ. प्रबंध संपादक ने बोलना शुरू किया, 'मित्रों, हमारे प्रेस के लिए यह अत्यंत प्रसन्नता और गौरव का अवसर है कि हमारी सहयोगी विद्योत्तमा मिश्रा का चयन सिविल जज के पद पर हुआ है. विद्योत्तमा ने अपनी लगन और कर्मठता से इस मुकाम को हासिल किया है. नवभारत प्रेस और हम सबकी ओर से आपके जीवन की इस नई भूमिका के लिए आपको बधाई देते हैं और हम सबकी शुभकामनाएं आपके साथ हैं. इतने समय से हम सब साथ काम कर रहे हैं, आप निःसंदेह योग्य हैं, कर्तव्यनिष्ठ हैं. आशा है कि इसी उत्साह और जोश-खरोश के साथ आमजन को न्याय दिलाने में आप सक्रिय रहेंगी. इस अवसर पर विद्योत्तमा जी से आग्रह है कि वे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के इए संघर्ष के बारे में हमें बताएं और मार्गदर्शन करें.'
'आदरणीय सर और साथियों, मैं आभारी हूँ सर के प्रति. जब से मैं यहाँ आई, वे मेरा मार्गदर्शन करते रहे और उनकी बातों से मेरा हौसला बढ़ता रहा. बड़ी मुश्किल से यहाँ तक पहुँच पाई हूँ. कई बार मेरे कदम डगमगाए लेकिन रुके नहीं. एक जज से मेरी शादी तय हो रही थी, मैं इंकार कर दिया, शादी कर लेती तो ससुराल में मज़े करती और बिना जज बने जज को मिलने वाली सुविधाओं का लाभ उठाती लेकिन मैं मज़े करने के लिए इस दुनिया में नहीं आई हूँ, कुछ ऐसा काम करने के लिए आई हूँ जो मुझे सांसारिक सुख भले न दे बल्कि संतोष दे. वकालत पास करने बाद कुछ समय के लिए मैं अदालत गयी, काम सीखने. वहां जो कुछ मैंने देखा, वह मेरे मन को दुखी कर गया. इंसाफ के लिए भटकते इंसान को अदालत में जितना परेशान होना पड़ता है, उसे देखकर मुझे बहुत क्षोभ हुआ. मुझे ऐसा लगा, जैसे, न्यायालय न्याय का मंदिर न हो, दंगल का प्रदर्शन-स्थल हो. वहां न्याय-अन्याय का फैसला नहीं होता. जो मजबूत होता है, वह जीत जाता है और जो सीधा-सादा है, निर्धन है वह मुंहकी खा जाता है. भ्रष्टाचार की सज़ा देने वाली अदालतें हर कदम पर भ्रष्टाचरण की शिकार हैं और वे शक्तिसंपन्न होने के बावजूद कुछ नहीं कर पाती! मुझे लगा कि इस व्यवस्था को सही करने के लिए मुझे इसमें घुसना होगा, शक्ति से लैस होकर घुसना पड़ेगा, तब मैंने जज बनने का फैसला लिया और उसे फोकस किया. मैं जानती हूँ कि मेरी दशा महाभारत के अभिमन्यु जैसी हो सकती है लेकिन मैं अभिमन्यु से बेहतर कौशल का प्रदर्शन करने की कोशिश करूंगी. आप मुझे सिरफिरा समझ रहे होंगे, कोई बात नहीं, लेकिन न्याय की आस में भटकते लोगों को मुझ जैसे कई सिरफिरों की ज़रुरत है.
