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*तीन*
सितम्बर माह चल रहा है. पसीना चिपचिपा रहा है. गर्मी में ठंडक घुलने वाली है लेकिन अभी पंद्रह दिन की देर है. प्रतीक्षा है, दुर्गा जी की प्रतिमा विराजमान होने की, तब शीतल वायु बहने लगेगी. दुर्गा की स्थापना के लिये युवा टोलियों की बैठकें चल रही हैं, चन्दा वसूली के लिए जत्थे निकल रहे है. सजावट, बिजली और ध्वनि-विस्तारण वालों के साथ योजना को अंतिम रूप दिया जा रहा है, मोलभाव भी चल रहा है. सभी पंडाल घूँघट काढ़े छुपे-छुपे साज-सज्जा में लगे हैं और दूसरे पंडाल वाले आयोजकों ने अपने जासूस पूरे शहर में फैला दिये हैं, 'जाओ, घूँघट की आड़ में वहां क्या चल रहा है, घुसकर पता करो और पूरा समाचार लाओ.'
इधर जबलपुर के हनुमानताल में कौवे और चील इस पार से उस पार बेमतलब उड़ रहे हैं. लाउडस्पीकर में फ़िल्मी गाने बज रहे हैं. बीच-बीच में मस्जिद से अज़ान की आवाज भी उभरने लगती है. कोई भजन लगा देता है तो कोई उसके जवाब में कव्वाली. हनुमानताल के निवासी इन आवाजों के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि जैसे उन्हें कुछ सुनाई न पड़ता हो.
विद्याशंकर के घर में आज दिन का भोजन तैयार हो रहा है. रज्जो के देवर प्रभुशंकर आये हुए हैं. सतना में रहते हैं, दो बच्चे हैं, तहसीलदार हैं, खुद का पक्का मकान है. सतना से कुछ दूर पर स्थित नागौद में साढ़े आठ एकड़ कृषि योग्य जमीन है, एक कृषक को अधिया में दिये हुए हैं.
एक बजे विद्याशंकर दूकान से घर आये, दोनों ने साथ बैठकर भोजन किया. विद्याशंकर खाने के बाद दूकान वापस चले गए. रज्जो ने अपनी सास को थाली परोसकर दी फिर बच्चों के लिए सब सामान ढंककर रख दिया ताकि वे स्कूल से लौटने के बाद खुद निकालकर खा लें. उसके बाद अपनी थाली लगाकर खाने बैठी. रज्जो की सास और देवर में धीरे-धीरे बात चल रही है, रज्जो उनकी बात सुनने की कोशिश कर रही है, कुछ सुनाई पड़ रहा है, कुछ नहीं.
'बहू को नहीं लाये. ले आते तो मिल लेते.' रत्ना ने कहा.
'घर छोड़ते नहीं बनता अम्मा. वहां चोरी-डकैती की वारदात बहुत होती है.' प्रभुशंकर ने बताया.
'तो क्या तहसीलदार को भी नहीं छोड़ते?'
'उनका गणित वे जानें, हमें तो हर समय डर बना रहता है.'
'क्या तुम्हारा रुतबा नहीं है वहां?'
'तहसीलदार का क्या रुतबा? सुबह से रात तक बड़े साहबों की सेवा में सिर झुकाए खड़े रहो, उनकी और मेमसाहब की फरमाइश पूरी करो, यही हमारा काम है.'
'तुम नहीं रहते तो बहू घर सम्हाल लेती है?'
'वाह, पूरे पावर में रहती है. तहसीलदारनी बहुत पावरफुल पोस्ट है.'
'और सुनाओ.'
'अम्मा हम ये कह रहे थे कि हम दोनों भाइयों का बंटवारा अपने सामने कर जाती तो अच्छा था.' प्रभुशंकर ने धीरे से कहा.
'बंटवारा? तुमको बंटवारा चाहिए?' अम्मा बोली.
'न, मुझे नहीं चाहिए लेकिन हो जाता तो अच्छा रहता.'
'क्यों, क्या बात है?'
'देखो अम्मा, मेरे और विद्या भैया के बीच कोई बात नहीं है. हम सगे भाई हैं, आपके बेटे हैं. जो उनका है, वह मेरा है और जो मेरा है, वह उनका है लेकिन दोनों के बच्चे अलग-अलग कोख से आए हैं. उनमें हम भाइयों जैसा प्रेम कहाँ रहेगा? कल के दिन ये बच्चे आपस में लड़ें-झगड़ें या कोर्ट-कचहरी जाएं तो लोग क्या कहेंगे? इसलिए सब बातें अभी से साफ़ हो जाएं तो क्या हर्ज़ है?'
'हर्ज़ तो कुछ नहीं है लेकिन इस घर के अलावा और क्या है जिसका बंटवारा किया जाए? फिर, विद्या का परिवार और मैं यहाँ रहा रहे हैं!'
'मैंने कब कहा कि ईंटा मंगवाकर आज ही घर के बीच दीवार खिंचवा दो? आप और भैया आराम से यहाँ रहें, कोई बात नहीं. मेरा कहना यह था कि जो बात लिखा-पढ़ी में आ जाये, वह ठीक है.'
'प्रभु, तेरे को क्या कमी है रे?'
'अम्मा, कोई कमी नहीं है. साक्षात् लक्ष्मी घर में विराजमान है, ऊपर से आपका आशीर्वाद भी है.'
'फिर, ऐसी बात क्यों करता है? तेरे बाबूजी के गुजरने के बाद विद्या खुद नहीं पढ़ा लेकिन कितनी मुसीबत उठाकर तुझे पढ़ाया, तेरी नौकरी लगवाने के लिये घूस दी. सब भूल गया तू?'
'राम-राम कैसी बात करती हो अम्मा, मैं विद्या भैया का जीवन भर ऋणी रहूँगा. मैं चाहूं तो भी उस क़र्ज़ को अपने माथे से नहीं उतार सकता. वे मेरे लिए राम हैं और मैं उनका लक्ष्मण.'
'फिर ये घर तुझे विद्या के लिए छोड़ देना चाहिए. चार बच्चे हैं उसके, कहाँ जाएंगे? मैं तुझे इस घर में हिस्सा नहीं दे सकती.'
'अम्मा, एक बात कहूं? बुरा मत मानना. आपके देने या न देने से कुछ नहीं होगा. यह घर बाबू जी का नहीं, दादा जी का बनवाया हुआ है. कानून के हिसाब से बच्चों का जन्म लेते ही इस पर अधिकार हो गया. आपको इसीलिए सलाह दे रहा हूँ कि अपने हाथ से दे दोगी तो बच्चे आपका नाम लेंगे और कहेंगे, "हमारी दादी ने दिया है' नहीं दोगी तो कोई खास बात नहीं है.'
'आने दो विद्या को, उससे बात करती हूँ.'
'बात कर लो आप, समझ लो और अपना फैसला मुझे बता दो. मेरी बात को 'अदरवाइज' मत लेना अम्मा. मैं भविष्य के लिए सब व्यवस्था अभी से बनाना कहता हूँ इसलिए आपसे कहा.'
प्रभुशंकर की अपनी बात कहकर चुप हो गये. रत्ना के दिमाग में खलबली मच गयी. जैसे अचानक कुछ वैसा सामने आ गया जिसकी कल्पना न थी. वे अपना माथा पकड़कर कुछ सोच रही थी तब ही रज्जो उनके पास आयी, उनके बालों में हाथ फेरा और कहा- 'अम्मा, काहे को चिन्तित होती हो? देवर जी का आधा हिस्सा बनता तो है, दे दीजिए.'
'बात तुम्हारी ठीक है लेकिन....'
'लेकिन क्या अम्मा?'
'तुम उसकी पूरी बात सुनी नहीं हो. मुझे उसकी बात समझ में आ गयी है. असल में, उसकी नीयत खराब हो गयी है. आज कागज़ पर लिखवाएगा, कल यहाँ मजदूर लाकर खड़ा कर देगा और बोलेगा कि दीवार खींचना है. रज्जो, छोटा सा घर है अपना, बीच में दीवार खड़ी हो जाएगी तो हमारा निस्तार कैसे होगा?'
'सब बन जाएगा अम्मा. हम चला लेंगे.'
'नहीं, कमजोर बनने से काम नहीं बनेगा. सोचने दे मुझे.' रत्ना बोली.
रात को ब्यारी के समय दोनों भाई साथ खाने के लिए बैठे. रज्जो ने दोनों को भोजन परोसा. सब चुप थे. रत्ना ने बात शुरू की, 'प्रभु, तुमने जो बात हमसे दुपहरिया में की, वो हमने विद्या और रज्जो को बताई. ये दोनों मान रहे हैं कि इस घर में तुम्हारे बच्चों का भी बराबर का हिस्सा है, उनको मिलना चाहिए.'
'ये तो अच्छी बात है, कल मैं स्टाम्प ले आता हूँ, सबके दस्तखत हो जाएगे.' प्रभुशंकर प्रसन्न होकर बोले.
'हाँ, ले आओ. तुम तहसीलदार हो, कानून जानते हो, सब बात विस्तार से लिखवा लेना. मेरी तरफ से एक बात जोड़ लेना कि जब तक मैं ज़िंदा हूँ, घर में बंटवारे की दीवार नहीं खिंचेगी.'
'परन्तु अम्मा, अगर हमारा ट्रांसफर जबलपुर हो गया तो हम कहाँ रहेंगे? फिर तो बनवाना पड़ेगा.'
'जबलपुर आओगे तो सब साथ में रहेंगे, अलग क्यों रहोगे?'
'साथ रहने में किच-किच हो सकती है. क्यों झगड़े की स्थिति लाना?'
'तुम्हारी बात भी ठीक है. कोई बता रहा था कि साहब लोगों को सरकार बँगला देती है, तुमको नहीं मिलेगा क्या? तुम साहब नहीं हो?'
'बंगला मिलता है लेकिन अपना घर, अपना घर होता है.'
'चाहे जो हो, मेरे जीते जी इस घर के टुकड़े नहीं होंगे. अभी स्वस्थ हूँ, पंद्रह-बीस साल तो जिऊँगी, हाँ, यमलोक में यमराज मेरा रास्ता देख रहा हो तो अलग बात है. तुम देख लो, बहू से फोन करके समझ लो.'
'बहू से समझने की बात नहीं है, मैं उससे पूछ कर काम नहीं करता, मेरे पास भी दिमाग है.'
'तुम्हारी बात ठीक है पर सलाह कर लेने में क्या हर्ज़ है?'
'मैं आपकी शर्त मान लेता हूँ कि आपके रहते-रहते घर के दो टुकड़े नहीं होंगे पर इस बात को स्टाम्प में लिखने की क्या ज़रुरत है?'
'है, अगर नहीं लिखोगे तो न मैं दस्तख़त करूंगी और न ही विद्या करेगा.'
'आपको मेरे ऊपर भरोसा नहीं है?'
'जब तुमको मेरी बात का भरोसा नहीं है, स्टाम्प में लिखापढ़ी कर रहे हो तो सब बात लिखित होनी चाहिए.'
'अम्मा, ऐसा तो नहीं बनेगा.'
'तो फिर, जैसा है, वैसा रहेगा. जब तुम दोनों के बच्चे बड़े हो जाएंगे तो आपस में बैठकर तय कर लेंगे या लड़ लेंगे, तुम क्यों फ़िक्र करते हो?' रत्ना ने अपना फैसला सुनाया.
प्रभुशंकर का मुंह लटक गया. कुछ देर तक वह सोचने की मुद्रा में बैठा रहा फिर बोला, 'अम्मा, मैं निकलता हूँ, रात को सतना पहुंचना है, कल दिन में ड्यूटी करनी है.'
'ठीक है.' रत्ना ने कहा.
*****
अविभाजित परिवार ऊपर से सुगठित दिखाई पड़ते हैं लेकिन भीतर गहरी दरारें होती हैं. समय आने पर उभरकर बाहर आती हैं लेकिन झिझक-झिझक कर. चाहे जो भी रिश्ता हो, उसकी जांच होती रहती है. हर रिश्ते की एक 'डिमांड' होती है जो पूरी करनी पड़ती है, कई बार पूरी नहीं हो पाती, बस, यहीं से विरोध का भाव पनपने लगता है. सर्वाधिक संवेदनशील रिश्ते हैं, अभिभावक-संतान के और पति-पत्नी के. ये दोनों एक-दूसरे से लम्बे समय तक जुड़े हुए रिश्ते होते है, लिहाज़ा मतभेद और मनभेद की संभावना हर समय बनी रहती है.
अभिभावक अपने बच्चे को अपनी सोच के अनुरूप ढालना चाहते हैं जबकि संतान खुद को वर्तमान माहौल के अनुरूप विकसित करना चाहती है. स्वाभाविक है कि टकराव होगा. इस रिश्ते में समय के साथ वर्चस्व का खेल भी शुरू होता है. बच्चा, जो आश्रित था, वह वयस्क हो जाने के बाद आज़ादी चाहता है, उसे आदेश पसंद नहीं आते, अब वह आदेश देना चाहता है. काम आसान तब होता है जब वह व्यक्ति धनोपर्जक बन जाता है और अभिभावक अशक्त हो जाते हैं. इस स्थिति में सत्ता का हस्तांतरण हो या न हो, यह आम तौर पर विवाद का कारण बनता है. जो बात न बढ़ाने के नाम से चुप रह गया, वह सदा के लिए चुप रह जाता है और जो चुप नहीं हुआ, वह और मुखर हो जाता है. उसकी आवाज़ दहाड़ में बदल जाती है और सहसा वह सत्ता के सिंहासन पर आसीन हो जाता है. कुछ परिवारों में ऐसा भी होता है कि दोनों चुप नहीं होते, जी भर कर बहस करते हैं, एक-दूसरे को भला-बुरा कहते हैं, इतिहास के पन्ने खोलते हैं. जब आवाज़ तेज हो जाती है तब पड़ोसी, फिर मित्र, फिर रिश्तेदार, फिर गाँव वाले जान जाते है कि बाहर से मजबूत दिखने वाला परिवार अन्दर से भसक रहा है. कुछ समय बाद उनका दिखावटी एका छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर जाएगा, वे परस्पर पीठ करके बैठ जाएँगे और संभवतः एक-दूसरे की शक्ल देखना भी पसंद नहीं करेंगे.
