मध्यम मध्यम : सात :

*सात*


विद्योत्तमा के पेपर्स अच्छे गये. फव्वारे वाले बड़े हनुमान जी को प्रणाम किया और मन-ही-मन कहा, 'हे बजरंगबली, इस बार मेरी नैय्या पार लगवा दो महराज. सिलेक्ट हो जाऊँगी तो नारियल के साथ सवा सेर लड्डू चढ़ाऊँगी परन्तु अभी से बता रही हूँ, लिखित में पास होने पर केवल नारियल चढ़ाऊँगी और इंटरव्यू में सिलेक्ट होने के बाद लड्डू चढ़ेगा. अभी से बताए देते हूँ, हाँ।'

लौटते में विद्योत्तमा ने कमानिया गेट ने दो लीटर दूध खरीदा और घर पहुँच गयी. मम्मी बोली, 'इतना सारा दूध क्यों ले आयी?'
'रखो इसको, कुछ काम है.' विद्योत्तमा ने कहा.
'क्या काम है?'
'नहाकर आती हूँ, फिर बताऊंगी.' कहती हुई बाथरूम में घुस गयी. अचानक घर के बाहर लगी काल-बेल बजी. रज्जो ने दरवाजा खोलकर देखा, बाहर एक रिक्शावाला खड़ा था, 'विद्योत्त्मा मिश्रा का घर यही है?' उसने पूछा.
'हाँ, यही है, क्यों?'
'फ्रिज आया है, उतार रहा हूँ. बताइये, कहाँ रखना है?' रिक्शा चालक ने पूछा. रज्जो आश्चर्यचकित हो गयी, 'फ्रिज, हमारे यहाँ?' रज्जो ने खुद से पूछा.

फ्रिज अन्दर आ गया. रज्जो तेजी से रत्ना के कमरे में गयी और घर में फ्रिज आने की खबर दी. रत्ना पलंग से उतर कर रसोईघर में आई. फ्रिज के दरवाजे को खोल कर देखा. ठंडी हवा का झोंका उनकी साड़ी के पल्लू को छूता हुआ निकल गया. झट से बंद किया और फ्रिज को प्यार से सहलाया. 'विद्या ने भेजा है?' रत्ना ने राजजो से पूछा.
'मुझे मालूम नहीं है, विद्योत्तमा को मालूम होगा. वो नहाने गयी है.' रज्जो ने कहा.
'पता है? आज उत्तमा बहुत सारा दूध लेकर आयी है, तभी मुझे कुछ खटका.'
'क्यों लायी?'
'मैंने पूछा तो बोली कि नहाकर आएगी, तब बताएगी.' रज्जो ने उत्तर दिया.

थोड़ी देर में उत्तमा अपने बालों से पानी झटकारते हुए किचन में आयी. 'फ्रिज आ गया? उसने पूछा.
'तेरे सामने है.' दादी ने कहा.
'कैसा लगा?'
'बहुत बढ़िया.'
'मम्मी बहुत परेशान थी, कभी बचा हुआ सामान खराब हो जाए, कभी दूध फट जाता था, अब सब ठीक रहेगा.'
'पापा भेजे हैं?'
'क्या पता?'
'फिर?'
'फिर क्या? मम्मी, दूध को औंटा लो, आज घर में आइसक्रीम बनेगी.'
'पूरे दूध की?'
'आधा बचा लो, कल काम आएगा.' उत्तमा ने कहा.

रात को भोजन के समय दादी ने पूछा, 'विद्या, फ्रिज आया है, तुमने भेजा?'
'नहीं तो. मैंने नहीं भेजा.'
'फिर किसने भेजा?' दादी ने उत्तमा से पूछा. उत्तमा मम्मी और पापा की तरफ देखकर मुस्कुराई और भोजन करने लगी. दादी समझ गयी और बोली, 'मेरी प्यारी बच्ची...'.

*****

विजय नगर कालोनी में दो मकानों की बुकिंग हो गयी. मकान तैयार थे. बिल्डर की शर्त थी, 'पूरा पैसा दो और कब्जा ले लो.' रत्ना को अपने मकान की रजिस्ट्री का इंतज़ार था, उसमें अभी समय बाकी था. प्रभुशंकर को घर के सौदे की जानकारी विद्याशंकर ने फोन पर दी तो उसने ठंडी सांस भरी और कोई शाब्दिक प्रतिक्रिया नहीं दी.