इस संस्थान में काम करते हुए मैंने आमजन की तकलीफों को करीब से देखा है. मैं अखबार में न आती तो मैं आसपास की दुनिया और उसकी उम्मीदों को शायद ही समझ पाती. मैंने देखा कि पत्रकार भी जज की भूमिका निभाता है और त्वरित न्याय देने की क्षमता रखता है. किसी सार्वजनिक मुद्दे पर पत्रकार की टिप्पणी किसी जज के फैसले से कम नहीं होती. फर्क सिर्फ यह होता है कि जज वैधानिक फैसले देते हैं और पत्रकार विधानसम्मत-सामाजिक टिप्पणी करते हैं. नागरिकों की समस्याओं को दायित्व के साथ उजागर करने का काम हमारा अखबार जिम्मेदारी से निभा रहा है. आप सब मेरे गुरु हैं, आपसे मैंने दुनियादारी सीखी, दुनिया को देखने का नज़रिया सीखा और उन्हें कलमबद्ध करने का हुनर भी. ये सब मुझे मेरी आगामी चुनौती में बहुत काम आएगा. मुझे अपना आशीर्वाद दीजिए ताकि मैं अपने अभियान में सफल हो सकूं और जो मेरे मन में है, उसे हासिल कर सकूं. सर आपको और आप सबको बहुत धन्यवाद.
मेरी दादीजी यहाँ उपस्थित हैं, मम्मी हैं, पापा हैं, मेरे छोटे भाई-बहन यहाँ उपस्थित हैं. मेरी इस सफलता में इन सबने भी बहुत मेहनत की है. हमारे परिवारों में लड़कियों को उनकी योग्यता को जानते हुए भी उन्हें आगे बढ़ाने में बहुत संकोच होता है. ऐसी हिचक मेरे घर में नहीं थी. मेरे परिवार ने मुझे अपनी राह चुनने की आज़ादी दी, और मेरा लगातार हौसला बढ़ाया जिसका परिणाम आपके सामने है. मैं नतमस्तक हूँ.' विद्योत्तमा ने अपनी बात पूरी की.
कार्यक्रम की समाप्ति के बाद सबने विद्योत्तमा को घेर लिया, बधाई दी. चाय के बाद सब लोग जाने लगे. विद्योत्तमा विवेक के पास गयी और बोली, 'आज रात को नौ बजे आप मेरे घर आएँगे?'
'क्यों?' विवेक ने आश्चर्य से पूछा.
'आपका भोजन है हमारे घर में.'
'किस ख़ुशी में?'
'मैं आपको अपने परिवार से मिलवाना चाहती हूँ.'
'यहाँ भी मिलवा सकती हो, क्यों नहीं मिलवाया?'
'यहाँ आपका परिचय एक पत्रकार के रूप में करवाती लेकिन घर में आपका परिचय होने वाले दामाद के रूप में करवाना है.'
'सच?'
'हाँ, सच.' विद्योत्तमा ने मुस्कुराते हुए बताया.
(समाप्त)
==========
मध्यमवर्गीय परिवार बेहोशी में जीते हैं. बेहोशी शब्द का प्रयोग इसलिए किया कि ऐसे परिवारों की कोई पूर्व योजना नहीं होती. इन्हें भगवान और सरकार की व्यवस्था पर अकूत भरोसा होता है. हर ख़ुशी में भगवान को ख़ुशी-ख़ुशी प्रसाद चढ़ा देते हैं और यदि कोई दुःख आया तो उसके सामने बैठकर आंसू बहा लेते है. सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह मंहगाई दूर कर देगी, शिक्षा और स्वस्थ्य का मुफीद इंतजाम करेगी, अदालतों में न्याय फटाफट मिलने लगेगा, पुलिस सज्जनता की प्रतिमूर्ति बन जाएगी, सरकारी दफ्तरों में रिश्वत बंद हो जाएगी, रेल समय पर चलेगी, वह सुबह कभी-न-कभी तो आएगी !
ये सपने हैं, मधुर सपने, जो नींद खुलते ही टूट जाते हैं लेकिन अगली रात को जब सोते हैं और वही सपने देखते हैं और फिर से खुश हो लेते हैं. वे ये भी सोचते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ने-लिखने में तेज निकलेंगे, अच्छी नौकरी में लग जाएंगे या बड़ा व्यापार करेंगे, या इंडस्ट्री लगाएंगे और ढेर सारा पैसा कमा कर लाएंगे.