प्रभुशंकर के जाने के बाद रत्ना, विद्याशंकर और रज्जो बैठकर विचार-विमर्श करने लगे. रत्ना को आश्चर्य हो रहा था कि साधनसम्पन्न होने के बावजूद भी प्रभुशंकर के दिमाग में यह बात क्यों आयी? मुद्दे को मीठी चाशनी में लपेट कर उठाया गया था लेकिन उसकी भीतरी कडुआहट समझ में आ रही थी. वे जान रहे थे कि आज भले ही बात टल गयी लेकिन यह मामला आगे तूल पकड़ेगा, प्रभुशंकर अगली बार किसी नयी हिकमत का इस्तेमाल करेगा. रत्ना बोली, 'मेरे रहते चिंता मत करो. तब तक बच्चे व्यवस्थित हो जाएगे, फिर देखा जाएगा.'
विद्याशंकर और रज्जो की बड़ी बेटी विद्योत्तमा चौबीसवें में लग गयी है. रज्जो को उसके ब्याह की फ़िक्र हो रही है लेकिन ब्याह की बात आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं हो रही है क्योंकि घर में धनाभाव है. रत्ना ने पूछा, 'क्या सोच रहे हो तुम लोग विद्योत्तमा के लिए?'
'अम्मा, उसने 'ला' पास कर लिया है, कहती है, जज बनूंगी.' रज्जो ने जवाब दिया.
'यह तो अच्छा है, जज बन जाएगी तो उसकी इज्जत की ज़िन्दगी रहेगी. शादी भी किसी जज से हो जाएगी.'
'शादी तो बाद की बात है, नौकरी लग जाए तब बात बने.'
'नर्मदा मैया सबका ध्यान रखती हैं, उत्तमा का भी रखेंगी.' रत्ना ने हाथ जोड़ते हुए कहा.
विद्योत्तमा बचपन से ही शांत स्वभाव की रही. परिवार में जो पहले आता है, वह बड़ा कहलाता है इसलिए बड़प्पन उसमें स्वाभाविक रूप से प्रवेश कर जाता है. बड़े होने की कारण उसके अधिकार अधिक होते हैं तो उतने कर्तव्य भी. विद्योत्तमा भलीभांति समझती थी कि बड़े परिवार की जिम्मदारी का बोझ उठा पाने में उसके पिता कमजोर पड़ रहे हैं क्योंकि उनकी दूकानदारी में दम नहीं है. उसकी कानून की पढ़ाई बमुश्किल हो पायी, इधर-उधर से मांगकर किताबें पढ़ी तब काम बना. उससे छोटे तीन भाई-बहन भी हैं, उन्हें भी पढ़ाना है, व्यवस्थित करना है. उसकी कई सहेलियां ब्याह कर ससुराल चली गयी, जब कभी मैके आती हैं तो लक-दक कपड़े पहनती है, गहने दिखाती हैं, फैशनेबल चप्पल पहनती हैं. शरीर गदरा सा जाता है, बातों में चहक आ जाती है और आँखों में चमक के साथ थोड़ा सा परायापन भी. कई बार उनसे मिलकर उत्तमा ललच जाती, सोचती, काश! मेरे घर में भी संसाधन होते, मैं भी दुल्हन बनती, पिया के घर जाती लेकिन यहाँ तो वह संभावना दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही है. वह समझ रही थी कि लड़की बनकर छुई-मुई सी घर में रहेगी तो काम नहीं चलेगा, उसे खुद को मजबूत बनना पड़ेगा. बहुत सोच-विचार कर उसने निर्णय लिया कि वह आजीवन अविवाहित रहकर अपने परिवार को सहयोग करेगी.
मनुष्य अपने जीवन में कई तरह के फैसले लेता है, कुछ करने के, कुछ न करने के. ये फैसले उसके अपने दिमाग की उपज होते हैं लेकिन यह जरूरी नहीं है कि उसके फैसले परिवार को मान्य हों. अपने फैसले पर टिका रहना वैसे ही मुश्किल होता है, लेकिन अगर कोई टिक जाए तो परिवार का दबाव उसे अस्थिर का सकता है या परिस्थितियां वैसा न करने के लिए मजबूर कर सकती हैं. विद्योत्तमा भाग्यशाली थी कि वह परिवार को व्यवस्थित करने में सफल रही लेकिन अविवाहित रहने वाला उसका फैसला ध्वस्त हो गया, उसे विवाह करना पड़ा. खैर, विवाह तो बहुत बाद में हुआ, अभी आप उसकी ज़िन्दगी के संघर्ष की दास्तान पढ़िए.
रात का भोजन हो चुका है. रज्जो और विद्योत्तमा ने मिलकर चौका समेट दिया है. जूठे बर्तन एक टोकनी में भरकर रख दिये गये है ताकि सुबह पानी आने पर उन्हें मांजा जा सके. थोड़ी सी सब्जी बच गयी है लेकिन उसे सुरक्षित रखने का कोई उपाय नहीं है क्योंकि घर में फ्रिज लाने का विचार बहुत समय से चल रहा है लेकिन फ्रिज अब तक नहीं आ पाया. कई बार दूध फट जाता है, दाल महक जाती है, सब्जी ख़राब हो जाती है तब रज्जो को बहुत कोफ़्त होती है लेकिन चुप रहती है क्योंकि वह जानती है कि दूकान की बचत को विद्याशंकर बैंक में सुरक्षित रखते हैं ताकि इस साल सिविक सेंटर में खुद की दूकान खरीद सकें. इस समय बात की शुरुआत विद्योत्तमा ने की, 'दादी, मैं शादी नहीं करूंगी.'
'शादी नहीं करूंगी? क्यों? क्यों नहीं करेगी?' दादी बोली.
'कारण नहीं बता पाऊँगी लेकिन नहीं करूंगी.'
'बताने की ज़रुरत भी नहीं है क्योंकि तेरी शादी का निर्णय तेरे हाथ में नहीं है.'
'तो किसके हाथ में है?'
'हम लोग हैं न?'
'वो तो है दादी लेकिन घर की हालत देख रही हो! पापा और मम्मी हर समय चुप से रहते हैं, जैसे कोई बोझ उनके सिर पर है जिसे वे ज़ाहिर नहीं करते. उनको उदास देखकर मैं भी उदास हो जाती हूँ. मैं सोचती हूँ, मैंने बहुत पढ़ लिया, अब पापा की मदद करूं.'
'क्या मदद करेगी तू?'
'पापा के साथ दूकान में बैठूंगी, दूकानदारी करूंगी और साथ में जज बनने की तैयारी भी.'
'हे भोले शंकर, क्या हो गया इस लड़की की बुद्धि को? अरे, तू लड़की जात, दूकान में बैठेगी? सब क्या कहेंगे?'
'जिसको जो कहना है कहे दादी, मैं चिंता नहीं करती. मैं भाई-बहनों में सबसे बड़ी हूँ, अपनी ज़िम्मेदारी समझती हूँ.'
'देख व्यापार करना आदमियों का काम है, लड़कियों को शोभा नहीं देता. जबलपुर में किसी लड़की को दूकान में बैठते देखा है क्या?'
'अच्छा ये बता दादी, जज बनूंगी तो तुझे मंजूर है?'
'हाँ, जज बनना मंजूर है.'
'तो क्या लड़कियों को नौकरी करना शोभा देता है?'
'हां, क्यों नहीं?'
'तो व्यापार करने में क्या अड़चन है?'
'तेरा तर्क तो सही है लेकिन जज की नौकरी और व्यापार करने में बहुत फर्क है बेटा.'
'तू फ़िक्र मत कर दादी, एक दिन मैं जज बनकर दिखाउंगी, तब बुराई करने वाले भी तुम्हारी तारीफ करेंगे और कहेंगे, 'देखो, रत्ना पंडिताइन की नातिन को देखो, जज बन गयी.'
'और, न बन पाई तो?'
'तो हाईकोर्ट में वकालत करूंगी, पर शादी नहीं करूंगी.' उत्तमा ने घोषणा की.
'तुम लोग यहाँ सिनेमा देख रहे हो क्या, कुछ बोलते क्यों नहीं?' रत्ना ने विद्याशंकर और रज्जो से कहा.
'दादी और पोती की बातचीत सुन रहे हैं चुपचाप. हमारे बोलने से क्या होगा?' रज्जो ने कहा.
'क्यों?'
'फैसला आप दोनों को करना है, हम तो दर्शक दीर्घा में बैठे कर मज़े ले रहे हैं.'
'तुम लोग माँ-बाप नहीं हो क्या?'
'हैं न, लेकिन हम लोगों की चलती कहाँ है?' रज्जो ने मुस्कुराते हुए कहा. रत्ना ने बहू को घूर कर देखा, मन ही मन खुश हुई और बोली, 'मैं चलती हूँ, मुझे नींद आ रही है.'
'सुने दोनों की बात?' रज्जो ने बिस्तर में लेटे-लेटे पूछा.
'सुना.' विद्याशंकर बोले.
'उस समय तुम कुछ बोले नहीं?'
'उत्तमा ठीक सोच रही है.'
'क्या उसके दूकान में बैठने से तुम्हें कोई फायदा होने वाला है?'
'यह तो बाद में पता चलेगा.'
'तुम्हें क्या लगता है?'
'व्यापार की जगह में दस किस्म के लोग आते हैं, कई किस्म की घटनाएं होती हैं. ये अनुभव उसकी ज़िन्दगी में काम आएँगे.'
'फिर जज कैसे बनेगी?'
'आज के माहौल में तो मुश्किल है लेकिन जो होना है, वह होता है.'
'क्या मतलब?'
'प्रतिस्पर्धा कड़ी है, फिर आरक्षण भी एक बाधा है. दो तरीके हैं उसके पास, या तो बहुत बढ़िया स्कोर करे या उसकी तकदीर काम कर जाए.'
'तुमको क्या लगता है?
'भोलेशंकर की कृपा होगी तो काम बन जाएगा.'
'उनकी कृपा के लिए हमें कोई अनुष्ठान या व्रत करना चाहिए?
'अम्मा से पूछो, वो बताएंगी.'
'तुम भी पंडित जटाशंकर के वंशज हो, इतना नहीं जानते?'
'कितने सवाल करती हो तुम? ख़त्म ही नहीं होते.'
'क्या यह महत्वपूर्ण नहीं हैं?'
'फिर एक सवाल.'
'एक तुम हो जिससे कुछ पूछ सकती हूँ, और किससे पूछूं?'
'फिर सवाल.'
'अच्छा बाबा, अब कोई सवाल नहीं पूछूंगी. चलो यह बताओ कि सिनेमा कब दिखलाओगे?'
'क्या ये सवाल नहीं है?' विद्याशंकर ने झल्लाकर पूछा. रज्जो जोर से हंसने लगी, फिर दोनों हंसने लगे, फिर दोनों ने एक-दूसरे को मुक्के जड़े, फिर दोनों गुत्थम-गुत्था हो गए, फिर गहरी नींद में सो गए.
अगली सुबह के नास्ते के बाद विद्याशंकर और विद्योत्तमा दूकान पहुँच गए. उत्तमा का पूरा दिन साफ़-सफाई करने में बीत गया. पुस्तकों पर धूल-ही धूल थी, कुछ तो वर्षों से बिना बिके हुए पड़ी हुई थी. उत्तमा ने ऐसी पुस्तकों को छांटकर आलमारी के सबसे ऊपर वाले रेक में जमा दिया. अक्सर बिकने वाली पुस्तकों को उसके नीचे और रोज बिकने वाली पुस्तकें हाथ के पास रख दिया. दूकान की छत पर लगे जाले हट गए, आलमारियों के कांच चम-चम चमकने लगे. उत्तरा जिस तरह अपने किचन को साफ़-सुथरा और सजा कर रखती है, उसी तरह दूकान को भी व्यवस्थित करने में उसे पूरा दिन लग गया. शाम को घर आकर घर के काम में लग गयी.
विद्याशंकर की दूकान में ग्राहक कम आते थे. धार्मिक पुस्तकों का आकर्षण सामान्य पाठकों में नहीं था, या तो पुरोहित आ जाते थे या कोई जिज्ञासु. स्टेशनरी का सामाँन भी कम बिकता था क्योंकि आसपास कोई स्कूल नहीं था. दूकान जबलपुर की व्यस्त सड़क पर थी इसलिए ग्राहकों की कमी न थी, उसकी ज़रुरत के सामान की कमी थी. रात को भोजन के बाद घर में बैठक जमी.
'क्या हुआ आज विद्योत्तमा ?' दादी का प्रश्न उछला.
'दूकान में बहुत गंदगी थी, आज अच्छी सफाई हो गयी.' विद्योत्तमा ने उत्तर दिया.
'क्यों विद्या? दूकान में साफ़-सफाई नहीं करते?
'करता तो हूँ.' विद्या ने सफाई दी.
'ये क्या बता रही है फिर?'
'कोई खास बात नहीं अम्मा, नया मुल्ला ज्यादा अल्ला-अल्ला करता है.'
'अच्छा, मैंने झूठ कहा?' विद्योत्तमा बोली.
'मैंने कब कहा कि तुमने झूठ बोला. जिस जगह में हम रोज बैठते हैं, वहां की अव्यवस्था दिखाई नहीं पड़ती, ध्यान नहीं जाता.'
'आपकी बात ठीक है पापा लेकिन यह बताइए कि जो ग्राहक दूकान में आता है, उसे दिखाई पड़ता है कि नहीं?'
'हाँ, उसे दिखेगा.'
'वह क्या 'इम्प्रेशन' लेकर जाएगा?'
'तुम्हारी बात सही है.'