'राम-राम करते रजिस्ट्री का दिन भी आ गया. रत्ना ने एक दिन पहले मंगली को अपने घर बुलवाया और कहा, 'कल रजिस्ट्री होगी, सब कागज़ तैयार करवा लिए हो?'
'हाँ, अम्माजी, हमारी पूरी तैयारी है. रुपिया भी तैयार है, आप कहें तो अभी लाकर दे दूं.' मंगली ने बताया.
'जैसा मन आए तुम्हारे, आज और कल में क्या फर्क है?'
'आप ठीक कह रही हैं, कल रजिस्ट्री के पहले आपके हाथ में रख दूंगा.'
'एक बात कहनी है तुमसे, इसलिए बुलाया है.'
'जी कहिए.'
'कल से हमारा ये घर तुम्हारा हो जाएगा लेकिन ये बताओ, हम लोग जाएंगे कहाँ?'
'मैं क्या बताऊं, अम्मा जी?'
'ऐसा नहीं है. फैसला तुम्हारे हाथ में है.'
'वो कैसे?'
'विजयनगर में हमने मकान देख लिया है. तुम्हारा दिया पैसा वहां चला जाएगा. दो-चार दिन में रजिस्ट्री हो जाएगी और हमें कब्जा मिल जाएगा.'
'जी.'
'उसके बाद हमें पेंटिंग करवानी है, बढ़ई का काम करवाना है, पूरा घर सेट करना है. इसमें हमें कम-से-कम दो महीने का समय और लगेगा.'
'वो तो है.'
'इस बीच हम किराए का मकान खोज लेते हैं, वहां शिफ्ट हो जाएगे या तुम अगर राजी हो जाओ तो हम यहीं रह जाते हैं, किराया दे देंगे.'
'आप कैसी बात कर रही हैं? दो नहीं, चार महीना रहिए. जब आपका नया घर पूरा तैयार हो जाए, तब खाली करना लेकिन आपने किराये की बात कह कर मुझे बहुत दुखी कर दिया अम्माजी. आपसे किराया लूंगा मैं?'
'किराया तो लेना पड़ेगा मंगली भैया.'
'मुझे नरक नहीं जाना है. माफ़ करो.'
'फिर कैसे बनेगा?'
'आप आराम से रहो यहाँ, जिस दिन जाना हो उसके एक दिन पहले हमें सपरिवार बुलाकर भोजन करवा देना, वही मेरा किराया है.' मंगली ने हाथ जोड़ते हुए कहा.
'जैसी तुम्हारी इच्छा. एक बात है, हम ब्राह्मणों के घर सादा खाना बनता है, लहसुन प्याज हम लोग नहीं खाते.'
'हम तो आपके घर भगवान को अर्पित प्रसाद लेने आएँगे, उसमें लहसुन-प्याज का क्या काम? हाँ, मिठाई मैं लेकर आऊँगा.' मंगली ने कहा.
'चलो, ठीक है. भोलेशंकर तुम पर सदा कृपादृष्टि बनाए रखें.' रत्ना ने कहा.

*****

सुबह का सात बज गया है. हनुमान ताल के मंदिरों से प्रसारित घंटों की आवाज चारों और गूँज रही है. हवा बह रही है इसलिए ठंडक अधिक महसूस हो रही है. रत्ना अपनी पुरानी शाल ओढ़े गिलास में गर्म चाय पी रही है. रत्ना को आज चाय में स्वाद नहीं आ रहा है, 'क्यों रज्जो, आज चाय कैसी बनाई तुम, मज़ा सा नहीं आ रहा है.' रत्ना ने ऊंची आवाज में कहा.
'घर में अदरक नहीं था, शायद इसीलिए चाय में स्वाद न आ रहा होगा.' रज्जो ने संकोच करते हुए उत्तर दिया.
'तो अदरक मंगवा लिया करो. ठण्ड में अदरक के बिना मीठी चाय भी सीठी लगती है.'
'जी, आज इनसे कहूँगी तो ले आएँगे.'
'तुम नहा ली?'
'अभी तो चौके में ही लगी हूँ, जाती हूँ थोड़ी देर में.'
'तुम्हें देर हो तो पहले हम नहा लें? आज खेर माई के मंदिर चलना है.'
'वहां तो आप नौ-दुर्गा में जाती हो, आज अचानक कैसे?'
'आज बहुत बड़ा पाप करने जा रहे हैं, पुरखों का घर बेच रहे हैं. माई से क्षमा मांग लें.'
'ठीक है आप नहा लो, पानी गरम किए देते हैं. फिर हम भी जल्दी से नहा लेंगे और आपके साथ चलेंगे.' रज्जो ने कहा.

