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रज्जो की ज़िन्दगी चूल्हे-चौके के इर्द-गिर्द घूम कर रह गयी. इलाहाबाद की अल्हड़ लड़की अपने ब्याह के बाद एक घरेलू मशीन की तरह हो गयी. कभी समय था जब दस-बारह बच्चे भी पल जाते थे लेकिन अब चार बच्चे पालना, उन्हें बड़ा करना, पढ़ाना-लिखाना और लाइन से लगाना बहुत कठिन काम हो गया है. शुरू में लड़का हो गया होता तो ये फ़ौज न बनती, लेकिन 'एक ट्राई और' के चक्कर में चार हो गये. पुश्तैनी जायदाद के नाम पर एक पुराना घर है जो किसी भी दिन आधा हो जाएगा क्योंकि उसमें रज्जो के देवर का हिस्सा है. किसी प्रकार विद्याशंकर की खुद की दूकान हो गयी है, अभी नयी है, कुछ समय लगेगा लेकिन धीरे-धीरे जम जाएगी. ज़िंदगी भी ऐसे ही बीत रही है, कल का कुछ पता नहीं, पर भरोसा है कि धीरे-धीरे सब व्यवस्थित हो जाएगा.

रज्जो की सबसे बड़ी फ़िक्र यह है कि विद्योत्तमा का क्या होगा? उसने जज बनने की ठान ली है, उसकी उम्र बढ़ती जा रही है. छोटी बहन की शादी हो गयी, बड़ी कुँवारी बैठी है. ब्राह्मणों में वैसे ही लड़कों का टोटा है, लड़की बुढ़ा जाएगी तो कौन ब्याहेगा? जज कब बनेगी? बनेगी भी या नहीं. आजकल की लड़कियां किसी की कुछ सुनती नहीं, जबरपेली में अपनी मर्जी का करती हैं. अखबार की नौकरी भी इज्ज़त की है, तरक्की हो जाएगी, मान-सम्मान बढ़ जाएगा लेकिन उसे कौन समझाए? उसकी तो एक धुन है, 'मुझे जज बनना है.' खुद का जजमेंट करने में फेल  है, जज बनेगी तो दूसरों का सही फैसला कैसे करेगी? 'हे भोलेनाथ, आप ही कुछ करो.' रज्जो, मन-ही-मन भगवान से प्रार्थना करती.

आज रज्जो के देवर-देवरानी जबलपुर आने वाले हैं. रज्जो उनके लिए भी भोजन तैयार करने में जुटी है. प्रभुशंकर को आलू-मेथी की सूखी सब्जी पसंद है, सब्जी बन रही है और उसकी खुशबू पूरे घर में फ़ैल रही ही. इतने में रत्ना की आवाज़ गूंजी, 'क्यों, रात को दूध जमाई थी क्या?'
'हाँ, अम्माजी. दही तैयार है.' रज्जो ने बताया.
'बेसन की फुलौरी बना लो और दही को छौंक कर उसमें डाल देना.'
'जी, अम्मा जी.'
'और सुनो, तुम्हारा खाना बन जाए तो हमारे पास आकर बैठो, तुमसे ज़रूरी बात करनी है.'
'अभी मुझे आधा घंटा लग जाएगा.'
'रोटी उनके आने पर सेंक लेना. प्रभु के घर आने के पहले हमारी बात हो जाए तो ठीक है, अगर वो लोग आ जाएंगे तो उनके सामने बात नहीं होगी.'
'जी, मैं काम निपटा कर आती हूँ.' रज्जो ने कहा.