'हमें अपनी दूकान में कुछ 'आयटम' बढ़ने होंगे पापा.'
'जैसे?'
'साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाओं को मंगवाकर 'डिस्प्ले' करते हैं, शहर के पाठक उसे देखकर आकर्षित होंगे.'
'ठीक है. मैं कल पता करता हूँ.'
'आपको नहीं, मुझे पता करने दीजिए. बस स्टेंड के पास इसका 'होलसेलर' है, मैं उससे जाकर बात करती हूँ.'
'मंजूर, उससे कमीशन की बात कर लेना और जो पत्रिकाएँ नहीं बिकेगी, उसका क्या होगा, पूछ लेना. कुछ पैसे लेते जाना. पहली बार नगद देना होगा, उसके बाद अपना खाता खुल जाएगा.' विद्याशंकर ने कहा.
अगली शाम विद्याशंकर की दूकान के बाहर एक टेबल पर रोचक पुस्तक और पत्रिका का बाजार सज गया. कुछ पत्रिकाओं को सामने रस्सी में फंसा कर करीने से टांग दिया गया ताकि आते-जाते ग्राहक को दूर से दिखे. पहले दिन चार पत्रिका बिकी.
जबलपुर में रहने वाले लोग जिस चीज से प्यार करते हैं, भरपूर करते हैं, मन लगाकर करते हैं. जैसे, ब्रेड का उदाहरण लीजिए, सबसे पहले शहर में 'पापुलर ब्रेड' लोकप्रिय हुई. हर कोई इसी ब्रांड की ब्रेड खरीदता था. जैसे-जैसे समय बीता, कुछ नए ब्रांड बाजार में अवतरित हुए, वे भी बिकने लगे. आश्चर्य यह है कि ग्राहक दूकानदार से कहता, 'एक पैकेट पापुलर देना', लेकिन वह किसी दूसरी ब्रांड की ब्रेड को ख़ुशी-ख़ुशी ले लेता. वह हर ब्रेड को 'पापुलर' कहता, निर्माता कोई भी हो. ऐसा ही हाल समाचारपत्र 'दैनिक नवभारत' का भी है, अखबार का नाम कुछ भी हो, उसके लिए अख़बार का नाम 'नवभारत' है. इसी दैनिक नवभारत में एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ, 'आवश्यकता है, 'ट्रेनी' संवाददाताओं की.' विद्योत्तमा ने अर्जी भेज दी, साक्षात्कार के लिए बुलावा आ गया.
विद्योत्तमा के लिए यह गंभीर चुनौती थी. पत्रकारिता में पुरुषों का वर्चस्व था, लडकियां कम थी, शायद भाग-दौड़ का संकोच था. विद्योत्तमा ने सोचा, अखबार से जुड़ने में जान-पहचान का दायरा बढेगा, देश-विदेश की ख़बरें रोज के रोज सामने आएंगी, वरिष्ठ पत्रकारों की बात सुनने को मिलेगी. समस्या एक नहीं, दो थी. पहली घरवालों की अनुमति और दूसरी अखबार में नियुक्ति.
'तुम तो गज़ब कर रही हो बिटिया, पहले जजी के लिए हमसे हाँ करवा ली, फिर दूकान जाने के लिए, अब तुमको अखबार में भी नौकरी करना है.' दादी ने कटाक्ष किया.
'दूकान में शाम को ग्राहक रहते हैं, दिन भर वहां बैठे-बैठे बोर हो जाती हूँ. मैं और पापा कितनी गप मारेंगे? अखबार के दफ्तर में दिन भर का उपयोग हो जाएगा, शाम को दूकान आ जाउंगी.' विद्योत्तमा ने समझाया.
'मैं देख रही हूँ कि अपनी बात मनवाने के लिए तू मज़बूत तर्क गढ़ लेती है, कानून की पढ़ाई में क्या बहस करना भी पढ़ाते हैं?'
'नहीं दादी, वह तो हम लड़कियों का जन्मजात गुण है.'
'हम भी लड़की पैदा हुए थे, हमें तो नहीं आता, बहस करना.'
'आपके जमाने में टीवी था क्या? नहीं न? हम नए जमाने की हैं, रोज टीवी के सामने बैठकर दुनिया देखते हैं. अब हम छुई-मुई का पौधा नहीं हैं, दुनिया बदल गयी है दादी.'
'वह तो दिख रहा है.'
'तो फिर जाऊं इंटरव्यू देने?'
'अपनी मम्मी से पूछ.'
'पहले आप सिर हिलाओ, मम्मी का नंबर आपके बाद है.'
'ले, मेरी तरफ से हाँ है.' दादी बोली. विद्योत्तमा दादी के गले से लिपट गयी, 'मेरी प्यारी दादी.'
दादी ने 'हाँ' कर दी तो फिर किसी और से क्या पूछना? विद्योत्तमा ने उस दिन नयी सिली हुई सलवार-कुर्ती पहनी और सीना ताने अखबार के दफ्तर पहुँच गयी.
और लोग भी इंटरव्यू देने आए थे, चौथे नंबर में विद्योत्तमा को बुलाया गया. आफिस में दो लोग बैठे थे, बड़ी चेयर में कुर्ता पहने कोई प्रौढ़ थे और उनके बगल में एक व्यक्ति टाई-शर्ट पहने. प्रौढ़ ने कहा, 'बैठ जाओ.'
'जी.' बैठते साथ विद्योत्तमा ने कहा.
'पत्रकारिता करना चाहती हो?'
'जी नहीं.'
'नहीं, तो यहाँ क्यों आई हो?'
'काम सीखने.'
'समझ में नहीं आया. जब पत्रकारिता करनी नहीं है तो इसे सीखने की क्या ज़रुरत?'
'है.'
'तुम्हारी बात हमारी समझ में नहीं आ रही है.'
'मैं जज बनना चाहती हूँ.'
'ठीक है, बनो लेकिन हम तो उसी को काम सिखाएंगे जो सीखने के बाद में हमारे काम आए.'
'मैं आपके काम आऊंगी न.'
'क्या काम आओगी?'
'पहले सिविल जज बनूंगी, फिर डिस्ट्रिक्ट जज, फिर हाईकोर्ट जज. मानहानि के एक केस में यदि मैंने आपके पक्ष में फैसला दे दिया तो अभी जो मेरे लिए करने वाले हैं उसका हिसाब चुकता हो जाएगा.'
'हम कैसे मान लें?' प्रौढ़ ने पूछा. अब इंटरव्यू ख़त्म हो चुका था, रोचक वार्तालाप चल रहा था.
'फल का पौधा लगाने वाले लोग फल लगने की प्रतीक्षा करते हैं सर.'
'तुम जज क्यों बनना चाहती हो? मान-सम्मान के लिए या पैसे के लिए?'
'पता नहीं. मेरे दिमाग में फिलहाल कोई स्पष्ट चित्र नहीं है. जज की नौकरी में तनख्वाह तो ठीक ही होनी चाहिए, पेट भर जाएगा, जेब भरने की ख्वाहिश नहीं है. जहाँ तक मान-सम्मान का प्रश्न है, कुछ लोग पद के कारण सम्मान पाते हैं, वहीँ पर कुछ अपने काम से पद को सम्मानित करते हैं. मैं किस फ्रेम में फिट होऊँगी, मुझे नहीं मालूम.'
'मान लो, तुम जज नहीं बनी तो?'
'तो वकालत करूंगी.'
'और वकालत नहीं चली तो?'
'आपके अखबार में काम करने आऊंगी.' विद्योत्तमा ने मुस्कुराते हुए कहा. कुर्ताधारी ने टाईधारी को देखा, उनके बीच मौन संभाषण हुआ. टाईधारी ने कहा, 'कल सुबह से आ जाओ, ठीक साढ़े नौ बजे.'
'धन्यवाद सर.' विद्योत्तमा ने कहा.
अगले दिन से विद्योत्तमा अखबारनवीस बन गयी.
अखबार के दफ्तर में पहला दिन अजीब सा लगा. सभी अन्जाने चेहरे, सब अपने काम में मशगूल, किसी को किसी से कोई सरोकार न हो जैसे. बहुत देर तक एक कुर्सी में बैठे-बैठे वह सबके चेहरे झांकती रही, वहां की गतिविधियों को समझने की कोशिश करती रही. थोड़ी देर में बुलावा आया, प्रबंध संपादक ने बुलाया है.
'मैं अन्दर आ सकती हूँ?' विद्योत्तमा ने पूछा.
'आ जाओ, बैठो.'
'आपने बुलाया?'
'हाँ, आज तुम्हारी ड्यूटी यहीं है. एक कोने में कुर्सी जमा लो और चुपचाप बैठी रहो. हमारे पास दिन भर लोग आएँगे, उनसे हो रही वार्तालाप को सुनो और बातचीत के मर्म को समझने की कोशिश करो. '
'जी.' विद्योत्तमा ने कहा और एक कोना पकड़ कर बैठ गयी. इस बीच दो बार चाय मिली और प्रबंध संपादक ने अपना टिफिन भी शेयर किया. शाम को पांच बजे छुट्टी हो गयी, वह अपनी दूकान में आ गयी. पापा ने पूछा, 'आज का दिन कैसा रहा?'
'आसान था क्योंकि बैठे-बैठे केवल 'आब्जर्वेशन' करना था. आज मुझे समझ में आया कि अखबार का काम आसान नहीं है. जिस अखबार को हम दस मिनट में पढ़ लेते हैं, वह दरअसल कोरे कागज़ का गुच्छा है जिसे भरना, बहुत पेचीदा काम है.'
'फिर?'
'पापा, आज बड़े सर के चेंबर में उनके पास बैठी थी, उनकी बातें सुन रही थी, समझने की कोशिश कर रही थी. जब 'फील्ड' का काम मिलेगा, तब असली बात समझ में आएगी. सुनना अलग बात है, उसे क्रियान्वित करना अलग है.'
'फील्ड का काम कब मिलेगा?'
'जब उनकी मर्ज़ी. मैं तैयार हूँ.'
'इतने बड़े शहर में सायकिल से कैसे भागदौड़ करेगी?'
'पापा, अब जब सिर ओखली में दे दिया है तो मूसल से क्या डरना?' उत्तमा ने हंसते हुए कहा और काउंटर पर रखी मैगजीन को व्यवस्थित करने लगी.
'मेरी बिटिया आज बहुत थक गयी है...है न?' रज्जो ने कहा.
'मम्मी, घर में बैठकर कैसे तरक्की होगी?.' उत्तमा ने उत्तर दिया.
'लेकिन तू तो काम फैलाती जा रही है. नौकरी भी करना है, दूकान भी जाना है, जज वाली परीक्षा भी देनी है.'
'और घर का काम भी करना है.'
'हां, पर मैं सोचती हूँ कि तुझे घर के काम से छुट्टी दे दूं.'
'नहीं मम्मी, घर का काम करना नहीं छोडूंगी. आपसे मुझे बहुत कुछ सीखना है. फिर, आप आठ लोगों की रसोई अकेले कैसे संभालेंगी? सुबह की आप संभालो. रात की मैं.'
'रात को हम दोनों मिलकर करेंगे.'
'हाँ, वही.'
'अच्छा, ये तो बता, आज वहां क्या हुआ?'
'पहला दिन था, बहुत अजीब लग रहा था, सब आदमी-आदमी थे वहां पर. मुझे उत्सुक निगाहों से घूर रहे थे.'
'फिर?'
'कुछ दिन लगेगा फिर मैं भी उनकी तरह बन जाऊँगी.'
'तुझे इतनी हिम्मत कहाँ से मिलती है बेटा?'
'अपनी मां से. आप मेरी मां को जानती हो क्या ?' विद्योत्तमा ने अपनी मां से पूछा और दोनों हंस पड़ी.
आज घर में पूरी और आलू की रसीली सब्जी बनने वाली है. रज्जो सब्जी छौंकने लगी, विद्योत्तमा आटा सानने में लगी है.
*****
आज अखबार के दफ्तर में दूसरा दिन. 'सिटी चीफ' ने विद्योत्तमा को बुलाया और कहा, 'किस स्कूल में आपकी पढ़ाई हुई है?'
'हितकारिणी में.'
'ठीक है, आज वहां चले जाओ. दस छात्राओं से मिलो, तीन शिक्षकों से और प्राचार्य से भी. सबसे स्कूल में चल रही पढ़ाई के बारे में बात करो और उसकी एक रिपोर्ट बनाओ.'
'उनसे क्या बात करूंगी?'
'जब छात्राओं से बात करोगी तो अपने-आप संभावित बात के सूत्र हाथ में आ जाएंगे.'
'ठीक है, अभी जाऊं?'
'अभी निकल जाओ. हाँ, किसी को यह मत बताना कि तुम वहां पढ़ी हो. अखबार के प्रतिनिधि के रूप में बात करना है.'
'हो सकता है कि टीचर और प्रिंसिपल मुझे पहचान जाएं, अगर पुरानी होंगी तो?'
'अच्छी बात है, तुम्हारा काम और आसान हो जाएगा.' उन्होंने कहा.
आज पांच साल बाद विद्योत्तमा अपनी स्कूल में आयी. ठिठक कर बाहर खड़ी हो गयी और स्कूल को देखती रह गयी. सात साल तक उसका इस स्कूल से नाता रहा. इसी जगह वह कम उम्र की बच्ची से बढ़कर एक युवती बनी. सहेलियों की याद आ रही है, स्कूल छूटा तो वे सब भी छूट गयी. जो मज़े स्कूल में किये वो कालेज में कहाँ? क्लासरूम में मैडम पढ़ा रही है, पढने में ध्यान किसका? सब एक-दूसरे को कनखियों से देख रही हैं, गाल फुला रही हैं, अँखियाँ फैला रही हैं और क्लास ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही हैं. बिना आवाज़ की ही-ही, खी-खी भी चल रही है. मृदुला रेखाचित्र बनाने में एक्सपर्ट थी, दास मैडम का कार्टून बनाया उसने. मैडम के जाने के बाद पूरी क्लास में 'सर्कुलेट' हो गया, ठहाके लगने लगे. 'मुझे दिखा-मुझे दिखा' के चक्कर में कार्टून की चिंदी बन गयी लेकिन 'फिकर नाट', मृदुला फिर नया कार्टून बना देगी, किसी नए ढंग का.