सास-बहू खेर माई पहुँच गयी. रत्ना ने माई के समक्ष अपना सिर नवाया और रो-रोकर अपना माथा पटकने लगी. रज्जो घबरा गयी, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. पास में उपस्थित एक महिला ने उन्हें उठाया और समझाने लगी, 'कौन सा दुःख आ गया आपके ऊपर? अब यहाँ मैया के दरबार में आई हो, सब ठीक हो जाएगा.' रत्ना ने कोई जवाब नहीं दिया, बस रोये जा रही थी. माई के दर्शन के पश्चात मंदिर के बाहर बने चबूतरे पर आ कर बैठ गयी और बोली, 'रज्जो, आज ये पाप मेरे हाथ से होने वाला है, वे होते तो ये पाप मेरे ऊपर न लगता लेकिन वो तो छोड़कर चले गए. हम क्या करें? सोच रही थी कि अपने जीते-जी पुरखों का घर न बिकने दूंगी लेकिन प्रभु की जिद के कारण बेचना पड़ रहा है.'
'बहुत सी घटनाएं जीवन में ऐसी होती हैं जिसमें हमारा वश नहीं चलता अम्माजी.' रज्जो ने समझाया.
'तुम्हारे दादा ससुर ने यह घर अपने सामने खड़े होकर बनवाया होगा. जब कोई अपना घर बनवाता है तो सिर्फ घर नहीं बनाता, सपने बुनकर अपने लिए आसरा बनाता है. घर बनवाने वाला एक दिन चला जाता है, उसका शरीर जाता है लेकिन उसकी आत्मा नहीं जाती, यहीं रह जाती है और अपने बनाए घर के किसी कोने में अदृश्य होकर स्थापित रहती है.'
'ऐसा क्या?'
'हाँ.  वह आत्मा अगली पीढ़ी की हर गतिविधि पर नज़र रखती है. देखो, विपत्ति तो सबके ऊपर आती है लेकिन जो पूर्वजों का मान करते हैं वे सहजता से उसके पार निकल जाते हैं क्योंकि पूर्वज उनकी सहायता अप्रत्यक्ष रूप से करते रहते हैं लेकिन जिन घरों में बड़े-बूढ़ों या पूर्वजों का मान नहीं होता, वहाँ पूर्वज चुपचाप देखते रहते हैं, निष्क्रिय रहते हैं और विपत्तियों के समय अपना हाथ खींच लेते हैं.'
'जब अपना घर बिक जाएगा तो हमारे पूर्वज कहाँ जाएगे?'
'हाँ, हम उन्हें अपने नये घर में ले जाएगे.'
'कैसे?'
'जब गृह प्रवेश का पूजन होगा तब देवताओं और ग्रहों के आव्हान के पश्चात अपने पूर्वजों का आव्हान करेंगे और उन्हें भी वहां स्थापित करेंगे. बुलाने से वे तो आ जाएंगे लेकिन स्थाई रूप से रोकने के लिए उनकी पसंद का भोजन बनाना पड़ता है तब वे रुकते हैं.'
'दादा जी को क्या पसंद था?'
'उन्हें खीर अच्छी लगती थी, चावल की खीर, उसमें केसर डाल देना पर उसमें काजू मत डालना.'
'क्यों?'
'उनके दांत नहीं थे इसलिए वे काजू को चबा नहीं पाते थे.'
'तो क्या आत्मा के साथ भी दांतों की समस्या होगी?'
'यह प्रश्न नहीं, कुतर्क है. भावना को समझ बहू.  उनकी मनपसंद वस्तु को उन्हीं की रूचि से बनाकर अर्पित करना हमारी भावना प्रदर्शित करती है, ये सब प्रतीक हैं जिनके माध्यम से उन्हें याद किया जाता है.'
'जी, मैं ध्यान रखूँगी.'
'एक पुरानी घटना याद आई, बताऊँ? जब मैं घर में नयी बहू बन कर आई थी तो एक दिन घर में खीर बनी. मैंने उसमें काजू और किशमिश डाल दिया.'
'फिर क्या हुआ?'
'ससुर जी ने काजू के सब टुकड़े खीर से निकालकर सास जी को दे दिए और कहा, "तुम इसको चबाकर मुझे दे दो तब मैं खा पाऊँगा" तो सास ने अपना मुखड़ा घूँघट में छुपा लिया और बोली, "पंडित जी, बहू के सामने ऐसी बात बोलने में आपको लाज नहीं आती?''. उन दोनों की बात सुनकर मुझे बहुत जोर से हंसी आई लेकिन मैं उन दोनों के सामने हंस नहीं सकती थी इसलिए अपने कमरे में जाकर खूब हंसी.'
'ससुर जी बहुत मजाकिया थे क्या?'
'पुराने लोगों की पुरानी बातें. अच्छा चलो, अब घर चलते हैं, देर हो रही है.'