ये सब दिमाग में चलता है लेकिन कार्यरूप में परिणित नहीं होता, होनी को ग्रहण लग जाता है क्योंकि सारे प्रयास सार्थक योजना और पर्याप्त अर्थ के अभाव में भसक जाते हैं. अर्थाभाव आम हिन्दुस्तानी की ला-इलाज़ बीमारी है, इधर कमाई बढ़ती है, उधर मंहगाई बढ़ जाती है. घर में दो लोग ऐसे होंगे जो एक-एक पैसा बचाकर जोड़ते होंगे तो दो ऐसे होंगे जिनके हाथ एकदम खुले होंगे. मान लो सब बचतवीर हैं तो भी जन्मदिन मनाना पड़ेगा, रिश्तेदारी में जाना होगा, विवाह धूमधाम से होगा, तेरहवीं में खर्च होगा जैसे अनेक धन-प्रवाहक प्रपंच हर समय सिर उठाए घूमते रहते हैं. बिना पैसे और बिना योजना के जीवनयापन का अभूतपूर्व कारनामा दिखाते-करते वे इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उनको समझ में ही नहीं आता कि वे अपने परिवार के स्टेज में जादूगर जैसा बेमिसाल प्रदर्शन कर रहे हैं.
मध्यमवर्गीय लोग किसी की सम्पन्नता को देखकर विचलित होने लगते हैं क्योंकि वे भी सम्पन्नता के सिंहासन पर बैठकर गर्व से मुस्कुराना चाहते हैं, पर क्या करें? गौर कीजिएगा, सम्पन्न व्यक्ति मध्यम और निम्न वर्ग के व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखता है, जैसे अंग्रेज हमारी गुलामी के दिनों में हम हिन्दुस्तानियों को देखकर कहां करते थे, 'ये, जमीन पर बैठकर हगने वाला काला आदमी..'; मध्यवर्ग गरीब व्यक्ति को कामचोर और परम आलसी मानता है और अवसर मिलने पर उसका आर्थिक और शारीरिक शोषण करता है; वहीं पर गरीब व्यक्ति सम्पन्न और मध्यवर्ग से घनघोर घृणा करता है क्योंकि उसे लगता है कि उस सुख से वह क्यों वंचित है?
असुविधाओं की छाँव में जीता हुआ मनुष्य संतोषी हो जाता है लेकिन यदि उसे अनायास धनप्राप्ति हो जाए तो दबी हुई इच्छाएँ सिर उठाने लगती हैं. इस स्थिति में मध्यमवर्गीय बहक जाता है और गरीब आदमी पगला जाता है. विद्याशंकर का परिवार असुविधाओं से ग्रस्त मध्यमवर्गीय परिवार है, इसके उलट प्रभुशंकर सतना में तहसीलदारी का सुख भोग रहे हैं. आर्थिक खींचा-तानी के दौर में विद्याशंकर के परिवार को मकान बिकने से अच्छी धनप्राप्ति हुई तो कई दिल मचलने लगे लेकिन रत्ना के रहते दिल मचले और मचल कर चुप बैठ गए. दरअसल, उस पैसे पर रत्ना का एकल नियंत्रण था, रत्ना से कुछ कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी. रत्ना 'केल्कुलेटिव्ह' महिला थी, 'इमोशनल' नहीं. उसकी नज़र में नए घर को व्यवस्थित करना सर्वोच्च प्राथमिकता थी. रजिस्ट्री होने के बाद तुरंत पेंटर और बढ़ई का काम लगवा दिया ताकि मंगली सोनार को निर्धारित समयसीमा के पहले ही मकान का कब्जा दिया जा सके. रत्ना चाहती थी कि घर में एक बाइक आ जाए तो विद्याशंकर और विद्योत्तमा को आने-जाने का आराम हो जाए इसीलिए उसने विद्योत्तमा को स्कूटर का पता करने के लिए कहा था.