प्रतिमा से खूब पटी, साथ में फुलकी खाते, कुल्फी खाते और जेब में अधिक पैसे होते तो सराफा में जाकर लस्सी पीते. हाँ, सड़क में खड़े होकर लस्सी पीने में डर लगता था, किसी जान-पहचान वाले ने देख लिया और घर में खबर पहुँच गयी तो निश्चय ही लंकाकाण्ड हो जाएगा लेकिन आप तो जानते हैं, 'नो रिस्क, नो गेन.'
एक लड़का था, क्या मालूम क्या नाम था लेकिन रोज मेरे स्कूल आते-जाते हाज़िरी लगाता था. प्रतिमा चिढ़ाती थी मुझे, कहती थी, 'देख तेरा आशिक है, रोज ड्यूटी बजाता है, कभी तो उसे देखकर मुस्कुरा दिया कर' लेकिन मैंने उसे कभी भाव नहीं दिया. लड़कों का क्या है, जरा सी उंगली पकड़ाओ, बांह थामने लगते है. इश्क के चक्कर में पड़े तो पढ़ाई गयी और सुना है कि रातों की नींद भी चली जाती है. न बाबा, दूर रहो, वही अच्छा है.
सामने खेल का मैदान पसरा पड़ा है. हम इसमें खेलते थे, हाकी, फ़ुटबाल और कबड्डी. कबड्डी भी कितना गज़ब का खेल है, हाथी जैसी ताकत चाहिए, चीते जैसी फुर्ती चाहिए, लोमड़ी जैसी अक्ल चाहिए और चीटियों जैसा तालमेल, 'चल कबड्डी...कबड्डी...कबड्डी, चल कबड्डी आल पाल, मेरी चोटी लाल लाल...लाल लाल'. क्या मज़ा था, कितनी बेफिक्री थी? जाने कहाँ गए वो दिन!
स्कूल में पढ़ाई का समय चल रहा है. मैदान वीरान है, स्टाफ रूम में सन्नाटा है, लडकियां क्लास में बैठकर ज्ञान का घोल पी रही हैं. लगता है प्रिंसिपल कमरे है क्योंकि चौकीदार बाहर अटेंशन खड़ा है लेकिन मुझे उनसे आखिर में मिलना है, अभी क्या करूँ? सामने लायब्रेरी दिख रही है, शायद वहां कोई हो.
वहां लायब्रेरियन कुर्सी-टेबल जमाए बैठी-बैठी ऊँघ रही थी. उत्तमा को देखकर उसका चेहरा प्रश्नवाचक हो गया, 'क्या काम है आपको?'
'मैं नवभारत की रिपोर्टर हूँ, आपसे बात करना चाहती हूँ.'
'हाँ.'
'आप यहाँ कब से हैं?'
'पांच साल हो गए.'
'आपकी लायब्रेरी में रोजाना कितनी किताबें इश्यु होती है?'
'कभी-कभार कोई आ जाता है.'
'यहाँ पर बैठकर पढ़ने के लिए?'
'दो-चार लड़कियों हैं जो आती हैं.'
'ऐसी हालत क्यों है?'
'कोई पढ़ना नहीं चाहता शायद.'
'आप उन्हें उत्साहित करने के लिए क्या प्रयास करती हैं?'
'मैं यहाँ लायब्रेरी खोल कर बैठी रहती हूँ. और क्या करूं?'
'क्या कभी आप क्लासरूम में जाकर लड़कियों से पूछा कि वे लायब्रेरी का उपयोग क्यों नहीं करती?'
'क्या यह मेरा काम है?'
'आप यदि छात्राओं को अपना समझती हैं तो आपका काम है, वर्ना आपकी ड्यूटी तो किताबों की चौकीदार जैसी है.'
'मैंने इस ढंग से कभी सोचा ही नहीं.'
'तो अब सोचिये और देखिए कि कैसे आपकी लायब्रेरी में चहल-पहल बढ़े.'
'मैं कल से हर क्लास में जाकर लायब्रेरी से होने वाले फायदे के बारे में बताऊँगी.'
'कल क्यों? आज क्यों नहीं?'
'बॉस से पूछना पड़ेगा न?'
'यदि बॉस ने मना कर दिया तो?'
'तो फिर किताबों की चौकीदारी करूंगी, जो मैं कर रही हूँ.' उसने हंसते हुए कहा.
इतने में अल्प-अवकाश की घंटी बजी, लडकियां दौड़ती हुई क्लास के बाहर निकली. स्कूल के बाहर गरम मुंगोड़ी के ठेले के आसपास जमा हो गयी और हल्ला मच गया, 'पहले मेरे को दे दो भैया, पहले मेरे को'. कुछ लड़कियां बिही वाली के पास चली गयी और बिही छांटने लगी. कुछ मैदान में लगे नीम के वृक्ष के नीचे छोटे-छोटे समूह में खड़ी बतिया रही थी. विद्योत्तमा उसी ओर लपकी.
'तुम लोगों की बातचीत में मैं भी शामिल हो जाऊं?' विद्योत्तमा ने पूछा.
'जी, लेकिन आपको हम नहीं पहचानते.' एक ने कहा.
'मैं विद्योत्तमा हूँ, अखबार की रिपोर्टर.'
'हाँ, अपन बात कर सकते हैं लेकिन अखबार में हमारा नाम नहीं आना चाहिए.'
'नाम क्यों नहीं आना चाहिए.'
'फिर हमको बात करने में डर लगने लगता है.'
'मैं अगर वादा करूं कि किसी का नाम नहीं आएगा, तब?'
'तब तो खुलकर बात होगी.'
'यह बताओ, स्कूल में पढाई कैसी चल रही है?'
'ठीक-ठाक.'
'संतुष्ट नहीं लगती तुम.'
'दरअसल हमें यह नहीं मालूम है कि जो पढ़ाया जा रहा है वह हमारे क्या काम आएगा?'
'क्यों नहीं आएगा? यह तुम्हें आत्मनिर्भर बनाएगा, दुनिया भर की जानकारी देगा.'
'इनमें बहुत सी जानकारियाँ हमारे किसी काम की नहीं हैं.'
'जैसे?'
'साहित्य.'
'साहित्य काम का नहीं है! क्या कह रही हो? देखो, साहित्य अंग्रेजी में हो या हिंदी या अन्य किसी भाषा में, यह हमारे हृदय में संवेदना और कोमलता का भाव विकसित करता है.'
'और इतिहास?'
'इतिहास हमारे अतीत को बताता है और इस बात की तुलना करने का अवसर देता है कि हम पहले कैसे थे, अब क्या हो गए हैं? हमारी पूर्वजों की उपलब्धियों और उनसे हुई गलतियों का लिखित दस्तावेज है इतिहास, यह हमें जानना चाहिए.'
'और संस्कृत?'
'अरे, तुम लोग बहुत चालक हो. मेरे सवालों का जवाब देने के बजाय मुझसे ही सवाल पूछने लगी?'
'नहीं दीदी, हमारे इन सवालों में आपके सवाल का उत्तर है. हमारा कहना यह है कि हमें जो पढ़ाया जाता है, हम बस पढ़ रहे हैं, उसकी उपयोगिता नहीं बताई जाती. जो हम पढ़ते हैं, उसमें समझने लायक कम है, अधिकतर को रटना है और परीक्षा में लिख देना है.'
'इस बात को समझो, सार्थक जीवन के लिए ज्ञान आवश्यक है. अभी तुम लोगों को जो बताया जा रहा है, वह ज्ञान प्राप्त करने की शुरुआत है, प्रथम प्रवेश-द्वार है. इनकी उंगली पकड़कर तुम्हें खुद आगे बढ़ना होगा. सभी विषयों की थोड़ी-थोड़ी जानकारी तुम्हें दी जा रही हैं ताकि उनमें से अपनी रूचि के विषय को आधार बना कर तुम लोग आगे बढ़ सको, यही स्कूली शिक्षा का उद्देश्य है. एक दिन यह ज़रूर तुम्हारे काम आएगा.' इतने में अल्पकालिक छुट्टी समाप्त होने की घंटी बज गयी. लड़कियों ने कहा, 'दीदी, आपसे बात करके बहुत अच्छा लग रहा है. आपसे और भी बातें करनी है लेकिन अभी क्लास में जाना है.'
'तो?'
'दीदी, कल सुबह हम लोग आधे घंटे पहले स्कूल आ जाएंगे, आप भी आ सकती हैं क्या?
'आ जाउंगी, कल मिलते हैं.' विद्योत्तमा ने कहा.
अखबार का दफ्तर. रात को ड्यूटी करने वाले अभी आये नहीं हैं इसलिए वीरानी है. एकाउंट्स और विज्ञापन विभाग में काम चल रहा है. संपादक आ चुके हैं. कोई उनसे मिलने आया है. पानी और चाय पहुँच गयी है. स्कूल से लौटकर विद्योत्तमा स्कूल के अनुभव को कागज़ पर उतारने के लिए कागज़ ढूंढ रही है, तब ही उसको याद आता है कि बाथरूम का काम निपटा लेना चाहिए. एक कामन बाथरूम है, वह वहां अकेली महिला है इसलिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है. पुरुषों के बाथरूम में जाना अटपटा लगता है लेकिन जाना पड़ता है. बार-बार न जाना पड़े इसलिए वह पानी कम पीती थी, इससे वहां जाने की झंझट कम होती है.
वह कोशिश कर रही है कि रपट जल्दी बना ली जाए ताकि जो कुछ दिमाग में सुरक्षित है, वह कागज़ में सुरक्षित हो जाए. आज तो अधूरी बन पाएगी, कल सुबह फिर जाना है, तब फायनल रपट तैयार होगी. उसने लिखना शुरू किया, जो कुछ हुआ, थोड़ी देर में कागज़ पर उतर आया. एक बार उसने उसे फिर से पढ़ा, कुछ शब्द रिपीट हो गये थे, उनको काटा. कुछ वाक्य फ्लो में नहीं थे, उनको फिर से लिखा. एक गहरी सांस ली, अचानक हल्की सी ख़ुशी उसके दिल और दिमाग में तैर गयी. दोनों हाथों की उँगलियों को फंसा कर उसने हाथ ऊपर किये और अंगड़ाई ली तब ही संपादक का बुलावा आ गया.
'क्या हुआ?'
'स्कूल गयी थी सर, कल फिर जाऊँगी.'
'क्यों?'
'बात अधूरी रह गयी.'
'क्यों?'
'टाइमिंग गलत हो गयी थी. मैं जब स्कूल गयी तब पढ़ाई चल रही थी, कई लोगों से मुलाक़ात नहीं हो सकी.'
'फिर?'
'कल स्कूल खुलने के पहले पहुँच जाऊँगी ताकि अधिक लोगों से बात हो सके. यदि आप अनुमति दें तो कल सुबह यहाँ न आकर सीधे वहीँ पहुँच जाऊं.'
'ठीक है.' संपादक ने कहा.
*****
घर में आज गकड़िया बनी है और साथ में बैगन का भरता. बैगन का भरता बनाना जितना आसान है, गकड़िया बनाना उतना कठिन. बहुत मगजमारी है, सेंकने में समय भी बहुत लगता है. यह दादी से लेकर गप्पू तक सबको पसंद है. मम्मी के हाथ में तो जादू है. जो भी बनाती हैं, खाओ और उंगलियाँ चाटते रह जाओ. जबलपुर आकर यहाँ का खाना बनाना सीख लिया है, इलाहाबाद की पाक-विधा में पहले से पारंगत हैं. गृहिणी होने का फायदा मिला है उन्हें, बढ़िया खाना बनाती हैं. अब पराठा को ले लीजिए, कितना स्वादिष्ट और मुलायम बनाती हैं! वही आटा, वही घी, वही पटा-बेलन, वही आंच, हमसे वैसा नहीं बनता. उन्हें ज़रूर नानी से सिखाया होगा. मैं भी सीखना चाहती हूँ. मम्मी बोलती है, 'जब बाल पाक जाएंगे, तब अपने-आप सीख जाओगी.' बताओ, पराठा बनाना सीखने के लिए बुढ़ापे का इंतज़ार करना होगा! अभी सीख लिया तो सीख लिया, अन्यथा जब नौकरी में चली जाऊँगी तो फिर खाना बनाने का समय कहाँ मिलेगा? सोचती हूँ, चाहे जहाँ नौकरी में जाऊं, खुद का बनाया खाना बैठ कर खाऊँ.
थाली लग गयी है. सब घेरा बनाकर बैठ गए. मम्मी सेंक रही है और विद्योत्तमा परोस रही है. दादी को गकड़िया और भरता बहुत पसंद है लेकिन दांत झर गए हैं इसलिए गकड़िया चबाई नहीं जाती इसलिए मिक्सी में पीस कर परोसा गया है. पापा खाए जा रहे हैं, संभवतः उन्हें पसंद आ गयी है. मम्मी की प्रशंसा हो रही है लेकिन मौन भावाभिव्यक्ति के माध्यम से. दादी के सामने वे अपना मुंह नहीं खोलते, दादी के नाराज़ हो जाने का ख़तरा रहता है. खाने के बाद एक घूँट पानी पिया, एक डकार ली और हाथ धोने के लिए उठ खड़े हुए. अंगोछा से हाथ पोछते हुए बोले, 'अब तुम लोग भी खा लो.'
'हाँ खाते हैं.' मम्मी बोली.
'क्यों विद्योत्तमा, कैसा लग रहा है वहां?'
'ठीक है पापा. नई जगह है, नया काम है.'
'जो काम करो मन लगाकर करो.'
'जी पापा.'
'आज इलाहाबाद से तुम्हारे मामा जी का फोन आया था, तुम्हारे लिए उन्होंने एक लड़का देख रखा है.'