मंदिर से निकलते समय रत्ना ने खेर माई को पुनः शीश नवाया और बोली, 'मैय्या, क्या करें, हम मजबूर हैं, जय हो माई की.' मंदिर की चारदीवारी से बाहर होते ही उनके रीढ़ की हड्डी तन कर सीढ़ी हो गयी और वे तेज कदमों से घर की ओर चल पड़ी, रज्जो उनकी गति को पकड़ने के लिए दौड़ सी रही थी.

*****

रजिस्ट्री हो गयी. रजिस्ट्री के कागजात पर दस्तखत करते हुए रत्ना की उंगलियाँ काँप रही थी, आँखों में आंसू भर आये. यह क्या हो गया? इस घर में ब्याह कर आई थी, पराये घर से आयी थी लेकिन रहते-रहते यहीं की होकर रह गयी. इनके साथ हंसी-ख़ुशी के दिन बिताए. तीन बच्चों की मां बनी, सब बच्चों का ब्याह इसी घर से किया. सोचती थी कि इसी घर मेरी अर्थी उठेगी, मेरी तो नहीं, इनकी उठ गयी. मैं अब जीते-जी यहाँ से निकलूँगी. कैसे मेरे पैर इस घर की देहरी से बाहर उठेंगे?

सुबह से गूंजती मंदिरों की शंखध्वनि और तालाब के उस पार से आती अजान की आवाज क्या विजयनगर में भी सुनाई पड़ेगी? हर त्यौहार में मंगल-गीत गाती पूजा के लिए आती श्रद्धालु स्त्रियाँ, दुर्गा विसर्जन की भीड़ और 'जय हो मैय्या' का उद्घोष, तालाब से हो कर आती मंद हवाएं, ये सब हमेशा के लिए मुझसे छूट जाएगा. सुबह से लेकर रात तक लाउडस्पीकर में बजते फ़िल्मी और धार्मिक गीत, दूर से आती कव्वाली की ढोलक की धमक के बिना कैसे मेरा दिन कटेगा?

क्या बताऊँ? लग रहा है कि रजिस्ट्री को फाड़कर फेंक दूं लेकिन अब तो बात मेरे हाथ से निकल गयी, यहाँ आने के पहले मंगली सोनार सौ के नोट की गड्डियां थैले में भरकर दे गया. जिस क्षण मैंने उस थैले को छुआ, उसी क्षण मेरा घर मेरे हाथ से निकल कर पराया हो गया. हे भोलेनाथ, कैसा दिन दिखाया मुझे, प्रभो?

रत्ना घर लौट कर आई तो देहरी में पैर रखते समय सहसा ऐसा लगा जैसे किसी और के घर में कदम रख रही हो. वह अन्दर आकर दरवाजे से टिक गयी और रोने लगी. रज्जो को आहट मिली तो वह दौड़ कर रत्ना के पास आई, उन्हें संभाला और सहारा देकर उनकी कुर्सी पर ले जाकर बैठा दिया. उन्हें एक गिलास पानी लाकर दिया. रत्ना ने मना किया तो रज्जो बोली, 'जैसा विधि ने रच रखा है, वैसा हो रहा है. आप खुद को क्यों दोषी मानती हैं? लीजिए, पानी पी लीजिए. अगर कुछ हाथ से निकल जाता है तो उसके बदले कुछ और आता है, यही दुनिया की रीत है, अम्मा जी.'