*****
प्रेस में फुर्सत थी. ज़रूरी समाचार प्रिंट के लिए भेजे जा चुके थे. चाय का समय होने वाल था. विद्योत्तमा अपनी सीट से उठकर विवेक के सामने आकर बैठ गयी. 'आप मेरी एक सहायता करेंगे?' उत्तमा ने पूछा.
'आदेश कीजिए, जज साहिबा.' विवेक ने कहा.
'क्या मैं जज बन गयी?'
'नहीं बनी हो तो बन जाओगी, अब कितनी देर है?'
'ताना कस रहे हो?'
'नहीं, मैं व्यक्ति की योग्यता को आसानी से समझ लेता हूँ. लक्ष्य के लिए जैसा फोकस होना चाहिए, वह आप में है.'
'इंटरव्यू में वे मुझसे न जाने क्या पूछेंगे? मेरा जी बहुत घबरा रहा है.'
'अभी घबरा लीजिए, कोई बात नहीं लेकिन इंटरव्यू देते समय घबराहट नहीं होनी चाहिए.'
'ओके.'
'अच्छा ये बताइये, मेरी क्या सहायता चाहिए?'
'एक स्कूटर खरीदना है, कौन सी लूं?'
'एक डीलर मेरा दोस्त है, शाम को छुट्टी मिलने पर उसके शोरूम चलेंगे, बात कर लेते हैं.'
'ठीक है.'
'लौटते में काफी पिलानी पड़ेगी.'
'हाय राम, छोटा सा काम करवाने के फीस देनी पड़ती है?'
'वह बात नहीं है, काफी पीना तो साथ बैठकर बतियाने का बहाना है. जज बनने के बाद आप कहाँ, मैं कहाँ?' विवेक ने कहा. विद्योत्तमा मुस्कुरा दी.
स्कूटर एजेंसी से विवरण हासिल करने के बाद दोनों इन्डियन काफी हाउस पहुँच गए. 'क्या लोगी?' विवेक ने पूछा.
'डोसा, मसाला डोसा.' विद्योत्तमा ने कहा।
'वेटर, दो मसाला डोसा.' विवेक ने आर्डर दिया।
'सुनाइये.'
'क्या सुनाऊं? दिल बैठा जा रहा है.'
'अरे, क्या हो गया?'
'आप जानती हो फिर भी अन्जान बनकर प्रश्न करती हो.'
'आपके दिल का हाल मुझे कैसे मालूम होगा भला? दिल आपका है, आपको जानकारी होगी.'
'फिर छोडिए, यह बताइए कि इंटरव्यू कब है?
'आज से पंद्रह दिन बाद, उस दिन मंगलवार है.'
'मंगलवार? कोई विशेष बात?'
'मंगल को मंगल होता है.'
'इसका मतलब यह हुआ कि आपका जज बनना पक्का हो गया.'
'क्या पता, इस बेढब माहौल में मेरी जगह कहाँ है. अगर बन गयी तो मेरा सपना साकार हो जाएगा, मेहनत सफल हो जाएगी.'
'और मेरा पत्ता साफ़ हो जाएगा?'
'किसका किससे जोड़ा बना हुआ है, कौन जीवन भर साथ देगा, किसकी कैसे निभेगी, कल की कौन जानता है विवेक जी?'
'यह सही है कि कल का किसी को नहीं मालूम लेकिन मेरी सोच है कि मनुष्य अपना भविष्य खुद लिखता है. क्या आप अगर कोशिश नहीं करती तो जज बनने के इतना नज़दीक पहुँच जाती? वैसा ही जीवन साथी के मामले में होता है. कितने लोग हैं जो सोच-समझ कर जोड़ा बनाते हैं? अधिकतर लोग जोड़ा बन जाने के बाद सोचने-समझने का काम करते हैं.'
'यह बताइए, आपने किसे खोजा है? '
'आपको नहीं मालूम?'
'मैं तो पहले ही आपकी सूची से निकल चुकी.'
'आप खुद निकल गयी लेकिन मेरी सूची में आप आज भी हो, एकदम अकेली.'
'अगर मैं जज बन गयी तब?'
'तब भी.'