'क्यों मेरे पीछे पड़े हो आप लोग? मैंने कह दिया न कि मैं शादी नहीं करूंगी.'
'अच्छा रिश्ता है बेटा, लड़का जज है. तू जज बने या न बने, जज की घरवाली तो बन जाएगी.'
'मतलब आपको अपनी लड़की के ऊपर भरोसा नहीं है? मैं क्या जज नहीं बन सकती?'
'प्रारब्ध को कौन जानता है बिटिया? हम तो चाहते हैं कि बन जाओ लेकिन यदि न बन सकी और इस बीच तुम्हारी उम्र बढ़ गयी तो फिर अच्छा लड़का नहीं मिलने वाला.'
'आप सोचते बहुत हो, शुभ-शुभ सोचा करो. मेरी शादी की चिंता छोड़ो, मैं शादी नहीं करने वाली. मेरा कहा मानो, उस लड़के की बात संध्या के लिए चला दो.'
'पर संध्या तुझसे छोटी है, ऐसे कैसे चला दें?'
'मेरी बात मानो पापा. मेरे चक्कर में कहीं संध्या की उम्र न बढ़ जाए!' विद्योत्तमा ने हंसते हुए कहा.
सुबह का दस बज चुका है. नास्ता करके विद्योत्तमा घर से निकलने वाली है. मम्मी ने आवाज़ लगाई, 'टिफिन तैयार है, भूलना मत.'
*****
दस बजकर बीस मिनट हो गए हैं. स्कूल खाली पड़ा है. झाड़ू लग रही है, धूल उड़ रही है. विद्योत्तमा स्कूल के भीतर चली गयी, फिर सीढ़ियों से ऊपर. उन सभी कक्षाओं को जाकर नज़दीक से देखा जिनमें उसने पढ़ाई की. कितने सारे सहपाठी याद आये, पढ़ाने वाले याद आये, घटनाएं याद आयी.
मालूम? दसवीं कक्षा में वार्षिक बोर्ड परीक्षा चल रही थी. हमारी कुर्सियां दूर-दूर लगायी गयी थी पर इतनी दूर भी नहीं थी कि बगल वाले का पेपर झांक न सकें. परीक्षा निरीक्षक सख्त थी. क्या मजाल कि कोई नक़ल कर ले, बात कर ले या ताक-झांक कर ले. तीन घंटे का पेपर होता है, पर निरीक्षण को थकना चाहिए, इधर-उधर देखना चाहिए लेकिन वह न थके, न कमरे के बाहर देखे, बस पूरे कमरे में घूम-घूम कर खुद भी हलाकान थी और हम भी परेशान थे. अब मान लो, किसी ने किसी से कुछ पूछ कर लिख लिया तो उसका क्या जाता था? पर नहीं, वह अनुशासन के नाम पर दुस्शासन कर रही थी.
मेरे बगल में मेरी एक सहेली बहुत परेशान दिख रही थी, बार-बार माथे का पसीना पोछ रही थी. पेपर जरा कठिन आया था. मैंने इशारे से पूछा, 'क्या हो गया?'
'नहीं बन रहा है, गयी भैंस पानी में.' उसने अंगूठा नचाकर बताया. मैंने अपनी उत्तर-पुस्तिका का एक पन्ना बाहर लटका दिया ताकि वह मेरा लिखा पढ़ सके और उसका काम बन जाए. निरीक्षक को पास आता देख मैं चल रहे घपले को छुपा लेती. आधा घंटा इसी प्रकार चलता रहा. अचानक उसकी नज़र मेरी हरकत पर पड़ गयी और वह आँखें तरेरते हुए मेरे पास आयी और मुझ पर भड़की, 'क्या हो रहा है?'
'पेपर बना रही हूँ मैडम.' मैंने कहा.
'झूठ बोल रही है, बगल वाली को नक़ल करवा रही है?'
''नहीं तो. मैं क्यों करवाऊंगी?'
'मैंने देख लिया है, तुमने अपनी कापी का पन्ना उसकी ओर लटकाया था और वह पढ़ रही थी.'
'धोखे से हो गया होगा मैडम, सॉरी, अब सावधानी रखूंगी.'
'लड़की, मेरे से होशियारी मत करना. दोनों की कापी जब्त कर लूंगी. दोनों फेल हो जाओगी.'
'जी मैडम.' उत्तमा ने कहा. आधे घंटे के उस नक़ल कार्यक्रम से मेरी सहेली का काम बन गया. पेपर खत्म होने के बाद जब हम क्लास से बाहर निकले तो दोनों ने हाथ मिलाया और ठहाका मार कर हँसे. हंसी की आवाज़ सुनकर निरीक्षक कमरे के बाहर आयी और हम दोनों को गुस्से से देखा, उसके नथुने फड़फड़ा रहे थे. हम दोनों दौड़ कर वहां से भाग लिये.
सबसे पहले वे लडकियां आयी जिन्होंने जल्दी आने की बात कही थी. पेड़ की छांह में बैठकर वार्तालाप शुरू हुआ. 'क्या बनने की सोचा है?' विद्योत्तमा ने पूछा.
'कुछ नहीं सोचा.' पहली ने कहा.
'फिर?'
'फिर क्या? घर वाले कह रहे हैं, पढ़ो, तुम्हारे काम आएगा, इसलिए पढ़ रहे हैं.'
'क्या काम आएगा?'
'क्या पता? वैसे बोलते हैं कि अगर ससुराल में कुछ गड़बड़ हो गयी तो अपने पैर पर खड़े होने की ताकत रहेगी.'
'अभी शादी हुई नहीं और गड़बड़ होने का डर घर में आ गया?'
'कुछ भी हो सकता है मैडम. पति-पत्नी में नहीं पटी, सास-बहू में ठन गयी, ननद-भौजाई में तकरार हो गयी.'
'क्या ज़रूरी है कि झगड़ा हो ही?'
'हा हा हा, मेरा तो अभी से झगड़ा चल रहा है, मम्मी से अपनी बिलकुल नहीं जमती.' दूसरी बीच में बोल उठी.
'क्यों?'
'किसी न किसी बात के लिए मेरे पीछे पड़ी रहती हैं. सुबह जागने से लेकर सोने तक मेरे हर काम पर नज़र रखती हैं. 'नहाए म इत्ती देरी लगत है का', 'सज गयीं हो तो इतै आ जाओ, बहुत काम पड़ो है.', 'काम के नाम से छाती फटत है', 'जब देखौ टीवी से चिपकी रहत हो', 'पढ़वै का नाम पे नींद आत है'. हर समय नाक में दम किये रहती हैं.'
'लगता है कि मेरी मम्मी और तुम्हारी मम्मी सगी बहनें हैं. अच्छा ये बताओ कि कोई सपना देखती हो?'
'सपना हम रोज देखते हैं पर जब नींद खुलती है तो टूट जाता है.'
'अरे यार, वो वाला नहीं, अपने भविष्य का?'
'वो हमारा काम नहीं है, मम्मी-पापा जानें, हमें कुछ नहीं मालूम.'
'तुम लोगों में से किसी ने नहीं देखा?'
'मैंने देखा है.' तीसरी बोली.
'क्या देखा?'
'मैं बम्बई जाऊँगी, हीरोइन बनूंगी.' उसने शर्माते हुए कहा.
'और तुम?' उत्तमा ने चौथी लड़की से पूछा.
'मैं आपकी तरह अखबार में काम करूंगी.' उसने कहा.
'मेरी तरह? मैं तो जज बनना चाहती हूँ, ये तो मेरा टाइमपास है.'
'सच दीदी, आप जज बनोगी?'
'हाँ, उसी के लिए कोशिश कर रही हूँ.'
'फिर तो मज़ा आ जाएगा, 'आर्डर...आर्डर...ये अदालत है'. चलो मैं अपना आइडिया बदलती हूँ, मैं भी आपकी तरह जज बनूगी.' चौथी ने खुश होकर कहा.
'तुम चुपचाप बैठी मुस्कुरा रही हो, तुम्हारा क्या इरादा है? विद्योत्तमा ने पांचवीं से पूछा.
'अपन ये सब टेन्शन नहीं पालते. मेट्रिक हो जाए तो पढ़ाई से छुट्टी. पापा कहते हैं, 'अपनी लड़की को किसी बड़े घर में ब्याहूँगा.' इधर शहनाई बजी और उधर मैं कार में बैठकर ससुराल चली. वहां लकदक साड़ियाँ और गहने पहनूंगी, ज़िन्दगी के मज़े लूंगी.' पांचवीं ने अपनी योजना बतायी.
स्टाफरूम में एक टीचर बैठी हुई हैं. पुरानी हैं. विद्योत्तमा ने उन्हें नमस्ते किया, उन्होंने जवाब दिया और बोली, 'तुमको कहीं देखा है!'
'मैं आपकी स्टूडेंट रही हूँ मैडम.' उत्तमा ने कहा.
'तुम्हारा नाम विद्या है न?'
'विद्या नहीं, विद्योत्तमा.'
'क्या कर रही हो आजकल?'
'अखबार में काम कर रही हूँ.'
'वाह. कहो कैसे आना हुआ?'
'आपसे बात करनी है.'
'जरूर करो.'
'आप यहाँ कई वर्षों से पढ़ा रही हैं, लड़कियों में पढ़ाई के प्रति रुझान घटा है या बढ़ा है?'
'बढ़ा है. पहले लडकियां पढ़ाई के प्रति उतनी जागरूक नहीं थी, क्लास में केवल दो-चार होशियार होती थी लेकिन अब आधी क्लास सजग रहती है और उनमें प्रतिस्पर्धा भी है.'
'ऐसा परिवर्तन क्यों आया?'
'पढ़ाई रोजगार से जुड़ गयी और लड़कियां घर से निकल कर नौकरी के लिए पुरुषों के मुकाबले आ खड़ी हुई.'
'क्या लड़कियों का नौकरी करना आपको जरूरी लगता है?'
'मैं भी तो नौकरी कर रही हूँ, है न? पहले के समय में हम लोग अपनी बेसिक जरूरतें पूरी करने के लिए नौकरी करते थे, अब बेसिक के साथ आर्थिक सम्पन्नता और स्वावलंबन भी शामिल हो गया है.'
'पढ़ने-पढ़ाने में क्या अंतर आया है?'
'अब कोर्स बहुत बढ़ गया है. बहुत तैयारी करके आना पड़ता है. पहले लड़कियां चुपचाप बैठती थी, अब ऐसे-ऐसे सवाल पूछती हैं कि कि सिर घूम जाता है. अब हमारा काम कठिन हो गया है.'
'स्टाफ में आपसी तालमेल कैसा है?'
'मत पूछो.'
'क्या हुआ?'
'जब आपसी संवाद नहीं है तो तालमेल कैसा?'
'संवाद क्यों नहीं है?'
'कोई किसी से बात नहीं करता, सब खुद में मगन हैं. हाँ, एक संवाद है लेकिन एकतरफा.'
'मैं नहीं समझी.'
'प्राचार्य हमें आफिस में बुलाकर लेक्चर देती है, हम सुनते हैं लेकिन बोल नहीं सकते. वोई अकेले बोलती है.'
'ऐसा तो आप लोगों के बारे में लडकियां भी सोचती होंगी?'
'हो सकता है. हमारे लेक्चर छात्राएं सुनती रहती हैं, एक तरफ़ा श्रवण है. किसी ने अगर एक-दो सवाल कर दिये तो पक्के तौर पर टीचर उससे चिढ़ जाती हैं.'
प्राचार्य अभी तक आयी नहीं है. कब आएगी, क्या पता? दफ्तर पहुंचना है, रपट बनानी है. रुकूँ या चलूँ? चलती हूँ.
प्रेस आकार विद्योत्तमा aने रपट बनायी.
"संस्कारधानी जबलपुर में लड़कियों की शिक्षा के लिए अनेक वर्षों से प्रयासरत हितकारिणी उच्चतर माध्यमिक शाला का शानदार इतिहास है और अनुकरणीय वर्तमान. २३०० छात्राओं को छठवीं कक्षा से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा प्रदान कर रही है. यहाँ पढ़े विद्यार्थी इस शाला का नाम बड़े आदर से लेते हैं. यहाँ की छात्राओं ने देश-विदेश में नाम कमाया है, ऊंचे पद पर स्थापित हुई हैं और समाज की प्रगति के लिए अपना योगदान दिया है. आज भी उसी उत्साह से शाला में अध्यापन का महत्वपूर्ण कार्य चल रहा है. ख़ुशी की बात यह है कि इस शाला का उद्देश्य धन कमाना नहीं है बल्कि विद्यादान करना है. मध्यवर्ग की छात्राओं के लिए यह शाला किसी वरदान से कम नहीं है.
शाला में अनुभवी शिक्षकों का समूह है जो छात्राओं को आधुनिक शिक्षा, व्यक्तित्व विकास और खेल की प्रतिभा बढ़ाने में सराहनीय सहयोग कर रहा है. पढ़ाई का स्तर दिन-ओ-दिन सुधर रहा है इस कारण शहर में पब्लिक स्कूलों की आयी बाढ़ का भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा. यहाँ की लडकियां कबड्डी, हाकी और खो-खो में राज्य स्तर का प्रदर्शन कर रही हैं.
छात्राओं से बात करने से यह तथ्य उभरकर आया है कि वे शाला में शिक्षा ले रही हैं लेकिन दिशाहीन हैं और अपने भविष्य को लेकर भ्रम की शिकार हैं. संभव है कि वे अपने माता-पिता की राय पर अधिक निर्भर होने के कारण अपनी स्वतंत्र राय बनने में असमर्थ हैं. यह ज़रूर है कि कुछ लड़कियां अपने सुरक्षित भविष्य के लिए अपने पैरों में खड़ी होना चाहती हैं जो नारी सशक्तिकरण के लिए अनुकरणीय उदाहरण बन सकता है. इस शाला की एक और विशेषता है कि यहाँ पढ़ाई का माध्यम हिंदी है और अंग्रेजी तथा संस्कृत को भी सहयोगी भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है.''