घर में सन्नाटा छाया रहा, किसी ने किसी से कुछ बात नहीं की. सब एक-दूसरे को देखते, कोई कुछ बोलने की कोशिश करता तो गला रुंध जाता. उदासी ने जैसे पूरे घर को अपनी बाहों में घेर लिया हो. यह तो अच्छा है कि इंसान घटनाओं को भूलता जाता है अन्यथा वह पगला जाए.

अगले दिन से गतिविधियाँ सामान्य होने लगी, बातचीत का  सिलसिला शुरू हो गया. रत्ना ने देखा कि विद्याशंकर नास्ता कर रहे हैं, वहीँ पहुँच गयी और कहा, 'घर में इतना सारा रुपया रखा हुआ, इसे यहाँ से हटाओ आज. बिल्डर को एक लाख एडवांस दिया था, आठ लाख और लेते जाओ, दोनों फ्लेट का भुगतान दे देना और रसीद लेते आना. रसीद देने में आनाकानी करे तो रुपया वापस ले लेना, मुंह-जबानी का भरोसा करने लायक नहीं है आजकल. रजिस्ट्री कब होगी और कितना खर्च आएगा, पूछ लेना.'
'ठीक है, अभी वहीँ चले जाता हूँ.' विद्या ने कहा.
'विद्योत्तमा कहाँ है?'
'मुझे नहीं मालूम. रज्जो, बुलवाओ उसको.'
'आज दूकान देर से खोलना, पहले बिल्डर का काम करो फिर मेरे पास वापस आओ.'
'फिर क्या काम है?'
'लौट कर आओ बताती हूँ.' रत्ना ने कहा.
'आपने बुलाया दादी?' विद्योत्तमा ने पूछा.
'हाँ, आज समय निकाल कर पता करो, कौन सी स्कूटर अच्छी है? क्या कीमत है उसकी?'
'जी दादी.' विद्योत्तमा ने कहा.

विद्याशंकर बिल्डर का भुगतान देकर घर लौटे तब रत्ना ने ढाई लाख और देकर कहा, 'इसे बैंक में मेरे खाते में जमा करवा दो. रूपया संभालकर ले जाना, बैंक में उठाईगीर घूमते रहते हैं जो चकमा देकर लूट लेते हैं, जरा सावधानी से.'
'रज्जो को अपने साथ लेते जाऊं?'
'हाँ, ले जाओ. एक से दो भले. बैंक का काम होने के बाद प्रभु को फोन कर दो, अपना पैसा आकर ले जाए.' रत्ना ने कहा.

*****

विद्योत्तमा को प्रेस में घुसते ही खबर मिली, सिविल जज की लिखित परीक्षा का रिजल्ट आया है. धड़कते दिल से उसने लिस्ट देखी, नामों की भीड़ में एक नाम दमक रहा था, 'विद्योत्तमा मिश्र'. वह सीधे प्रबंध संपादक के चेंबर में गयी और उन्हें यह सूचना देकर उनके चरणस्पर्श किए और आशीर्वाद माँगा. उन्होंने पूछा, 'घर में खबर कर दी?'
'मुझे अभी-अभी मालूम हुआ है, सबसे पहले आपके पास आई हूँ खबर देने. शाम को घर जाऊँगी तब खबर दूंगी, सरप्राइज़.'
'तुम अभी घर जाओ, तुरंत, सेकण्ड हाफ में आ जाना. तुम्हारी मेहनत रंग लायी, बधाई.'
'आपका आशीर्वाद और बढ़ावा मुझे बराबर मिलता रहा, इसी का परिणाम है. अब थोड़ा जोर और लगा दीजिए ताकि साक्षात्कार में भी सफल हो जाऊं.'
'किससे कहना है? बताओ.'
'किसी से नहीं कहना है, बस, मुझसे कहिए, 'विद्योत्तमा तुम सफल हो'.'
'ऐसा ही हो.' प्रबंध संपादक ने उत्तमा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

विद्योत्तमा प्रेस से घर लौटते समय पापा से मिली. उन्हें सुसमाचार सुनाकर चरण-स्पर्श किए. बड़े हनुमान के पास गयी, उनको प्रणाम किया और नारियल अर्पित किया. उनको धन्यवाद दिया और मन--ही-मन कहा, 'यहाँ तक ले आए लेकिन अभी तो नैय्या बीच भंवर है, उस पार ले चलो बड़े दादा जी.'