'अगर न बनी तब?'
'तब भी.' विवेक ने कहा.
'यह तो आपकी पसंद की बात हुई. आपने मुझसे तो पूछा नहीं कि मुझे कौन पसंद है?'
'मुझे मालूम है.'
'अच्छा? कौन है?'
'कोई नहीं है इसीलिए मैं प्रयास में लगा हूँ.'
'और अगर कोई होता?'
'तो मैं उसमें हस्तक्षेप कभी नहीं करता.'
'हाल-फिलहाल, डोसा आ गया है, खा लीजिए.'
'मुझे लगता है कि आप पिघलने वाली नहीं हैं.'
'मैं अपने जीवन के फैसले खुद लेती हूँ और अपनी मम्मी से 'सेकेण्ड ओपीनियन' लेती हूँ. आपके बारे में उनसे चर्चा कर चुकी हूँ. आपके लिए खुशखबरी है कि वे आपके पक्ष में हैं लेकिन मैं इस विषय में कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेना चाहती. जज बनने का फैसला हो जाने दीजिए. आप तो यह मनाइए कि मेरा सिलेक्शन न हो.'
'लेकिन मैं कामना रहा हूँ कि आपका सिलेक्शन अवश्य हो, मेरा विवाह आपसे हो, न हो.' विवेक ने मजबूती से कहा.
*****
साक्षात्कार की तारीख नज़दीक आ रही थी इसलिए विद्योत्तमा ने तैयारी करने के लिए प्रेस से अवकाश ले लिया. रविवार की रात को वह अपने पापा के साथ नर्मदा एक्सप्रेस से इंदौर के लिए रवाना हो गयी. इंदौर पहली बार गयी थी, उसे शहर बहुत अच्छा लगा. शाम को राज्य लोक सेवा आयोग का लोकेशन देखने गयी, अगली सुबह नौ बजे वहां पहुँचना जो था.
राज्य लोक सेवा आयोग के कार्यालय में खास चहल-पहल नहीं थी. कुछ लोग दिखे जो साक्षात्कार देने के लिए आए हुए थे. दो घंटे की उबाऊ प्रतीक्षा के पश्चात विद्योत्तमा को बुलाया गया. सधे कदमों से वह कमरे के अन्दर प्रविष्ट हुई. उस बड़े कमरे में दो बड़ी टेबल को जोड़कर रखा गया था जिसके पीछे चार लोग बैठे हुए थे. उनके पीछे महात्मा गांधी का फ्रेम-जटित चित्र लगा हुआ था. विद्योत्तमा ने सबसे पहले महात्मा गाँधी के चित्र को हाथ जोड़कर प्रणाम किया, उसके बाद सभी को अलग-अलग अभिवादन किया और प्रश्नवाचक मुद्रा में वहां रखी एक कुर्सी के पीछे खड़ी हो गयी. एक ने पूछा, 'आप विद्योत्तमा मिश्र हैं?'
'जी.'
'बैठिये.'
'धन्यवाद.'
'आप जज बनना चाहती हैं, क्यों?'
'क्योंकि यह जिम्मेदारीपूर्ण कार्य है.'
'क्या अन्य कार्य ज़िम्मेदारी वाले नहीं होते?'
'प्रत्येक काम ज़िम्मेदारी वाला होता है लेकिन इस पद की ज़िम्मेदारी का असर केवल कर्ता पर नहीं होता, न्याय की आस में आए दोनों पक्षों पर भी होता है.'
'न्याय से आपका तात्पर्य क्या है?'
'किसी प्रकरण-विशेष को विधि की कसौटी में कसकर जांचना और उसका निष्कर्ष निकालना.'