विद्योत्तमा ने अपने पत्रकारिता जीवन की पहली रपट संपादक को दी. रपट के साथ वहां हुई बातचीत के नोट्स भी नत्थी कर दिये. संपादक ने उसे पढ़ा और प्रबंध संपादक के पास भेज दिया. दस मिनट बाद संदेशवाहक ने विद्योत्तमा से कहा, 'बड़े साहब बुला रहे हैं.'
वह तनिक घबराई सी उनके चैंबर में गयी.
'यह रपट तुमने तैयार की है?' बड़े साहब ने पूछा.
'जी.'
'किसी से मदद ली थी?'
'जी नहीं.'
'तुम पहले किसी अखबार में काम कर चुकी हो क्या?'
'नहीं.'
'ठीक है. तुमने अपना पहला टास्क अच्छा किया है. स्कूल के कुछ फोटोग्राफ लिये क्या?'
'सर, मेरे पास कैमरा नहीं है.'
'कोई बात नहीं, अपने कैमरामेन से बात कर लो और कल फिर से स्कोल जाओ. वहां की बिल्डिंग, क्लासरूम, खेल का मैदान और टायलेट का फोटो लेकर आओ. एक बात और, रपट के साथ लड़कियों और टीचर से हुई बातचीत का एक-एक टुकड़ा बॉक्स में जाएगा, मैं एडिटर डेस्क से बात कर लेता हूँ.'
'जी, धन्यवाद सर.' विद्योत्तमा ने कहा. उसकी सांस में सांस आयी. वह खुश भी थी क्योंकि उसे अपनी ही स्कूल की रपट बनाने का अवसर मिला और ऐसा लगता है कि रपट सर को पसंद आ गयी, पूछ रहे थे न, 'किसी अखबार में काम कर चुकी हो क्या?'
*****
दादी से मिलने उनकी सहेली घर में आयी हुई है. दोनों स्कूल में साथ पढ़ी हैं, दादी जबलपुर में ही ब्याह गयी और उनकी सहेली दमोह जिले के हटा में. दोनों बहुत दिनों बाद मिली हैं, कमरे बैठकर खुसुरपुसुर बतिया रही हैं. कभी-कभी हंसने की आवाज़ आती है. अचानक एक सुरीला स्वर उठा, दादी की सहेली का था. उत्तमा चुपचाप कमरे के बाहर खड़े होकर सुनने लगी.
'तारो लगाय कुंजी लै गये, बलम बंबई को चले गये
न कछु दे गये, न कछु ले गये, बलम बंबई को चले गये.
छप्पन भोग थे मैंने बनाया, बड़े जतन से थाल सजाया
बिना कछु खाये खिसक गये, बलम बंबई को चले गये.
पान का बीड़ा मैंने बनाया, केसर वाला दूध मंगाया
बिना कुछ लिये निकस गये, बलम बंबई को चले गये.
बड़े जतन से सेज बिछाया, सोलह सिंगार कर रूप सजाया
बिना कछु देखे निकल गये, बलम बंबई को चले गये.
नदिया किनारे बैठी पियासी, बिन सजना के हुई उदासी
कैसे बलम से हम फंस गये, बलम बंबई को चले गये.
तारो लगाय कुंजी लै गये, बलम बंबई को चले गये
न कछु दे गये, न कछु ले गये, बलम बंबई को चले गये.'
विद्योत्तमा ने खुश होकर ताली बजा दी. कमरे के अन्दर से दादी की आवाज़ आयी, 'कौन है वहां?'
* * * * * * * * * *
सितम्बर माह चल रहा है. पसीना चिपचिपा रहा है. गर्मी में ठंडक घुलने वाली है लेकिन अभी पंद्रह दिन की देर है. प्रतीक्षा है, दुर्गा जी की प्रतिमा विराजमान होने की, तब शीतल वायु बहने लगेगी. दुर्गा की स्थापना के लिये युवा टोलियों की बैठकें चल रही हैं, चन्दा वसूली के लिए जत्थे निकल रहे है. सजावट, बिजली और ध्वनि-विस्तारण वालों के साथ योजना को अंतिम रूप दिया जा रहा है, मोलभाव भी चल रहा है. सभी पंडाल घूँघट काढ़े छुपे-छुपे साज-सज्जा में लगे हैं और दूसरे पंडाल वाले आयोजकों ने अपने जासूस पूरे शहर में फैला दिये हैं, 'जाओ, घूँघट की आड़ में वहां क्या चल रहा है, घुसकर पता करो और पूरा समाचार लाओ.'
इधर जबलपुर के हनुमानताल में कौवे और चील इस पार से उस पार बेमतलब उड़ रहे हैं. लाउडस्पीकर में फ़िल्मी गाने बज रहे हैं. बीच-बीच में मस्जिद से अज़ान की आवाज भी उभरने लगती है. कोई भजन लगा देता है तो कोई उसके जवाब में कव्वाली. हनुमानताल के निवासी इन आवाजों के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि जैसे उन्हें कुछ सुनाई न पड़ता हो.
विद्याशंकर के घर में आज दिन का भोजन तैयार हो रहा है. रज्जो के देवर प्रभुशंकर आये हुए हैं. सतना में रहते हैं, दो बच्चे हैं, तहसीलदार हैं, खुद का पक्का मकान है. सतना से कुछ दूर पर स्थित नागौद में साढ़े आठ एकड़ कृषि योग्य जमीन है, एक कृषक को अधिया में दिये हुए हैं.
एक बजे विद्याशंकर दूकान से घर आये, दोनों ने साथ बैठकर भोजन किया. विद्याशंकर खाने के बाद दूकान वापस चले गए. रज्जो ने अपनी सास को थाली परोसकर दी फिर बच्चों के लिए सब सामान ढंककर रख दिया ताकि वे स्कूल से लौटने के बाद खुद निकालकर खा लें. उसके बाद अपनी थाली लगाकर खाने बैठी. रज्जो की सास और देवर में धीरे-धीरे बात चल रही है, रज्जो उनकी बात सुनने की कोशिश कर रही है, कुछ सुनाई पड़ रहा है, कुछ नहीं.
'बहू को नहीं लाये. ले आते तो मिल लेते.' रत्ना ने कहा.
'घर छोड़ते नहीं बनता अम्मा. वहां चोरी-डकैती की वारदात बहुत होती है.' प्रभुशंकर ने बताया.
'तो क्या तहसीलदार को भी नहीं छोड़ते?'
'उनका गणित वे जानें, हमें तो हर समय डर बना रहता है.'
'क्या तुम्हारा रुतबा नहीं है वहां?'
'तहसीलदार का क्या रुतबा? सुबह से रात तक बड़े साहबों की सेवा में सिर झुकाए खड़े रहो, उनकी और मेमसाहब की फरमाइश पूरी करो, यही हमारा काम है.'
'तुम नहीं रहते तो बहू घर सम्हाल लेती है?'
'वाह, पूरे पावर में रहती है. तहसीलदारनी बहुत पावरफुल पोस्ट है.'
'और सुनाओ.'
'अम्मा हम ये कह रहे थे कि हम दोनों भाइयों का बंटवारा अपने सामने कर जाती तो अच्छा था.' प्रभुशंकर ने धीरे से कहा.
'बंटवारा? तुमको बंटवारा चाहिए?' अम्मा बोली.
'न, मुझे नहीं चाहिए लेकिन हो जाता तो अच्छा रहता.'
'क्यों, क्या बात है?'
'देखो अम्मा, मेरे और विद्या भैया के बीच कोई बात नहीं है. हम सगे भाई हैं, आपके बेटे हैं. जो उनका है, वह मेरा है और जो मेरा है, वह उनका है लेकिन दोनों के बच्चे अलग-अलग कोख से आए हैं. उनमें हम भाइयों जैसा प्रेम कहाँ रहेगा? कल के दिन ये बच्चे आपस में लड़ें-झगड़ें या कोर्ट-कचहरी जाएं तो लोग क्या कहेंगे? इसलिए सब बातें अभी से साफ़ हो जाएं तो क्या हर्ज़ है?'
'हर्ज़ तो कुछ नहीं है लेकिन इस घर के अलावा और क्या है जिसका बंटवारा किया जाए? फिर, विद्या का परिवार और मैं यहाँ रहा रहे हैं!'
'मैंने कब कहा कि ईंटा मंगवाकर आज ही घर के बीच दीवार खिंचवा दो? आप और भैया आराम से यहाँ रहें, कोई बात नहीं. मेरा कहना यह था कि जो बात लिखा-पढ़ी में आ जाये, वह ठीक है.'
'प्रभु, तेरे को क्या कमी है रे?'
'अम्मा, कोई कमी नहीं है. साक्षात् लक्ष्मी घर में विराजमान है, ऊपर से आपका आशीर्वाद भी है.'
'फिर, ऐसी बात क्यों करता है? तेरे बाबूजी के गुजरने के बाद विद्या खुद नहीं पढ़ा लेकिन कितनी मुसीबत उठाकर तुझे पढ़ाया, तेरी नौकरी लगवाने के लिये घूस दी. सब भूल गया तू?'
'राम-राम कैसी बात करती हो अम्मा, मैं विद्या भैया का जीवन भर ऋणी रहूँगा. मैं चाहूं तो भी उस क़र्ज़ को अपने माथे से नहीं उतार सकता. वे मेरे लिए राम हैं और मैं उनका लक्ष्मण.'
'फिर ये घर तुझे विद्या के लिए छोड़ देना चाहिए. चार बच्चे हैं उसके, कहाँ जाएंगे? मैं तुझे इस घर में हिस्सा नहीं दे सकती.'
'अम्मा, एक बात कहूं? बुरा मत मानना. आपके देने या न देने से कुछ नहीं होगा. यह घर बाबू जी का नहीं, दादा जी का बनवाया हुआ है. कानून के हिसाब से बच्चों का जन्म लेते ही इस पर अधिकार हो गया. आपको इसीलिए सलाह दे रहा हूँ कि अपने हाथ से दे दोगी तो बच्चे आपका नाम लेंगे और कहेंगे, "हमारी दादी ने दिया है' नहीं दोगी तो कोई खास बात नहीं है.'
'आने दो विद्या को, उससे बात करती हूँ.'
'बात कर लो आप, समझ लो और अपना फैसला मुझे बता दो. मेरी बात को 'अदरवाइज' मत लेना अम्मा. मैं भविष्य के लिए सब व्यवस्था अभी से बनाना कहता हूँ इसलिए आपसे कहा.'
प्रभुशंकर की अपनी बात कहकर चुप हो गये. रत्ना के दिमाग में खलबली मच गयी. जैसे अचानक कुछ वैसा सामने आ गया जिसकी कल्पना न थी. वे अपना माथा पकड़कर कुछ सोच रही थी तब ही रज्जो उनके पास आयी, उनके बालों में हाथ फेरा और कहा- 'अम्मा, काहे को चिन्तित होती हो? देवर जी का आधा हिस्सा बनता तो है, दे दीजिए.'
'बात तुम्हारी ठीक है लेकिन....'
'लेकिन क्या अम्मा?'
'तुम उसकी पूरी बात सुनी नहीं हो. मुझे उसकी बात समझ में आ गयी है. असल में, उसकी नीयत खराब हो गयी है. आज कागज़ पर लिखवाएगा, कल यहाँ मजदूर लाकर खड़ा कर देगा और बोलेगा कि दीवार खींचना है. रज्जो, छोटा सा घर है अपना, बीच में दीवार खड़ी हो जाएगी तो हमारा निस्तार कैसे होगा?'
'सब बन जाएगा अम्मा. हम चला लेंगे.'
'नहीं, कमजोर बनने से काम नहीं बनेगा. सोचने दे मुझे.' रत्ना बोली.
रात को ब्यारी के समय दोनों भाई साथ खाने के लिए बैठे. रज्जो ने दोनों को भोजन परोसा. सब चुप थे. रत्ना ने बात शुरू की, 'प्रभु, तुमने जो बात हमसे दुपहरिया में की, वो हमने विद्या और रज्जो को बताई. ये दोनों मान रहे हैं कि इस घर में तुम्हारे बच्चों का भी बराबर का हिस्सा है, उनको मिलना चाहिए.'
'ये तो अच्छी बात है, कल मैं स्टाम्प ले आता हूँ, सबके दस्तखत हो जाएगे.' प्रभुशंकर प्रसन्न होकर बोले.
'हाँ, ले आओ. तुम तहसीलदार हो, कानून जानते हो, सब बात विस्तार से लिखवा लेना. मेरी तरफ से एक बात जोड़ लेना कि जब तक मैं ज़िंदा हूँ, घर में बंटवारे की दीवार नहीं खिंचेगी.'
'परन्तु अम्मा, अगर हमारा ट्रांसफर जबलपुर हो गया तो हम कहाँ रहेंगे? फिर तो बनवाना पड़ेगा.'
'जबलपुर आओगे तो सब साथ में रहेंगे, अलग क्यों रहोगे?'
'साथ रहने में किच-किच हो सकती है. क्यों झगड़े की स्थिति लाना?'
'तुम्हारी बात भी ठीक है. कोई बता रहा था कि साहब लोगों को सरकार बँगला देती है, तुमको नहीं मिलेगा क्या? तुम साहब नहीं हो?'
'बंगला मिलता है लेकिन अपना घर, अपना घर होता है.'
'चाहे जो हो, मेरे जीते जी इस घर के टुकड़े नहीं होंगे. अभी स्वस्थ हूँ, पंद्रह-बीस साल तो जिऊँगी, हाँ, यमलोक में यमराज मेरा रास्ता देख रहा हो तो अलग बात है. तुम देख लो, बहू से फोन करके समझ लो.'
'बहू से समझने की बात नहीं है, मैं उससे पूछ कर काम नहीं करता, मेरे पास भी दिमाग है.'
'तुम्हारी बात ठीक है पर सलाह कर लेने में क्या हर्ज़ है?'