अकेले चौका संभालना बहुत मुश्किल होता है. कोई साथ लग जाता है तो दो जन मिलकर काम बाँट लेते हैं, आसानी हो आती है. इस समय रज्जो अकेले है. वैसे तो रोज ही अकेले रहती है लेकिन जब पहुना आते हैं तो काम फ़ैल जाता है. विद्योत्तमा प्रेस गयी है, बाकी सब स्कूल गए हैं. पर काम तो काम है, जब सिर पर आता है तो करना पड़ता है. ऐसा भी नहीं है कि देवरानी आएगी तो चार रोटी बेलवा ले, साहबिन है, चटाई में पसर कर बैठ जाएगी सबके साथ खाने के लिए. चलो, एक दिन की बात है, कैसे भी निभ जाएगा. राजजो खुद से बात कर रही थी, इस बीच दही-फुलौरी और आलू-मेथी बन गयी. दाल में जीरे की छौंक लग गयी. सब सामान अच्छे से ढँक कर रज्जो अपनी सास के पास आकर बैठ  गयी. 'क्या कह रही थी अम्माजी?'
'अभी-अभी हमारे दिमाग में एक बात आयी है.' रत्ना ने धीरे से कहा.
'क्या?'
'प्रभु आ रहा है, साथ में बहू भी आ रही है. ये लोग बंटवारे की बात फिर से उठाएंगे.'
'हो सकता है.'
'हो सकता है? अरे, उसी के लिए पधार रहे हैं.'
'आपने पिछली बार कह दिया था न कि आपके जीते-जी घर नहीं बंटेगा?'
'कहा था लेकिन प्रभु से कहा था, वह मुझसे बहस नहीं कर पाया लेकिन इस बार अपना वकील लेकर आ रहा है.'
'वकील ले कर?'
'हाँ, बहू आ रही है साथ में. वह आसानी से मानने वाली जीव नहीं है.'
'फिर?'
'मैं सोचती हूँ कि यह घर बेच दिया जाए और बंटवारा कर दिया जाए.'
'उसके बाद हम लोग कहाँ रहेंगे? पुरखों का घर है, इसे मत बेचिए अम्मा जी. उनकी आत्मा दुखेगी.'
'घर के बीच में दीवार खिंचेगी तो पुरखों की आत्मा प्रसन्न हो जाएगी क्या?'
'वह भी ठीक नहीं है.'
'इसीलिए इस घर को बेच देते हैं. जो पैसा आएगा उससे विजयनगर में नया घर खरीद लेंगे और ठाठ से रहेंगे.'
'शहर से दूर है विजयनगर. छोटे-छोटे काम के लिए अटक जाएंगे. यहाँ सामने तालाब है, भगवान के मंदिर हैं, सब सामान आसपास मिल जाता है. इनकी दूकान और विद्योत्तमा का प्रेस दूर हो जाएगा.'
'मैं सब समझती हूँ॰ मेरी सुनो, अपना पड़ोसी मंगली सोनार अपने घर को खरीदना चाहता है. संकोच के कारण खुद होकर कभी कहा नहीं पर मेरे पास खबर भेजवाया था कि जब कभी मन हो सबसे पहले उसको खबर करना. उसने कहा है कि मुंहमांगी कीमत देगा.'
'तो?'
'आज प्रभु से पूछे लेते हैं. अगर वो राजी हो जाता है तो मैं अपने सामने बंटवारा कर देती हूँ, बाद की झंझट नहीं रहेगी.'
'इनसे भी चर्चा कर लेती तो अच्छा होगा.'
'चर्चा मैं दोनों से करूंगी लेकिन मुझे तुम्हारी राय जाननी थी क्योंकि तुम सब बात को समझती हो और मुझे तुम्हारे ऊपर विश्वास है कि अगर मैं कोई गलती करूंगी तो तुम मुझे अवश्य बताओगी.'
'आपकी बात तो ठीक लग रही है लेकिन यह घर छोड़ना बहुत दुखदायी होगा अम्माजी.' रज्जो ने कहा.
'समय जो न दिखा दे बहुरिया.' रत्ना कहकर चुप रह गयी. उनकी आँखों की कोर से आंसू बहने लगे जिसे उन्होंने आँचल की कोर से पोछ लिया.