वहां से बड़कुल की दूकान से खोवा की जलेबी लेकर घर पहुँच गयी. घर में सबसे पहले मम्मी से आमना-सामना हुआ. खबर को सुनकर मां-बेटी एक दूसरे से लिपट गयी. आहट सुनकर दादी बाहर आयी, 'क्या हुआ?' उत्तमा ने उन्हें खबर सुनाई और उनके सामने घुटनों के बल बैठकर रोने लगी. दादी ने उसे प्यार से उठाया और अपने सीने से लगा लिया. उसके बाद खोवा की जलेबी मिलजुल कर, हंस-हंसकर उदरस्थ हुई. रज्जो ने उत्तमा के पापा और छोटे भाई-बहन के लिए जलेबियाँ बचा कर रख लिया. घर बिक जाने का तनिक दुःख कम हो गया.

'अब तुम्हारा जज बनना निश्चित हो गया?' विद्याशंकर ने पूछा.
'नाव में सवार हो गयी हूँ लेकिन उस पार जाना बहुत मुश्किल है पापा. आज बड़े हनुमान जी के पास गयी थी, उन्हें याद दिलाकर आई हूँ.' विद्योत्तमा ने कहा.
'अब तो केवल इंटरव्यू बचा है, वह तुम निकाल लोगी.'
'इतना आसान नहीं है. मैंने जानकार लोगों से बात की है. इंटरव्यू बोर्ड में कम-से कम चार लोग बैठते हैं, उनमें एक वरिष्ठ जज, दो आयोग के अधिकारी जो आई.ए.एस. रैंक के होते हैं और एक विषय के विशेषज्ञ. कुल पदों के आधे से अधिक पद संविधान के आरक्षण नियमों को समर्पित हो जाते हैं, शेष पदों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा है लेकिन योग्यता की नहीं, सिफारिश की.'
'क्या मतलब?'
'अभी तक जो चयनित हुए हैं उनकी सूची देखने से यह समझ में आ रहा ही कि उनमें वरिष्ठ जज और आई.ए.एस. अधिकारियों के बच्चे बहुत हैं. इसका एक अर्थ यह निकलता है कि सिफारिश के आधार पर इंटरव्यू में अंक कम या ज्यादा किए जाते हैं ताकि मनचाहे लोगों का सिलेक्शन किया जा सके. उसके बाद केंद्र सरकार का कोटा हो सकता है  हाईकोर्ट का हो सकता है और मुख्यमंत्री का भी. इनसे बचकर कोई सकुशल निकल जाए तो वह सिलेक्ट हो.'
'तुम तो 'नवभारत' में हो, मैंने सुना है, तुम्हारे प्रधान संपादक की मुख्यमंत्री से अच्छी पटती है, उनसे बोलो तो मुख्यमंत्री के कोटे में आ जाओगी.'
'उन्होंने मुझसे खुद होकर पूछा था लेकिन मैंने उन्हें मना कर दिया.'
'अरे, मना कर दिया, क्यों?'
'पापा, इन सारी बाधाओं को मैं पार कर सकी तो ठीक है, जज बनूंगी किन्तु किसी योग्य व्यक्ति का हक़ मार कर मुझे जज नहीं बनना.'
'तू किस ज़माने की लड़की है रे?'
'इसी ज़माने की हूँ. एक बात बताओ पापा, अन्याय की सीढ़ी से चढ़कर सफल होने के बाद क्या मैं उस कुर्सी पर बैठकर न्याय कर पाऊँगी?'
'बात में दम तो है.'
'फिर मुझे अपने ढंग से बढ़ने दीजिए. क्या होगा? अधिक-से-अधिक मैं जज नहीं बन पाऊँगी, और क्या होगा? नहीं बनी तो वकालत करूंगी या पत्रकारिता करूंगी. मुझे अपनी ज़िंदगी में जो काम मिलेगा, करूंगी, तन्मयता से करूंगी. मैं अपनी आत्मा को गिरवी नहीं रखने वाली, यह मेरा निश्चय है.' विद्योत्तमा ने अपना निर्णय सुनाया.
'कब है इंटरव्यू?'
'आयोग से पत्र आएगा, तब पता चलेगा.'
'तब तक?'
'चैन की बंशी बजेगी.' विद्योत्तमा ने कहा, 'मैं चलूँ पापा, नींद आ रही है.'