'एक प्रकरण है जिसकी सेशन्स अदालत सुनवाई कर रही है. मान लीजिए, आप जज हैं. मामला खुले-आम हत्या का है. सुनवाई के दौरान घटना के दौरान प्रत्यक्षदर्शी गवाह पुलिस को दिए पूर्व बयान से मुकर गए हैं. परीक्षण और प्रतिपरीक्षण के समय भी वे अभियोजन की कहानी में भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं लेकिन परिस्थितिजन्य प्रमाण हैं कि मृतक के पेट में छुरा घुसेड़कर हत्या की गयी है और वह अपराध किसी एक व्यक्ति के द्वारा किया गया है. सुनवाई के दौरान आपको समझ में आ गया कि हत्या इसी अभियुक्त ने ही की है लेकिन पुलिस, गवाह और उनके बयानों से स्पष्ट संकेत नहीं मिल रहा है कि हत्या उसी आरोपी ने की है. आप क्या अभियुक्त को दोषी मानेंगी?'
'ऐसी स्थिति में मैं अभियुक्त को संदेहलाभ देकर बरी कर दूंगी.'
'क्यों?'
'क्योंकि अभियोजन और प्रत्यक्षदर्शी गवाह यह सिद्ध करने में असफल रहे हैं कि हत्या की वारदात उसी व्यक्ति ने की थी, जो अभियुक्त पेश किया गया है. हो सकता है कि किसी अन्य व्यक्ति ने हत्या की हो.'
'क्या यह न्याय होगा?'
'कानून की कसौटी पर यह न्याय होगा.' विद्योत्तमा ने उत्तर दिया.
'मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य में क्या अंतर है?' दूसरे साक्षात्कार-कर्ता ने प्रश्न किया.
'मौलिक अधिकार के हनन को अदालत में चुनौती दी जा सकती है लेकिन मौलिक कर्तव्य को नहीं.'
'मृत्यु-पूर्व दिए गए बयान का प्रकरण पर कितना प्रभाव होता है?'
'विधि की दृष्टि में मृत्यु के पूर्व मनुष्य झूठ नहीं बोलता. उसके कथन को अकाट्य साक्ष्य माना जाता है और वह निश्चित रूप से फैसले को प्रभावित करता है.'
'पति के द्वारा की गयी क्रूरता के लिए कौन सा प्रावधान है? इस अपराध की अधिकतम सज़ा क्या है?'
'पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा स्त्री के प्रति की गई क्रूरता पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के अंतर्गत 3 वर्ष के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है.'
'क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 197 में क्या निर्दिष्ट है?'
'माफ़ कीजिए, इसके बारे में मुझे नहीं मालूम.'
'वे कौन से सिविल मामले हैं जो सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार में नहीं होते?'
'आयकर, सर्विस मैटर, मोटर-दुर्घटना दावा, किसी व्यक्ति की जाति निर्धारित करने आदि मामलों में दीवानी अदालत को अधिकार नहीं है.'
'क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में किसी को जमानत पर छोड़ने का क्या प्रावधान है?'
'धारा 437 के अधीन मजिस्ट्रेट को आजीवन कैद या मृत्युदंडनीय अपराध होने पर जमानत मंजूर करने का अधिकार नहीं है, हाँ, महिला या नाबालिग या अत्यंत बीमार या शिथिलांग को जमानत पर छोड़ा जा सकता है.'
'आप कहाँ से आई हैं, आई मीन, घर कहाँ है आपका?' तीसरे ने पूछा.
'जबलपुर.'
'जबलपुर और कटनी के बीच रेल यात्रा की है आपने?'
'जी, कई बार.'
'इन दोनों के बीच कौन-कौन से स्टेशन हैं?'
'कटनी से शुरू करूं या जबलपुर से?'
'कटनी से.'
'NSDSGDA.'
'क्या मतलब?'
'निवार, स्लीम्नाबाद रोड, डुंडी, सिहोरारोड, गोसलपुर, देवरी, अधारताल.'
'यह बताइए, अभी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कौन हैं?'
'जस्टिस ए.एस. आनंद.'
'अपराध क्यों होते हैं?' चौथे ने पूछा.
'अपराध के मूल में कई कारण होते हैं, कुसंस्कार, पागलपन, किसी प्रताड़ना का बदला, आपसी विद्वेष, आर्थिक अभाव आदि. वैसे, इन सबके मूल में सहनशीलता की कमी बड़ा कारण होती है.'