*****

दोपहर को तीन बजे प्रभुशंकर और उसकी पत्नी घर आये. कुशल-क्षेम की औपचारिकता के पश्चात भोजन हुआ. दही-फुलौरी कम पड़ गयी क्योंकि सबने दो-दो बार लिया. रज्जो को नहीं मिली, कोई बात नहीं क्योंकि वह पहले ही स्वाद चख चुकी थी. खाने के बाद महफ़िल जमी. सब दरी में बैठ गए, अम्माजी बेंत वाली कुर्सी में. बात प्रभुशंकर ने शुरू की, ‘भैया, नयी दूकान कैसी चल रही है?’
‘अभी नयी है, समय लगेगा चलने में.’ विद्याशंकर ने कहा.
‘कितने में ली?’
‘पुराना सौदा था, सस्ते में मिल गयी?’
‘फिर भी?’
‘साढ़े चार लाख में.’
‘पैसे का इंतज़ाम आसानी से हो गया?’
‘थोड़ा जोड़कर रखा था, कुछ अम्मा ने दिया, कुछ विद्योत्तमा और उसकी मां ने.’
‘मुझे खबर करते तो मैं भेज देता.’
‘कम पड़ता तो तुम्हारा नाम भी वेटिंग-लिस्ट में था लेकिन काम हो गया.’
‘सुना है, घर के कुछ गहने भी बिक गए?’ प्रभुशंकर ने पूछा. सभा में सन्नाटा छा गया. यह समझना मुश्किल हो रहा था कि प्रभुशंकर को यह जानकारी कैसे हो गयी? उत्तर अम्मा ने दिया, ‘हाँ मेरा सोने करधन था, उसे बेचा है.’
‘तो, पूरी रकम दूकान में लग गयी?’
‘नहीं, आधा पैसा मेरे पास है.’
‘मतलब?’
‘आधा करधन छोटी बहू का है इसलिए इसके लिए सुरक्षित रखा है.’ प्रभुशंकर की पत्नी का प्रश्नवाचक मुख तनिक सामान्य हुआ. बात आगे बढ़ी, ‘ठीक है. जैसा करधन का सोची हो, वैसा मकान का भी कर देती तो अच्छा रहता.’ प्रभुशंकर ने अगला पांसा फेंका.
‘सोच रही हूँ कि इसका भी निपटारा कर दिया जाए.’ रत्ना ने कहा.
‘क्या सोची हो अम्मा?’
‘घर के चार हिस्से होंगे लेकिन इसके चार टुकड़े कैसे करें, समझ में नहीं आ रहा है.'
'हम तो दो भाई हैं, दो हिस्से होंगे.’
‘तुम कैसे तहसीलदार हो? पैतृक संपत्ति में केवल लड़कों का हिस्सा होता है क्या?’
‘तो फिर?’
‘एक हिस्सा तुम्हारी बहन का है और एक मेरा.’ रत्ना ने वजन देकर कहा. प्रभुशंकर इस गणित को सुनकर चौंक गया और बात सँभालते हुए बोला, ‘कानूनन तो बनता है लेकिन परिपाटी में तो केवल लड़कों को मिलता आया है.’
‘बाद में लड़कियों से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना पड़ता है या नहीं?’
‘हाँ, लेना पड़ता है.’
‘मैं भविष्य की वह झंझट नहीं चाहती. मैं लड़की को हिस्सा दूंगी और अपना हिस्सा भी लूंगी. उसके बाद की बात है कि मैं और बिटिया अपने हिस्से का क्या करते हैं. तुम दोनों को उससे कोई मतलब नहीं.’ रत्ना ने निर्णय सुनाया. प्रभुशंकर और उसकी पत्नी सन्नाटे में आ गए. दो के बदले चार हिस्से हो जाने का मतलब है, आधा माल हाथ से छूट गया. खुद को जरा संभालकर प्रभुशंकर की पत्नी ने पूछा, ‘अम्माजी, घर के चार हिस्से होंगे तो चार गलियाँ बन जाएंगे, घर कहाँ रहेगा?’
‘तुम बताओ बहूरानी, कैसा करें?’
‘घर बेचने के अलावा और कौन सा रास्ता है?’
‘हम भी वही सोच रहे थे कि घर बेच दें और सबको पैसा बाँट दें.’
‘पुरखों का घर है, मत बेचो अम्मा.’ विद्याशंकर ने कहा.
‘करधन बेचा तब पुरखों का ख्याल नहीं आया.’ प्रभुशंकर ने कटाक्ष किया.
‘वह मेरा निर्णय था, विद्या ने उस समय भी मना किया था.’ रत्ना ने बीच-बचाव किया.

इस प्रकार जबलपुर के हनुमान ताल में पंडित जटाशंकर के द्वारा बनाए गए मकान का बिकना तय हो गया और रत्ना के जीते-जी घर का बटवारा होना भी निश्चित हो गया. 