*****

'सुनो, ऐसे जिद पकड़ेगी तो विद्योत्तमा यहीं रह जाएगी.' विद्याशंकर रजाई ओढ़े बोले.
'भगवान की कृपा से वह जज बन जाएगी, देखना.' रज्जो ने उत्तर दिया. 'मुझे अपने कमरे में जाने दो. थक गयी हूँ, नींद आ रही है.'
'भगवान के पास तो सभी प्रत्याशी जाएंगे तो क्या सब सिलेक्ट हो जाएंगे?'
'तुम नास्तिक हो गए हो क्या?'
'आस्तिक-नास्तिक की बात क्यों कर रही हो? मेरा सवाल गलत है क्या?'
'बात सही है लेकिन भगवान पर भरोसा करने से भरोसा जगता है.'
'चलो तुम्हारी बात मान लेते हैं. तुम मेरी बात मान जाओ.'
'कौन सी बात?'
'बहुत ठण्ड लग रही है, आज मेरे साथ सो जाओ.'
'बहुत सो ली तुम्हारे साथ, रहने दो, मैं अपने कमरे में जा रही हूँ.' रज्जो सांय से कमरे के बाहर निकल गयी. विद्याशंकर निराश होकर अपने दोनों घुटने मोड़े और गर्भस्थ शिशु की तरह चुपचाप सो गए.

*****

दूकान में सन्नाटा था. ग्राहकों की कमी थी. एक ग्राहक आता हुआ दिखा, आकर बैठ गया और बोला, 'विद्याशंकर पहचाने मुझे?'
'हाँ, चेहरा तो याद आ रहा है, आपका फोटो अखबार में देखा हूँ.'
'फोटो भर देखा, अरे फोटो के नीचे नाम भी लिखा रहता है.'
'वो तो है पर सच में याद नहीं आ रहा है.'
'अरे, मैं, पारसचंद जैन, भूल गया तू, अपन माडल हाई स्कूल में साथ पढ़ते थे.'
'याद आया, पारस तू? क्या हाल है तेरा?'
'मज़े हैं. आजकल राजनीति में आ गया हूँ. सांसद प्रतिनिधि बन गया हूँ, एक दिन सांसद भी बन जाऊँगा. चाय नहीं पिलाएगा क्या?'
'अभी बुलवाता हूँ.'
'परिवार में सब ठीक है?'
'क्या ठीक है यार? हमारा घर घरेलू झगड़े में बिक गया.'
'अरे, फिर क्या?'
'विजयनगर में मकान लिया है, उसे ठीक-ठाक करवाना है.'
'कोई काम होगा तो मुझे बताना.'
'जरूर बताऊंगा.'
'बच्चे क्या कर रहे हैं?'
'बड़ी लड़की ने जज की परीक्षा पास की है, उसका इंटरव्यू होने वाला है. उससे छोटी का ब्याह एक जज से हो गया. उससे छोटी लड़की और एक लड़का अभी स्कूल में हैं.'
'चार बच्चे? आज के जमाने में?'
'भगवान की इच्छा है.'
'चल रे, भगवान को क्यों बीच में घुसेड़ता है? अपनी करनी, मोहल्ले को दोष.'
'और तेरे?'
'वह बाद में बताऊंगा, पहले यह बता कि बड़ी लड़की के सिलेक्शन के लिए कुछ पौवा लगाया.'
'मेरी कोई जान-पहचान नहीं है, मैं क्या करूं?'
'तू कुछ मत कर, मैं आ गया हूँ. सांसद से बोलकर तेरा काम करवा दूंगा. क्या नाम है बिटिया का?'
'विद्योत्तमा मिश्र.'
'देख, अगर वह सिलेक्ट हो गयी तो जबलपुर का गौरव बढेगा, है न?'
'हाँ, हो जाए तब.'
'अब तू फ़िक्र छोड़. मैं हूँ न.'
'बड़ी कृपा होगी पारस तुम्हारी. तुम मेरी बेटी के भाग्य से आज यहाँ आये.'
'चाय कहाँ है?' पारस चीखा.
'बस, आती होगी.' विद्याशंकर ने कहा. चाय पीने के बाद पारस ने विदा लेते हुए कहा, 'मैं चलता हूँ. एम.पी.साहब से बात करके बताऊंगा.

