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*छः* रज्जो की ज़िन्दगी चूल्हे-चौके के इर्द-गिर्द घूम कर रह गयी. इलाहाबाद की अल्हड़ लड़की अपने ब्याह के बाद एक घरेलू मशीन की तरह हो गयी. कभी समय था जब दस-बारह बच्चे भी पल जाते थे लेकिन अब चार बच्चे पालना, उन्हें बड़ा करना, पढ़ाना-लिखाना और लाइन से लगाना बहुत कठिन काम हो गया है. शुरू में लड़का हो गया होता तो ये फ़ौज न बनती, लेकिन 'एक ट्राई और' के चक्कर में चार हो गये. पुश्तैनी जायदाद के नाम पर एक पुराना घर है जो किसी भी दिन आधा हो जाएगा क्योंकि उसमें रज्जो के देवर का हिस्सा है. किसी प्रकार विद्याशंकर की खुद की दूकान हो गयी है, अभी नयी है, कुछ समय लगेगा लेकिन धीरे-धीरे जम जाएगी. ज़िंदगी भी ऐसे ही बीत रही है, कल का कुछ पता नहीं, पर भरोसा है कि धीरे-धीरे सब व्यवस्थित हो जाएगा. रज्जो की सबसे बड़ी फ़िक्र यह है कि विद्योत्तमा का क्या होगा? उसने जज बनने की ठान ली है, उसकी उम्र बढ़ती जा रही है. छोटी बहन की शादी हो गयी, बड़ी कुँवारी बैठी है. ब्राह्मणों में वैसे ही लड़कों का टोटा है, लड़की बुढ़ा जाएगी तो कौन ब्याहेगा? जज कब बनेगी? बनेगी भी या नहीं. आजकल की लड़कियां किसी की कुछ सुनती नहीं, जबरपेली मे...