शाम को विद्योत्तमा जब घर लौटी तो दिन भर की चर्चा का सार उसे दादी ने बताया. विद्योत्तमा एकबारगी खिन्न हुई, फिर बोली, 'जो हुआ, अच्छा हुआ दादी. अब आगे क्या?'
'अब घर को बेचने की जुगत लगानी है.' रत्ना ने कहा. रत्ना ने मंगली सोनार को खबर भेजी. मंगली बात करने आया और मकान की कीमत पूछी तो रत्ना ने बताया, 'इक्कीस लाख.'
'हद्द कर रही हो आप. सात लाख की चीज इक्कीस में बिकेगी क्या?'
'तो मत लो भाई. आज नहीं तो कल लोगे, इन्क्यावन लाख में लोगे.'
'मैं ग्यारह लाख दूंगा.' मंगली बोला.
'कुछ और पैसा जोड़ लो, जब इक्कीस लाख तुम्हारे पास हो जाएगा तब आना मेरा मकान खरीदने. मुझे बेचने की कोई ज़ल्दी नहीं है.'
'पैसा मेरे पास बहुत है, ऐसे-ऐसे दो मकान खरीद सकता हूँ. आप कीमत अधिक लगा रही हैं. प्रापर्टी तो बाज़ार भाव में बेची-खरीदी जाती है बहन जी.'
'मैं स्वीकार करती हूँ कि कीमत अधिक बता रही हूँ क्योंकि मुझे मालूम है कि मेरा घर आपके काम का है. खरीदने की गरज आपकी है, मेरी नहीं. मुझे बेचने की कोई हड़बड़ी नहीं है, जब मनमुताबिक कीमत मिलेगी तब बेचूंगी. जय भोलेनाथ.'
'बहन जी, न आपकी बात, न मेरी बात, सोलह लाख दूंगा. एक लाख एडवांस लीजिए, रखिए. रजिस्ट्री तीन माह बाद करवाऊंगा.'
'रजिस्ट्री का खर्च आप उठाओगे, मैं नहीं.'
'ठीक है.'
'तो सौदा पक्का रहा.' रत्ना ने कहा और उसे चाय पिलाकर विदा किया.

रात को विद्याशंकर आए तो रत्ना ने घर के सौदे के बारे में बताया. वह आश्चर्यचकित रह गया, 'सोलह लाख में?' 
'हाँ, सोलह में. क्यों सस्ते में दे दिया क्या?'
'अम्मा, लूट लिया आपने मंगली को. हनुमानताल रिहायशी इलाका है, यहाँ इतनी कीमत नहीं है.'
'असल में, मुझे पहले से खबर थी कि उसकी नज़र हमारे घर पर टिकी है, मैंने उसी का फायदा उठाया. एक लाख एडवांस दे गए हैं, इसे कल बैंक में मेरे खाते में जमा कर दो. घर के पेपर तैयार करवाओ, उसे देना है, रजिस्ट्री के लिए तीन महीने का समय दिया है.'
'कल से भिड़ जाता हूँ.'
'विजयनगर में नयी कालोनी बन रही है. सुना है, चार-पांच लाख में बने-बनाए मकान मिल रहे हैं, उसका पता करो. दो मकान लेना है.'
'दो मकान किसके लिए अम्मा?'
'एक हमारे लिए और दूसरा तुम्हारी बहन के लिए. आगे-पीछे वे या उनके बच्चे हटा से यहाँ शहर में आकर बसना चाहेंगे, तब काम आएगा.'
'अम्मा, तीन ले लेते हैं, प्रभुशंकर भी तो रिटायरमेंट के बाद यहीं आएँगे?'
'प्रभुशंकर की प्रभुशंकर जानें. मैं उसको चार लाख नगदी दे दूंगी. उन दोनों के जो मन आएगा वैसा करेंगे, मैं उनके पचड़े में नहीं पड़ती.' रत्ना ने कुर्सी से उठते हुए कहा. 'लाओ बहू, एक गिलास पानी ले आओ, गला सूख रहा है.'

* * * * * 

रज्जो का पूरा दिन घर के काम में बीत जाता. सुबह पानी भरने से लेकर रात में सबका बिस्तर बिछाने तक वह निढाल हो जाती. विद्योत्तमा और सुगंधा उसकी मदद करती थी लेकिन रात के खाने के समय, बाकी पूरा दिन अकेले ही संभालना पड़ता है. सास की देखरेख, समय पर उनकी चाय-पानी और खाना, बच्चों का टिफिन, पति की चड्डी-बनियान बाथरूम में रखना, घर भर के कपड़ों की धुलाई, उन्हें सुखाना, फिर उठाना, फिर प्रेस करना, फिर जमाकर आलमारी में रखना. किसी को कुछ भी कम पड़ गया या नहीं मिला तो रज्जो के लिए आवाजें उठना शुरू हो जाती. 