एक सप्ताह बाद पारस पुनः दूकान में पधारे. 'मैंने बात की थी तो मालूम पड़ा कि आयोग में या तो एकदम ऊंचे लेवल की सिफारिश चलती है, या मनीराम बागड़ी.' उन्होंने रहस्योद्घाटन किया.
'मनीराम बागड़ी? मैं समझा नहीं.' विद्याशंकर ने पूछा.
'मनीराम नहीं समझे? गांधीजी की फोटो समझते हो?'
'हाँ, अपने राष्ट्रपिता की फोटो.'
'हे भगवान, किस आदमी से मेरा पाला पड़ गया?'
'साफ़-साफ़ बोल न, घुमा-फिरा कर क्यों बोल रहा है?'
'दो लाख रूपए लगेंगे, बीस हजार ऊपर से.'
'क्यों?'
'चार आदमी इंटरव्यू में बैठते हैं, दो लाख उनमें बंट जाएगा और बीस हज़ार नीचे के लेवल में.'
'कहीं काम नहीं हुआ तो?'
'काम होने की ज़िम्मेदारी मेरी. अगर नहीं हुआ तो दो लाख वापस हो जाएंगे, मेरी बात हो गयी है, साफ़-साफ़.'
'बाकी बीस हजार?'
'नहीं, वह वापस नहीं होगा.'
'ठीक है, एक-दो दिन का समय दो, घर में समझ कर बताता हूँ. पर देखो, धोखा नहीं होना चाहिए.'
'मैं हूँ न यार, तू क्यों चिंता करता है.' पारस ने आश्वस्त किया.

रात को भोजन के बाद रत्ना, रज्जो और विद्याशंकर के मध्य मंत्रणा हुई. विमर्श के बाद यह तय हुआ कि यदि पारस भरोसे का आदमी हो तो रत्ना अपने खाते से रुपया निकलवा कर दे देगी लेकिन किसी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति की मध्यस्थता में पूरी बात हो ताकि कोई गड़बड़ी न हो. वार्ता समाप्त होने वाली थी तब ही कमरे के दरवाजे पर विद्योत्तमा आकर खड़ी हो गयी. 'मैंने आप लोगों की सब बातें सुन ली हैं.' वह बोली.
'अच्छा हुआ, तुम आ गयी.' विद्याशंकर ने कहा.
'तो आप लोग रिश्वत दे रहे हैं?'
'देखो, तुम्हारी उम्र कम है. तुम आदर्शवादी हो, अच्छी बात है लेकिन यह आदर्श तुम्हें रोजगार नहीं देगा. जमाने की रीत के हिसाब से चलना होता है. अभी जो पैसा देंगे, साल-डेढ़ साल की नौकरी में वसूल हो जाएगा इसलिए दे देने में ही होशियारी है.' दादी ने कहा.
'मुझे जज नहीं बनना. आप लोग यदि मेरी नियुक्ति के लिए रिश्वत देंगी तो मैं पूरा इंटरव्यू खुद बिगाड़ दूंगी, वे लोग पैसा लेकर भी मुझे सिलेक्ट नहीं कर सकते.' वह बिफरी.
'क्या बचपना कर रही हो तुम?'
'यह मेरा बचपना नहीं है दादी. आप मेरी बात समझिए, मैं जज बनना चाहती हूँ, जज नामक नौकरी नहीं करना चाहती. खुद अपराध करके क्या मैं न्यायाधीश के पद के साथ न्याय कर सकूंगी? आप बताइए?'
'हम तुझे रिश्वत लेने के लिए मजबूर तो नहीं कर रहे हैं. जज बन जाने के बाद ईमानदारी से काम करना, हम कुछ नहीं कहेंगे.'
'मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आप लोगों को यह क्या हो गया है? आपको मुझ पर भरोसा नहीं है? विद्योत्तमा की योग्यता पर भी भरोसा नहीं है? आप लोगों को मेरी कसम है, जो आपने किसी को रिश्वत दी.' विद्योत्तमा उत्तर सुने बिना ही कमरे से वापस चली गयी. सब चुप रह गए. अंततः रत्ना ने कहा, 'ठीक है, जैसा वह कह रही है, वैसा करेंगे. हमें उसकी भावना को समझना चाहिए.'

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