मध्यम मध्यम : तीन
*तीन* सितम्बर माह चल रहा है. पसीना चिपचिपा रहा है. गर्मी में ठंडक घुलने वाली है लेकिन अभी पंद्रह दिन की देर है. प्रतीक्षा है, दुर्गा जी की प्रतिमा विराजमान होने की, तब शीतल वायु बहने लगेगी. दुर्गा की स्थापना के लिये युवा टोलियों की बैठकें चल रही हैं, चन्दा वसूली के लिए जत्थे निकल रहे है. सजावट, बिजली और ध्वनि-विस्तारण वालों के साथ योजना को अंतिम रूप दिया जा रहा है, मोलभाव भी चल रहा है. सभी पंडाल घूँघट काढ़े छुपे-छुपे साज-सज्जा में लगे हैं और दूसरे पंडाल वाले आयोजकों ने अपने जासूस पूरे शहर में फैला दिये हैं, 'जाओ, घूँघट की आड़ में वहां क्या चल रहा है, घुसकर पता करो और पूरा समाचार लाओ.' इधर जबलपुर के हनुमानताल में कौवे और चील इस पार से उस पार बेमतलब उड़ रहे हैं. लाउडस्पीकर में फ़िल्मी गाने बज रहे हैं. बीच-बीच में मस्जिद से अज़ान की आवाज भी उभरने लगती है. कोई भजन लगा देता है तो कोई उसके जवाब में कव्वाली. हनुमानताल के निवासी इन आवाजों के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि जैसे उन्हें कुछ सुनाई न पड़ता हो. विद्याशंकर के घर में आज दिन का भोजन तैयार हो रहा है. रज्जो के देवर प्रभुशंकर आये हु...