घर-गृहस्थी का काम किसी को दिखाई नहीं पड़ता लेकिन जो करता है, वह जानता है. किये गये का यश नहीं है लेकिन किसी दिन सब्जी ज़रा सी जल गयी तो सबका चेहरा विद्रूप होने लगता है. लड़के को देखो, अभी से उसके लक्षण नज़र आ रहे हैं. दिन भर उधम करता है, घर के बाहर खेलते रहता है तब उतनी देर की शांति रहती है. विद्योत्तमा से डरता है लेकिन सुगंधा को चिढ़ाएगा या मार के भाग जाएगा. कुछ सज़ा दो तो दादी उसका पक्ष लेकर अवतरित हो जाएँगी, 'बच्चा है, बचपना है. अभी उधम नहीं करेगा तो कब करेगा?'
'बिगड़ रहा है अम्मा जी, अभी से नकेल न कसी गयी तो कभी हाथ न आएगा.' रज्जो समझाती.
'बहूरानी, लड़कों पर नकेल कसना मां के वश में नहीं है. वह काम उनकी घरवाली करती है. अभी  बड़ा होने दो, फिर देखना, कैसे उसके इशारों में नाचता है.'
'तो क्या मैं भी इनको अपने इशारों में नचाती हूँ? आपने कभी ऐसा देखा क्या?'
'नहीं, मेरा बेटा मेरे इशारे पर चलता है.'
'आपका बेटा आपके इशारे पर चलता, यह अच्छा है और मैं अपने बेटों को साधती हूँ तो आपको दोष नज़र आता है.'
'ऐसी बात नहीं है रज्जो, विद्या सीधा-सादा है. मैंने देखा कि तुम उसको नहीं नचाती इसलिए वह काम मुझे करना पड़ता है.'
'वह काम मैं शुरू कर दूं क्या अम्मा जी?'
'अब नहीं बनेगा तुमसे. जिस समय तुमको कंट्रोल करना था, तुमने नहीं किया, अब देर हो गयी. छोटी बहू को देखो, तहसीलदार की तमाम तहसीली पर उसी का कब्जा है.' रत्ना हंसते हुए बोली. रज्जो भी उनकी बात सुनकर मुस्कुरा दी. 'सच बताऊँ अम्माजी, मुझे किसी पर कंट्रोल करना बिलकुल पसंद नहीं. मैं मानती हूँ कि हर मनुष्य की अपनी आजादी होती है जिसका मान होना चाहिए लेकिन कई बार जब आजादी का दुरुपयोग होने लगता है तो गुस्सा आता है, तब बोलना पड़ता है.' रज्जो ने कहा. 
'जरूरी है वह. बच्चे हैं, उनको रास्ता दिखाना हमारा फ़र्ज़ है, वह हमें करना चाहिए.'
'और अगर वे कहना न मानें तो?'
'कहना न मानें तो न मानें, फिर समय सिखाएगा, तब मानेंगे.'
'तब तक तो बहुत देर हो जाएगी.'
'यही पहेली अबूझ है रज्जो, न जाने विधि ने किसके लिए क्या विधान रच रखा है?' अम्मा जी ने ऊपर हाथ जोड़कर कहा.