'क्या अपराध मनोवृत्ति है?'
'आदतन अपराधी को अपराधिक मनोवृत्ति से जोड़ा जा सकता है, सभी अपराधों के साथ ऐसी बात नहीं होती. जो आदतन अपराधी होते हैं, अपराध करना उनका मनोरंजन है. जैसे आदतन बलात्कारी के समक्ष यदि स्त्री सम्भोग के लिए स्वयं रजामंद हो जाए तो उसे उसमें आनंद नहीं मिलेगा. वह चाहता है कि स्त्री उसका प्रतिरोध करे और वह उससे जबरदस्ती करे. दरअसल उसका आनंद स्त्री को पीड़ित करने में है. वहीँ पर कुछ अपराध क्षणिक आवेग के वशीभूत हो जाते हैं, कई पूर्वनियोजित भी होते हैं.' विद्योत्तमा ने उत्तर दिया.
'आप जा सकती हैं.' पहले ने कहा.
'आप सबको धन्यवाद.' उत्तमा ने सबको झुककर प्रणाम किया और धीरे से कमरे के बाहर हो गयी.
*****
आज शाम को पांच बजे विद्योत्तमा के सम्मान में नवभारत प्रेस में एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया गया है जिसमें विद्योत्तमा के परिवार को भी बुलाया गया है. एक कमरे में अनौपचारिक शैली में कार्यक्रम शुरू हुआ. प्रबंध संपादक ने बोलना शुरू किया, 'मित्रों, हमारे प्रेस के लिए यह अत्यंत प्रसन्नता और गौरव का अवसर है कि हमारी सहयोगी विद्योत्तमा मिश्रा का चयन सिविल जज के पद पर हुआ है. विद्योत्तमा ने अपनी लगन और कर्मठता से इस मुकाम को हासिल किया है. नवभारत प्रेस और हम सबकी ओर से आपके जीवन की इस नई भूमिका के लिए आपको बधाई देते हैं और हम सबकी शुभकामनाएं आपके साथ हैं. इतने समय से हम सब साथ काम कर रहे हैं, आप निःसंदेह योग्य हैं, कर्तव्यनिष्ठ हैं. आशा है कि इसी उत्साह और जोश-खरोश के साथ आमजन को न्याय दिलाने में आप सक्रिय रहेंगी. इस अवसर पर विद्योत्तमा जी से आग्रह है कि वे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के इए संघर्ष के बारे में हमें बताएं और मार्गदर्शन करें.'
'आदरणीय सर और साथियों, मैं आभारी हूँ सर के प्रति. जब से मैं यहाँ आई, वे मेरा मार्गदर्शन करते रहे और उनकी बातों से मेरा हौसला बढ़ता रहा. बड़ी मुश्किल से यहाँ तक पहुँच पाई हूँ. कई बार मेरे कदम डगमगाए लेकिन रुके नहीं. एक जज से मेरी शादी तय हो रही थी, मैं इंकार कर दिया, शादी कर लेती तो ससुराल में मज़े करती और बिना जज बने जज को मिलने वाली सुविधाओं का लाभ उठाती लेकिन मैं मज़े करने के लिए इस दुनिया में नहीं आई हूँ, कुछ ऐसा काम करने के लिए आई हूँ जो मुझे सांसारिक सुख भले न दे बल्कि संतोष दे. वकालत पास करने बाद कुछ समय के लिए मैं अदालत गयी, काम सीखने. वहां जो कुछ मैंने देखा, वह मेरे मन को दुखी कर गया. इंसाफ के लिए भटकते इंसान को अदालत में जितना परेशान होना पड़ता है, उसे देखकर मुझे बहुत क्षोभ हुआ. मुझे ऐसा लगा, जैसे, न्यायालय न्याय का मंदिर न हो, दंगल का प्रदर्शन-स्थल हो. वहां न्याय-अन्याय का फैसला नहीं होता. जो मजबूत होता है, वह जीत जाता है और जो सीधा-सादा है, निर्धन है वह मुंहकी खा जाता है. भ्रष्टाचार की सज़ा देने वाली अदालतें हर कदम पर भ्रष्टाचरण की शिकार हैं और वे शक्तिसंपन्न होने के बावजूद कुछ नहीं कर पाती! मुझे लगा कि इस व्यवस्था को सही करने के लिए मुझे इसमें घुसना होगा, शक्ति से लैस होकर घुसना पड़ेगा, तब मैंने जज बनने का फैसला लिया और उसे फोकस किया. मैं जानती हूँ कि मेरी दशा महाभारत के अभिमन्यु जैसी हो सकती है लेकिन मैं अभिमन्यु से बेहतर कौशल का प्रदर्शन करने की कोशिश करूंगी. आप मुझे सिरफिरा समझ रहे होंगे, कोई बात नहीं, लेकिन न्याय की आस में भटकते लोगों को मुझ जैसे कई सिरफिरों की ज़रुरत है.