'मैं आपकी शर्त मान लेता हूँ कि आपके रहते-रहते घर के दो टुकड़े नहीं होंगे पर इस बात को स्टाम्प में लिखने की क्या ज़रुरत है?'
'है, अगर नहीं लिखोगे तो न मैं दस्तख़त करूंगी और न ही विद्या करेगा.'
'आपको मेरे ऊपर भरोसा नहीं है?'
'जब तुमको मेरी बात का भरोसा नहीं है, स्टाम्प में लिखापढ़ी कर रहे हो तो सब बात लिखित होनी चाहिए.'
'अम्मा, ऐसा तो नहीं बनेगा.'
'तो फिर, जैसा है, वैसा रहेगा. जब तुम दोनों के बच्चे बड़े हो जाएंगे तो आपस में बैठकर तय कर लेंगे या लड़ लेंगे, तुम क्यों फ़िक्र करते हो?' रत्ना ने अपना फैसला सुनाया.
प्रभुशंकर का मुंह लटक गया. कुछ देर तक वह सोचने की मुद्रा में बैठा रहा फिर बोला, 'अम्मा, मैं निकलता हूँ, रात को सतना पहुंचना है, कल दिन में ड्यूटी करनी है.'
'ठीक है.' रत्ना ने कहा.
*****
अविभाजित परिवार ऊपर से सुगठित दिखाई पड़ते हैं लेकिन भीतर गहरी दरारें होती हैं. समय आने पर उभरकर बाहर आती हैं लेकिन झिझक-झिझक कर. चाहे जो भी रिश्ता हो, उसकी जांच होती रहती है. हर रिश्ते की एक 'डिमांड' होती है जो पूरी करनी पड़ती है, कई बार पूरी नहीं हो पाती, बस, यहीं से विरोध का भाव पनपने लगता है. सर्वाधिक संवेदनशील रिश्ते हैं, अभिभावक-संतान के और पति-पत्नी के. ये दोनों एक-दूसरे से लम्बे समय तक जुड़े हुए रिश्ते होते है, लिहाज़ा मतभेद और मनभेद की संभावना हर समय बनी रहती है.
अभिभावक अपने बच्चे को अपनी सोच के अनुरूप ढालना चाहते हैं जबकि संतान खुद को वर्तमान माहौल के अनुरूप विकसित करना चाहती है. स्वाभाविक है कि टकराव होगा. इस रिश्ते में समय के साथ वर्चस्व का खेल भी शुरू होता है. बच्चा, जो आश्रित था, वह वयस्क हो जाने के बाद आज़ादी चाहता है, उसे आदेश पसंद नहीं आते, अब वह आदेश देना चाहता है. काम आसान तब होता है जब वह व्यक्ति धनोपर्जक बन जाता है और अभिभावक अशक्त हो जाते हैं. इस स्थिति में सत्ता का हस्तांतरण हो या न हो, यह आम तौर पर विवाद का कारण बनता है. जो बात न बढ़ाने के नाम से चुप रह गया, वह सदा के लिए चुप रह जाता है और जो चुप नहीं हुआ, वह और मुखर हो जाता है. उसकी आवाज़ दहाड़ में बदल जाती है और सहसा वह सत्ता के सिंहासन पर आसीन हो जाता है. कुछ परिवारों में ऐसा भी होता है कि दोनों चुप नहीं होते, जी भर कर बहस करते हैं, एक-दूसरे को भला-बुरा कहते हैं, इतिहास के पन्ने खोलते हैं. जब आवाज़ तेज हो जाती है तब पड़ोसी, फिर मित्र, फिर रिश्तेदार, फिर गाँव वाले जान जाते है कि बाहर से मजबूत दिखने वाला परिवार अन्दर से भसक रहा है. कुछ समय बाद उनका दिखावटी एका छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर जाएगा, वे परस्पर पीठ करके बैठ जाएँगे और संभवतः एक-दूसरे की शक्ल देखना भी पसंद नहीं करेंगे.
प्रभुशंकर के जाने के बाद रत्ना, विद्याशंकर और रज्जो बैठकर विचार-विमर्श करने लगे. रत्ना को आश्चर्य हो रहा था कि साधनसम्पन्न होने के बावजूद भी प्रभुशंकर के दिमाग में यह बात क्यों आयी? मुद्दे को मीठी चाशनी में लपेट कर उठाया गया था लेकिन उसकी भीतरी कडुआहट समझ में आ रही थी. वे जान रहे थे कि आज भले ही बात टल गयी लेकिन यह मामला आगे तूल पकड़ेगा, प्रभुशंकर अगली बार किसी नयी हिकमत का इस्तेमाल करेगा. रत्ना बोली, 'मेरे रहते चिंता मत करो. तब तक बच्चे व्यवस्थित हो जाएगे, फिर देखा जाएगा.'
विद्याशंकर और रज्जो की बड़ी बेटी विद्योत्तमा चौबीसवें में लग गयी है. रज्जो को उसके ब्याह की फ़िक्र हो रही है लेकिन ब्याह की बात आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं हो रही है क्योंकि घर में धनाभाव है. रत्ना ने पूछा, 'क्या सोच रहे हो तुम लोग विद्योत्तमा के लिए?'
'अम्मा, उसने 'ला' पास कर लिया है, कहती है, जज बनूंगी.' रज्जो ने जवाब दिया.
'यह तो अच्छा है, जज बन जाएगी तो उसकी इज्जत की ज़िन्दगी रहेगी. शादी भी किसी जज से हो जाएगी.'
'शादी तो बाद की बात है, नौकरी लग जाए तब बात बने.'
'नर्मदा मैया सबका ध्यान रखती हैं, उत्तमा का भी रखेंगी.' रत्ना ने हाथ जोड़ते हुए कहा.
विद्योत्तमा बचपन से ही शांत स्वभाव की रही. परिवार में जो पहले आता है, वह बड़ा कहलाता है इसलिए बड़प्पन उसमें स्वाभाविक रूप से प्रवेश कर जाता है. बड़े होने की कारण उसके अधिकार अधिक होते हैं तो उतने कर्तव्य भी. विद्योत्तमा भलीभांति समझती थी कि बड़े परिवार की जिम्मदारी का बोझ उठा पाने में उसके पिता कमजोर पड़ रहे हैं क्योंकि उनकी दूकानदारी में दम नहीं है. उसकी कानून की पढ़ाई बमुश्किल हो पायी, इधर-उधर से मांगकर किताबें पढ़ी तब काम बना. उससे छोटे तीन भाई-बहन भी हैं, उन्हें भी पढ़ाना है, व्यवस्थित करना है. उसकी कई सहेलियां ब्याह कर ससुराल चली गयी, जब कभी मैके आती हैं तो लक-दक कपड़े पहनती है, गहने दिखाती हैं, फैशनेबल चप्पल पहनती हैं. शरीर गदरा सा जाता है, बातों में चहक आ जाती है और आँखों में चमक के साथ थोड़ा सा परायापन भी. कई बार उनसे मिलकर उत्तमा ललच जाती, सोचती, काश! मेरे घर में भी संसाधन होते, मैं भी दुल्हन बनती, पिया के घर जाती लेकिन यहाँ तो वह संभावना दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही है. वह समझ रही थी कि लड़की बनकर छुई-मुई सी घर में रहेगी तो काम नहीं चलेगा, उसे खुद को मजबूत बनना पड़ेगा. बहुत सोच-विचार कर उसने निर्णय लिया कि वह आजीवन अविवाहित रहकर अपने परिवार को सहयोग करेगी.
मनुष्य अपने जीवन में कई तरह के फैसले लेता है, कुछ करने के, कुछ न करने के. ये फैसले उसके अपने दिमाग की उपज होते हैं लेकिन यह जरूरी नहीं है कि उसके फैसले परिवार को मान्य हों. अपने फैसले पर टिका रहना वैसे ही मुश्किल होता है, लेकिन अगर कोई टिक जाए तो परिवार का दबाव उसे अस्थिर का सकता है या परिस्थितियां वैसा न करने के लिए मजबूर कर सकती हैं. विद्योत्तमा भाग्यशाली थी कि वह परिवार को व्यवस्थित करने में सफल रही लेकिन अविवाहित रहने वाला उसका फैसला ध्वस्त हो गया, उसे विवाह करना पड़ा. खैर, विवाह तो बहुत बाद में हुआ, अभी आप उसकी ज़िन्दगी के संघर्ष की दास्तान पढ़िए.
रात का भोजन हो चुका है. रज्जो और विद्योत्तमा ने मिलकर चौका समेट दिया है. जूठे बर्तन एक टोकनी में भरकर रख दिये गये है ताकि सुबह पानी आने पर उन्हें मांजा जा सके. थोड़ी सी सब्जी बच गयी है लेकिन उसे सुरक्षित रखने का कोई उपाय नहीं है क्योंकि घर में फ्रिज लाने का विचार बहुत समय से चल रहा है लेकिन फ्रिज अब तक नहीं आ पाया. कई बार दूध फट जाता है, दाल महक जाती है, सब्जी ख़राब हो जाती है तब रज्जो को बहुत कोफ़्त होती है लेकिन चुप रहती है क्योंकि वह जानती है कि दूकान की बचत को विद्याशंकर बैंक में सुरक्षित रखते हैं ताकि इस साल सिविक सेंटर में खुद की दूकान खरीद सकें. इस समय बात की शुरुआत विद्योत्तमा ने की, 'दादी, मैं शादी नहीं करूंगी.'
'शादी नहीं करूंगी? क्यों? क्यों नहीं करेगी?' दादी बोली.
'कारण नहीं बता पाऊँगी लेकिन नहीं करूंगी.'
'बताने की ज़रुरत भी नहीं है क्योंकि तेरी शादी का निर्णय तेरे हाथ में नहीं है.'
'तो किसके हाथ में है?'
'हम लोग हैं न?'
'वो तो है दादी लेकिन घर की हालत देख रही हो! पापा और मम्मी हर समय चुप से रहते हैं, जैसे कोई बोझ उनके सिर पर है जिसे वे ज़ाहिर नहीं करते. उनको उदास देखकर मैं भी उदास हो जाती हूँ. मैं सोचती हूँ, मैंने बहुत पढ़ लिया, अब पापा की मदद करूं.'
'क्या मदद करेगी तू?'
'पापा के साथ दूकान में बैठूंगी, दूकानदारी करूंगी और साथ में जज बनने की तैयारी भी.'
'हे भोले शंकर, क्या हो गया इस लड़की की बुद्धि को? अरे, तू लड़की जात, दूकान में बैठेगी? सब क्या कहेंगे?'
'जिसको जो कहना है कहे दादी, मैं चिंता नहीं करती. मैं भाई-बहनों में सबसे बड़ी हूँ, अपनी ज़िम्मेदारी समझती हूँ.'
'देख व्यापार करना आदमियों का काम है, लड़कियों को शोभा नहीं देता. जबलपुर में किसी लड़की को दूकान में बैठते देखा है क्या?'
'अच्छा ये बता दादी, जज बनूंगी तो तुझे मंजूर है?'
'हाँ, जज बनना मंजूर है.'
'तो क्या लड़कियों को नौकरी करना शोभा देता है?'
'हां, क्यों नहीं?'
'तो व्यापार करने में क्या अड़चन है?'
'तेरा तर्क तो सही है लेकिन जज की नौकरी और व्यापार करने में बहुत फर्क है बेटा.'
'तू फ़िक्र मत कर दादी, एक दिन मैं जज बनकर दिखाउंगी, तब बुराई करने वाले भी तुम्हारी तारीफ करेंगे और कहेंगे, 'देखो, रत्ना पंडिताइन की नातिन को देखो, जज बन गयी.'
'और, न बन पाई तो?'
'तो हाईकोर्ट में वकालत करूंगी, पर शादी नहीं करूंगी.' उत्तमा ने घोषणा की.
'तुम लोग यहाँ सिनेमा देख रहे हो क्या, कुछ बोलते क्यों नहीं?' रत्ना ने विद्याशंकर और रज्जो से कहा.
'दादी और पोती की बातचीत सुन रहे हैं चुपचाप. हमारे बोलने से क्या होगा?' रज्जो ने कहा.
'क्यों?'
'फैसला आप दोनों को करना है, हम तो दर्शक दीर्घा में बैठे कर मज़े ले रहे हैं.'
'तुम लोग माँ-बाप नहीं हो क्या?'
'हैं न, लेकिन हम लोगों की चलती कहाँ है?' रज्जो ने मुस्कुराते हुए कहा. रत्ना ने बहू को घूर कर देखा, मन ही मन खुश हुई और बोली, 'मैं चलती हूँ, मुझे नींद आ रही है.'
'सुने दोनों की बात?' रज्जो ने बिस्तर में लेटे-लेटे पूछा.
'सुना.' विद्याशंकर बोले.
'उस समय तुम कुछ बोले नहीं?'
'उत्तमा ठीक सोच रही है.'
'क्या उसके दूकान में बैठने से तुम्हें कोई फायदा होने वाला है?'
'यह तो बाद में पता चलेगा.'
'तुम्हें क्या लगता है?'
'व्यापार की जगह में दस किस्म के लोग आते हैं, कई किस्म की घटनाएं होती हैं. ये अनुभव उसकी ज़िन्दगी में काम आएँगे.'
'फिर जज कैसे बनेगी?'
'आज के माहौल में तो मुश्किल है लेकिन जो होना है, वह होता है.'
'क्या मतलब?'
'प्रतिस्पर्धा कड़ी है, फिर आरक्षण भी एक बाधा है. दो तरीके हैं उसके पास, या तो बहुत बढ़िया स्कोर करे या उसकी तकदीर काम कर जाए.'
'तुमको क्या लगता है?
'भोलेशंकर की कृपा होगी तो काम बन जाएगा.'
'उनकी कृपा के लिए हमें कोई अनुष्ठान या व्रत करना चाहिए?
'अम्मा से पूछो, वो बताएंगी.'
'तुम भी पंडित जटाशंकर के वंशज हो, इतना नहीं जानते?'