*****  
    
'जरूरी बात करनी है, आज शाम को काफी हाउस चलें क्या?' विवेक ने पूछा.
'ठीक है, पेमेंट आप करेंगे.' विद्योत्तमा ने कहा.
'हाँ, हाँ, मैं करूंगा. इतना डर क्यों रही हो?'
'इस समय कड़की चल रही है विवेक जी. जब जेब में पैसे होते हैं तो काफी सस्ती लगती है और जब नहीं होते तो मंहगी.'
'ऐसा कैसा अर्थ संकट आ गया?'
'अखबार में इतना पैसा तो मिलता नहीं कि आर्थिक समृद्धि आ जाए. ये कम वेतन देते हैं ताकि हम उनकी कृपा पर आश्रित रहें और डरे-डरे जिएँ.'
'कौन डराता है? मुझे तो किसी ने नहीं डराया.'
'वैसा नहीं डराते जैसा आप सोच रहे हैं. हमारी इज्ज़त अखबार के नाम से जुड़ी जो है. अगर यहाँ से हट गए तो हमको कौन पूछेगा?'
'किसी दूसरे अखबार में चले जाएंगे, और क्या?'
'जो जलवा 'नवभारत' के नाम का है, वह कहाँ रहेगा?'
'ये तो है.'
'इसी का फायदा उठाते हैं मालिक लोग.'
'बात समझ में आ रही है.'
'तो फिर?'
'फिर क्या?'
'बस, काफी पिलाओगे? इतनी बुद्धिमानी की बात कही, सर, डोसा भी बनता है.'
'मंजूर.'
'वैसे मुझे मालूम है कि आप काफी हाउस में मुझसे क्या बात करने वाले हैं.'
'कैसे मालूम?'
'हम लड़कियों के पास एक अलग किस्म की जागृत बुद्धि होती है जो सामने वाले की आँखों को पढ़ लेती है.'
'ऐसा क्या?'
'बिलकुल.'
'तो बताओ, मैं क्या बात करने वाला हूँ?'
'आपका मुझसे शादी करने का इरादा हो रहा है और आप मेरी स्वीकृति चाहते हैं.'
'और?'
'और, मैं आपको मना करने वाली हूँ. आप चाहें तो अभी भी काफी हाउस के पैसे बचा सकते हैं.'
'कसम से, मैं आपकी साफगोई का आशिक हूँ.'
'तो आपको एक बिन-मांगी सलाह देती हूँ. शादी उस लड़की से करना जो मेरी तरह न हो.'
'क्या मतलब?'
'स्ट्रेट-फॉरवर्ड लड़की अमूमन आज्ञाकारी पत्नी नहीं बनती.'
'तो?'
'ऐसी पत्नी मिली तो पति को आज्ञाकारी बनना पड़ता है इसलिए सोच-समझकर चयन करना.'
'यह तो गज़ब की बात बता दी आपने. मैं पहले अपना मूल्यांकन करूंगा फिर लड़की के गुण-दोष देखूँगा.'
'अब आये रास्ते में.'
'तो, काफी हाउस का प्रोग्राम केंसिल?'
'सच बताऊँ? अब वहां जाकर क्या बात करेंगे? सारी बातें तो यहीं हो गयी.'
'फिर?'
'फिर भी चलेंगे. कुछ-न-कुछ ज्ञान और मिल जाएगा.' विवेक ने हँसते हुए कहा. 

शाम को काफी हाउस में भीड़-भाड़ का माहौल रहता है. विवेक और विद्योत्तमा कुछ देर तक सीट खाली होने का इंतज़ार करते रहे, खड़े-खड़े बोर हो गये तो विद्योत्तमा ने कहा, 'चलिए यहाँ से, कहीं और चलें.'
'कहाँ जाएंगे?' विवेक ने पूछा.
'शहीद स्मारक चलते हैं, वहां हरियाली के वातावरण में बैठकर बातें करेंगे.'
'डोसा और काफी का क्या होगा?'
'लगता है, आज मेरे मुकद्दर में नहीं है.' 
'किसी दूसरी जगह चलते हैं.'
'नहीं, मेरा मूड उखड़ गया. एक काम करते हैं, रास्ते में श्याम टाकीज के पास ठेले पर गरम मुंगौड़ी खाएंगे और चाय पियेंगे.'
'ठीक है, चलते हैं.' विवेक ने कहा और वे दोने काफी हाउस की सीढ़ियों से नीचे उतर गए. आधे घंटे बाद वे दोनों शहीद स्मारक की हरी घास में अपने हाथ टिकाए, पैर पसारकर बैठे बातचीत कर रहे थे. 
'क्या पुनर्विचार हो सकता है?' विवेक ने पूछा.
'किस बात पर?'
'वही, अपनी शादी पर.'
'अपनी शादी? मैं समझी नहीं.'
'क्या आप मुझसे शादी नहीं करेंगी?'
'न आपसे, न किसी और से.'
'मतलब, आजीवन कुंवारी रहेंगी?'
'ऐसा तो मैंने कभी नहीं कहा.'
'फिर?'
'देखिए विवेक जी, मैं सामान्य मनुष्य हूँ. जब स्कूल में पढ़ती थी और किसी विवाह समारोह में जाती थी तो मैं भी कल्पना करती थी कि एक दिन ऐसा आएगा जब कोई राजकुमार मेरे घर घोड़ी पर चढ़ कर आएगा और मुझे दुल्हन बनाकर अपने घर ले जाएगा.' 
'अब क्या हुआ?'
'वह लगातार स्थगित होते जा रहा है.'
'ऐसा क्यों?'
'मैंने अपने जीवन का एक लक्ष्य बनाया है, मुझे जज बनना है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मुझे आज़ादी चाहिए. विवाह इस आज़ादी में बाधक सिद्ध होगा.'
'अगर मैं विवाह के बाद आपको ऐसी आज़ादी देने का वादा करूं तो?'
'एक बात बताइये, आप मुझसे क्यों शादी करना चाहते हैं?'
'क्योंकि मैं आपको चाहता हूँ.'
'चाहने का एक अर्थ यह हुआ की आप मुझे हासिल करना चाहते हैं?'
'यह तो आपने शब्द अनर्थ कर दिया.'
'आपको शब्द बदलने की छूट है.'
'मैं आपसे प्यार करने लगा हूँ.'
'जब आप प्यार करते हैं तो विवाह की क्या ज़रुरत? आपको पता है कि नज़दीकी प्यार को लील जाती है?'
'तो क्या प्यार क्षणभंगुर होता है?'
'यह मैं नहीं जानती लेकिन मुझे यह मालूम है कि प्यार हमारे शरीर के हार्मोन्स का दबाव है जो मस्तिष्क पर युवावस्था में हावी होता है और इसके पीछे किसी को बाहों में कसने या किसी की बाहों में सिमट जाने का भाव होता है.'
'आपके साथ कैसा हो रहा है?'
'वैसा ही हो रहा है लेकिन मुझे उस पर नियंत्रण रखना होता है ताकि घर में बड़ी होने की जिम्मेदारी निभा सकूँ. एक बार घर-गृहस्थी के चक्कर में फंस गयी तो मेरा लक्ष्य और मेरा परिवार मुझसे दूर हो जाएगा.'
'मैंने कहा, मैं आपको सहयोग दूंगा.'
'मैं विवाह की मजबूरियां अपने घर में देखती हूँ. आप नाराज़ मत होना, विवाह के बाद लड़कियों की चाहत दबा दी जाती है.'
'लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगा.'
'आप ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि आप मुझे प्यार करते हैं लेकिन मैं....?'
'क्या?'
'मैं...मैं विवाह के लिए तैयार नहीं हूँ.' उत्तमा ने बात को समाप्त करते हुए कहा, 'अब अपन चलें यहाँ से, घर में मम्मी मेरी राह देखती होंगी.' 