इस संस्थान में काम करते हुए मैंने आमजन की तकलीफों को करीब से देखा है. मैं अखबार में न आती तो मैं आसपास की दुनिया और उसकी उम्मीदों को शायद ही समझ पाती. मैंने देखा कि पत्रकार भी जज की भूमिका निभाता है और त्वरित न्याय देने की क्षमता रखता है. किसी सार्वजनिक मुद्दे पर पत्रकार की टिप्पणी किसी जज के फैसले से कम नहीं होती. फर्क सिर्फ यह होता है कि जज वैधानिक फैसले देते हैं और पत्रकार विधानसम्मत-सामाजिक टिप्पणी करते हैं. नागरिकों की समस्याओं को दायित्व के साथ उजागर करने का काम हमारा अखबार जिम्मेदारी से निभा रहा है. आप सब मेरे गुरु हैं, आपसे मैंने दुनियादारी सीखी, दुनिया को देखने का नज़रिया सीखा और उन्हें कलमबद्ध करने का हुनर भी. ये सब मुझे मेरी आगामी चुनौती में बहुत काम आएगा. मुझे अपना आशीर्वाद दीजिए ताकि मैं अपने अभियान में सफल हो सकूं और जो मेरे मन में है, उसे हासिल कर सकूं. सर आपको और आप सबको बहुत धन्यवाद.
मेरी दादीजी यहाँ उपस्थित हैं, मम्मी हैं, पापा हैं, मेरे छोटे भाई-बहन यहाँ उपस्थित हैं. मेरी इस सफलता में इन सबने भी बहुत मेहनत की है. हमारे परिवारों में लड़कियों को उनकी योग्यता को जानते हुए भी उन्हें आगे बढ़ाने में बहुत संकोच होता है. ऐसी हिचक मेरे घर में नहीं थी. मेरे परिवार ने मुझे अपनी राह चुनने की आज़ादी दी, और मेरा लगातार हौसला बढ़ाया जिसका परिणाम आपके सामने है. मैं नतमस्तक हूँ.' विद्योत्तमा ने अपनी बात पूरी की.
कार्यक्रम की समाप्ति के बाद सबने विद्योत्तमा को घेर लिया, बधाई दी. चाय के बाद सब लोग जाने लगे. विद्योत्तमा विवेक के पास गयी और बोली, 'आज रात को नौ बजे आप मेरे घर आएँगे?'
'क्यों?' विवेक ने आश्चर्य से पूछा.
'आपका भोजन है हमारे घर में.'
'किस ख़ुशी में?'
'मैं आपको अपने परिवार से मिलवाना चाहती हूँ.'
'यहाँ भी मिलवा सकती हो, क्यों नहीं मिलवाया?'
'यहाँ आपका परिचय एक पत्रकार के रूप में करवाती लेकिन घर में आपका परिचय होने वाले दामाद के रूप में करवाना है.'
'सच?'
'हाँ, सच.' विद्योत्तमा ने मुस्कुराते हुए बताया.
(समाप्त)
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