*****

घर आकर विद्योत्तमा ने मम्मी को विवेक के साथ हुआ वार्तालाप बताया. मम्मी नाराज़ हुई, 'किसी को उसके प्यार का जवाब इस तरह से दिया जाता है?'
'मैं किसी को हवा में लटकाना पसंद नहीं करती, साफ़-साफ़ बता दिया उसको. मेरी तरफ से मुक्त हुआ, अब किसी और को देखेगा. वह मेरे नाम से कुंवारा तो नहीं रहने वाला.' विद्योत्तमा ने उत्तर दिया.
'तुम्हारी साफगोई ठीक है लेकिन यह तो किसी की भावना को ठुकराना हो गया.'
'आपके ज़माने की बात है यह सब. हम लोग इस ढंग से नहीं सोचते. एक बात बताओ मम्मी, वह मुझसे प्यार करता है, क्या मैं उसे प्यार करती हूँ?'
'तुम बताओ.'
'मेरे मन में ऐसा कोई भाव नहीं है. हम लोग बस साथ काम करते हैं, इसका मतलब यह तो नहीं है कि दोनों प्यार करने लगें. उसे मुझसे प्यार है लेकिन मुझे काम से प्यार है, बाकी ये प्यार-व्यार के लिए मेरे पास अभी समय नहीं है.'
'अगर वह अच्छा इंसान है, तुझे प्यार करता है तो तुझे सुख से रखेगा, अन्जान पुरुष से विवाह करने के मुकाबले यह बेहतर विकल्प है. तू ज़रा ठन्डे दिमाग से सोच.' 
'आपकी इस बात का महत्व तब है जब मेरा किसी से शादी करने का इरादा हो. मुझे शादी नहीं करनी. जब करनी होगी तब आपको बताऊँगी और आपसे पूछकर करूंगी. अब इस बात को ख़त्म करो मम्मी, सुबह से मेरे दिमाग का फलूदा बन गया.' विद्योत्तमा ने हाथ जोड़कर कहा. मम्मी चुप हो गयी.

रत्ना को कुछ सुनाई पड़ा, कुछ नहीं. जब उत्तमा अपने कमरे में गयी तब उसने रज्जो से पूछा, 'कोई शादी-ब्याह की बात हो रही थी?'
'हाँ, अम्माजी, उत्तमा को किसी ने शादी के लिए प्रपोज़ किया, उसने इंकार कर दिया.'
'क्यों? उसे लड़का पसंद नहीं है क्या?'
'पसंद-नापसंद की बात नहीं है, उसे अभी शादी नहीं करना.'
'तो कब करेगी?'
'कहती है कि जब करना होगा तब बताऊंगी.'
'ज़रा पता करो, क्या है उसके मन में.'
'वह जज बनने के लिए अटकी हुई है.'
'तो ठीक है. साल-दो साल बाद होगी, कौन सा पहाड़ टूटा जा रहा है?'
'कहीं जज न बनी तो लड़की पहाड़ बन जाएगी.'
'देख बहू, किसी परिवार में बड़े भाग्य से ऐसे बच्चे पैदा होते हैं, जैसी अपनी विद्योत्तमा है. उसको पढ़ने का शौक है, उसमें लगन है, उसे और कोशिश करने दो. और, देखो, तुम हड़बड़ाओ मत, भोलेशंकर हैं न हमारे कब्जे में, रोज एक घंटा पूजा करती हूँ, कब काम आएँगे?' रत्ना ने कहा.
'अम्माजी आप तो उसी के पक्ष में बोलेंगी, मैं जानती थी.' रज्जो ने कहा और रसोईघर में घुस गयी.

विद्योत्तमा बेचैन थी, सोच रही थी कि विवाह के प्रस्ताव को इन्कार करके उससे वही भूल तो नहीं हो रही है जो एक बार वह कर चुकी है. इधर सिस्टम ऐसा है कि उससे पार पाना मुश्किल है. संविधान के प्रावधान पक्ष में नहीं हैं. किसी प्रकार मेहनत करके अच्छे अंक ले भी आऊं तो साक्षात्कार में चयन मुश्किल है. सुनती हूँ कि हर नौकरी में रिश्वत देनी पड़ती है. चाचाजी तहसीलदार बने थे तो पचास हजार लगा था. क्या पता जज बनने के लिए कितना देना पड़ेगा? हम कहाँ से उतने पैसे लाएंगे? वैसे भी, क्या पैसे देकर जज बनना उचित है? जिस कुर्सी पर बैठकर मुझे न्याय देना है, उस कुर्सी के लिए मेरा दरवाजा क्या अन्याय करके खुलेगा, घूस देने का अपराध करके हासिल होगा? नहीं, मुझे यह मंजूर नहीं. ऐसा तो नहीं होना चाहिए कि सिस्टम में सब बेईमान हों, कुछ तो ईमानदार होंगे, ज़रूर होंगे. मुझे बहुत से लोगों ने बताया है कि उन्हें घूस दिए बिना नौकरी मिली है. मैं जज बनना चाहती हूँ, यह सच है लेकिन किसी भी प्रकार बनना है, ऐसा नहीं है. ईमानदारी से काम मिला तो करूंगी अन्यथा वकालत या पत्रकारिता कर लूंगी. पापा कहते हैं, बेईमानी से कमाया गया धन हमारे मन और शरीर के रक्त को दूषित करता है, मुझे उनकी बात मुझे जंचती है. समाज में अगर सब भ्रष्ट हो गए तो हम विकसित कैसे होंगे? हमारे देश का क्या होगा? वे जो लोग हमें आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं, उनके भरोसे का क्या होगा? 

और विवेक का क्या होगा? बेचारे का दिल दुख दिया मैंने. मैं क्या करूं विवेक? मैं अपना भविष्य तुम्हें नहीं सौंप सकती. अपना भविष्य मुझे खुद बनाना होगा. ये ठीक है कि तुम मुझे प्यार करते हो लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं मैं तुम्हारी इस मनोभावना के सामने बिछ जाऊं? मुझे लग रहा है कि तुम मेरा साथ दोगे लेकिन मैं अपने भविष्य के साथ जुआ नहीं खेलना चाहती. मैं 'सेफ गेम' खेलूंगी. हाँ, इस बार भी 'सिलेक्ट' न हुई तो तुम्हारी बात मान लूंगी. मम्मी ठीक कहती है कि प्यार करने वाले पति भाग्य से मिलते हैं. जहाँ तक प्यार का सवाल है, जिससे शादी होगी, उससे भी प्यार किया जा सकता है. है कि नहीं? देखूंगी, आगे क्या होने वाला है, इस समय तो मुझे बहुत जोर से नींद आ रही है. जबलपुर में इतनी ठण्ड क्यों पड़ती है यार? विद्योत्तमा ने अपनी रजाई सब तरफ ठीक से दबाई और मुंह ढंक कर सो गयी. 

अगली सुबह वह आफिस गयी और उसने लम्बी छुट्टी की दरख्वास्त लगा दी क्योंकि चयन परीक्षा में केवल चालीस दिन का समय बचा था और उसे बहुत सी तैयारी करनी थी. 

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