'कितने सवाल करती हो तुम? ख़त्म ही नहीं होते.'
'क्या यह महत्वपूर्ण नहीं हैं?'
'फिर एक सवाल.'
'एक तुम हो जिससे कुछ पूछ सकती हूँ, और किससे पूछूं?'
'फिर सवाल.'
'अच्छा बाबा, अब कोई सवाल नहीं पूछूंगी. चलो यह बताओ कि सिनेमा कब दिखलाओगे?'
'क्या ये सवाल नहीं है?' विद्याशंकर ने झल्लाकर पूछा. रज्जो जोर से हंसने लगी, फिर दोनों हंसने लगे, फिर दोनों ने एक-दूसरे को मुक्के जड़े, फिर दोनों गुत्थम-गुत्था हो गए, फिर गहरी नींद में सो गए.
अगली सुबह के नास्ते के बाद विद्याशंकर और विद्योत्तमा दूकान पहुँच गए. उत्तमा का पूरा दिन साफ़-सफाई करने में बीत गया. पुस्तकों पर धूल-ही धूल थी, कुछ तो वर्षों से बिना बिके हुए पड़ी हुई थी. उत्तमा ने ऐसी पुस्तकों को छांटकर आलमारी के सबसे ऊपर वाले रेक में जमा दिया. अक्सर बिकने वाली पुस्तकों को उसके नीचे और रोज बिकने वाली पुस्तकें हाथ के पास रख दिया. दूकान की छत पर लगे जाले हट गए, आलमारियों के कांच चम-चम चमकने लगे. उत्तरा जिस तरह अपने किचन को साफ़-सुथरा और सजा कर रखती है, उसी तरह दूकान को भी व्यवस्थित करने में उसे पूरा दिन लग गया. शाम को घर आकर घर के काम में लग गयी.
विद्याशंकर की दूकान में ग्राहक कम आते थे. धार्मिक पुस्तकों का आकर्षण सामान्य पाठकों में नहीं था, या तो पुरोहित आ जाते थे या कोई जिज्ञासु. स्टेशनरी का सामाँन भी कम बिकता था क्योंकि आसपास कोई स्कूल नहीं था. दूकान जबलपुर की व्यस्त सड़क पर थी इसलिए ग्राहकों की कमी न थी, उसकी ज़रुरत के सामान की कमी थी. रात को भोजन के बाद घर में बैठक जमी.
'क्या हुआ आज विद्योत्तमा ?' दादी का प्रश्न उछला.
'दूकान में बहुत गंदगी थी, आज अच्छी सफाई हो गयी.' विद्योत्तमा ने उत्तर दिया.
'क्यों विद्या? दूकान में साफ़-सफाई नहीं करते?
'करता तो हूँ.' विद्या ने सफाई दी.
'ये क्या बता रही है फिर?'
'कोई खास बात नहीं अम्मा, नया मुल्ला ज्यादा अल्ला-अल्ला करता है.'
'अच्छा, मैंने झूठ कहा?' विद्योत्तमा बोली.
'मैंने कब कहा कि तुमने झूठ बोला. जिस जगह में हम रोज बैठते हैं, वहां की अव्यवस्था दिखाई नहीं पड़ती, ध्यान नहीं जाता.'
'आपकी बात ठीक है पापा लेकिन यह बताइए कि जो ग्राहक दूकान में आता है, उसे दिखाई पड़ता है कि नहीं?'
'हाँ, उसे दिखेगा.'
'वह क्या 'इम्प्रेशन' लेकर जाएगा?'
'तुम्हारी बात सही है.'
'हमें अपनी दूकान में कुछ 'आयटम' बढ़ने होंगे पापा.'
'जैसे?'
'साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाओं को मंगवाकर 'डिस्प्ले' करते हैं, शहर के पाठक उसे देखकर आकर्षित होंगे.'
'ठीक है. मैं कल पता करता हूँ.'
'आपको नहीं, मुझे पता करने दीजिए. बस स्टेंड के पास इसका 'होलसेलर' है, मैं उससे जाकर बात करती हूँ.'
'मंजूर, उससे कमीशन की बात कर लेना और जो पत्रिकाएँ नहीं बिकेगी, उसका क्या होगा, पूछ लेना. कुछ पैसे लेते जाना. पहली बार नगद देना होगा, उसके बाद अपना खाता खुल जाएगा.' विद्याशंकर ने कहा.
अगली शाम विद्याशंकर की दूकान के बाहर एक टेबल पर रोचक पुस्तक और पत्रिका का बाजार सज गया. कुछ पत्रिकाओं को सामने रस्सी में फंसा कर करीने से टांग दिया गया ताकि आते-जाते ग्राहक को दूर से दिखे. पहले दिन चार पत्रिका बिकी.
जबलपुर में रहने वाले लोग जिस चीज से प्यार करते हैं, भरपूर करते हैं, मन लगाकर करते हैं. जैसे, ब्रेड का उदाहरण लीजिए, सबसे पहले शहर में 'पापुलर ब्रेड' लोकप्रिय हुई. हर कोई इसी ब्रांड की ब्रेड खरीदता था. जैसे-जैसे समय बीता, कुछ नए ब्रांड बाजार में अवतरित हुए, वे भी बिकने लगे. आश्चर्य यह है कि ग्राहक दूकानदार से कहता, 'एक पैकेट पापुलर देना', लेकिन वह किसी दूसरी ब्रांड की ब्रेड को ख़ुशी-ख़ुशी ले लेता. वह हर ब्रेड को 'पापुलर' कहता, निर्माता कोई भी हो. ऐसा ही हाल समाचारपत्र 'दैनिक नवभारत' का भी है, अखबार का नाम कुछ भी हो, उसके लिए अख़बार का नाम 'नवभारत' है. इसी दैनिक नवभारत में एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ, 'आवश्यकता है, 'ट्रेनी' संवाददाताओं की.' विद्योत्तमा ने अर्जी भेज दी, साक्षात्कार के लिए बुलावा आ गया.
विद्योत्तमा के लिए यह गंभीर चुनौती थी. पत्रकारिता में पुरुषों का वर्चस्व था, लडकियां कम थी, शायद भाग-दौड़ का संकोच था. विद्योत्तमा ने सोचा, अखबार से जुड़ने में जान-पहचान का दायरा बढेगा, देश-विदेश की ख़बरें रोज के रोज सामने आएंगी, वरिष्ठ पत्रकारों की बात सुनने को मिलेगी. समस्या एक नहीं, दो थी. पहली घरवालों की अनुमति और दूसरी अखबार में नियुक्ति.
'तुम तो गज़ब कर रही हो बिटिया, पहले जजी के लिए हमसे हाँ करवा ली, फिर दूकान जाने के लिए, अब तुमको अखबार में भी नौकरी करना है.' दादी ने कटाक्ष किया.
'दूकान में शाम को ग्राहक रहते हैं, दिन भर वहां बैठे-बैठे बोर हो जाती हूँ. मैं और पापा कितनी गप मारेंगे? अखबार के दफ्तर में दिन भर का उपयोग हो जाएगा, शाम को दूकान आ जाउंगी.' विद्योत्तमा ने समझाया.
'मैं देख रही हूँ कि अपनी बात मनवाने के लिए तू मज़बूत तर्क गढ़ लेती है, कानून की पढ़ाई में क्या बहस करना भी पढ़ाते हैं?'
'नहीं दादी, वह तो हम लड़कियों का जन्मजात गुण है.'
'हम भी लड़की पैदा हुए थे, हमें तो नहीं आता, बहस करना.'
'आपके जमाने में टीवी था क्या? नहीं न? हम नए जमाने की हैं, रोज टीवी के सामने बैठकर दुनिया देखते हैं. अब हम छुई-मुई का पौधा नहीं हैं, दुनिया बदल गयी है दादी.'
'वह तो दिख रहा है.'
'तो फिर जाऊं इंटरव्यू देने?'
'अपनी मम्मी से पूछ.'
'पहले आप सिर हिलाओ, मम्मी का नंबर आपके बाद है.'
'ले, मेरी तरफ से हाँ है.' दादी बोली. विद्योत्तमा दादी के गले से लिपट गयी, 'मेरी प्यारी दादी.'
दादी ने 'हाँ' कर दी तो फिर किसी और से क्या पूछना? विद्योत्तमा ने उस दिन नयी सिली हुई सलवार-कुर्ती पहनी और सीना ताने अखबार के दफ्तर पहुँच गयी.
और लोग भी इंटरव्यू देने आए थे, चौथे नंबर में विद्योत्तमा को बुलाया गया. आफिस में दो लोग बैठे थे, बड़ी चेयर में कुर्ता पहने कोई प्रौढ़ थे और उनके बगल में एक व्यक्ति टाई-शर्ट पहने. प्रौढ़ ने कहा, 'बैठ जाओ.'
'जी.' बैठते साथ विद्योत्तमा ने कहा.
'पत्रकारिता करना चाहती हो?'
'जी नहीं.'
'नहीं, तो यहाँ क्यों आई हो?'
'काम सीखने.'
'समझ में नहीं आया. जब पत्रकारिता करनी नहीं है तो इसे सीखने की क्या ज़रुरत?'
'है.'
'तुम्हारी बात हमारी समझ में नहीं आ रही है.'
'मैं जज बनना चाहती हूँ.'
'ठीक है, बनो लेकिन हम तो उसी को काम सिखाएंगे जो सीखने के बाद में हमारे काम आए.'
'मैं आपके काम आऊंगी न.'
'क्या काम आओगी?'
'पहले सिविल जज बनूंगी, फिर डिस्ट्रिक्ट जज, फिर हाईकोर्ट जज. मानहानि के एक केस में यदि मैंने आपके पक्ष में फैसला दे दिया तो अभी जो मेरे लिए करने वाले हैं उसका हिसाब चुकता हो जाएगा.'
'हम कैसे मान लें?' प्रौढ़ ने पूछा. अब इंटरव्यू ख़त्म हो चुका था, रोचक वार्तालाप चल रहा था.
'फल का पौधा लगाने वाले लोग फल लगने की प्रतीक्षा करते हैं सर.'
'तुम जज क्यों बनना चाहती हो? मान-सम्मान के लिए या पैसे के लिए?'
'पता नहीं. मेरे दिमाग में फिलहाल कोई स्पष्ट चित्र नहीं है. जज की नौकरी में तनख्वाह तो ठीक ही होनी चाहिए, पेट भर जाएगा, जेब भरने की ख्वाहिश नहीं है. जहाँ तक मान-सम्मान का प्रश्न है, कुछ लोग पद के कारण सम्मान पाते हैं, वहीँ पर कुछ अपने काम से पद को सम्मानित करते हैं. मैं किस फ्रेम में फिट होऊँगी, मुझे नहीं मालूम.'
'मान लो, तुम जज नहीं बनी तो?'
'तो वकालत करूंगी.'
'और वकालत नहीं चली तो?'
'आपके अखबार में काम करने आऊंगी.' विद्योत्तमा ने मुस्कुराते हुए कहा. कुर्ताधारी ने टाईधारी को देखा, उनके बीच मौन संभाषण हुआ. टाईधारी ने कहा, 'कल सुबह से आ जाओ, ठीक साढ़े नौ बजे.'
'धन्यवाद सर.' विद्योत्तमा ने कहा.
अगले दिन से विद्योत्तमा अखबारनवीस बन गयी.
अखबार के दफ्तर में पहला दिन अजीब सा लगा. सभी अन्जाने चेहरे, सब अपने काम में मशगूल, किसी को किसी से कोई सरोकार न हो जैसे. बहुत देर तक एक कुर्सी में बैठे-बैठे वह सबके चेहरे झांकती रही, वहां की गतिविधियों को समझने की कोशिश करती रही. थोड़ी देर में बुलावा आया, प्रबंध संपादक ने बुलाया है.
'मैं अन्दर आ सकती हूँ?' विद्योत्तमा ने पूछा.
'आ जाओ, बैठो.'
'आपने बुलाया?'
'हाँ, आज तुम्हारी ड्यूटी यहीं है. एक कोने में कुर्सी जमा लो और चुपचाप बैठी रहो. हमारे पास दिन भर लोग आएँगे, उनसे हो रही वार्तालाप को सुनो और बातचीत के मर्म को समझने की कोशिश करो. '
'जी.' विद्योत्तमा ने कहा और एक कोना पकड़ कर बैठ गयी. इस बीच दो बार चाय मिली और प्रबंध संपादक ने अपना टिफिन भी शेयर किया. शाम को पांच बजे छुट्टी हो गयी, वह अपनी दूकान में आ गयी. पापा ने पूछा, 'आज का दिन कैसा रहा?'
'आसान था क्योंकि बैठे-बैठे केवल 'आब्जर्वेशन' करना था. आज मुझे समझ में आया कि अखबार का काम आसान नहीं है. जिस अखबार को हम दस मिनट में पढ़ लेते हैं, वह दरअसल कोरे कागज़ का गुच्छा है जिसे भरना, बहुत पेचीदा काम है.'
'फिर?'
'पापा, आज बड़े सर के चेंबर में उनके पास बैठी थी, उनकी बातें सुन रही थी, समझने की कोशिश कर रही थी. जब 'फील्ड' का काम मिलेगा, तब असली बात समझ में आएगी. सुनना अलग बात है, उसे क्रियान्वित करना अलग है.'
'फील्ड का काम कब मिलेगा?'
'जब उनकी मर्ज़ी. मैं तैयार हूँ.'
'इतने बड़े शहर में सायकिल से कैसे भागदौड़ करेगी?'
'पापा, अब जब सिर ओखली में दे दिया है तो मूसल से क्या डरना?' उत्तमा ने हंसते हुए कहा और काउंटर पर रखी मैगजीन को व्यवस्थित करने लगी.
'मेरी बिटिया आज बहुत थक गयी है...है न?' रज्जो ने कहा.
'मम्मी, घर में बैठकर कैसे तरक्की होगी?.' उत्तमा ने उत्तर दिया.
'लेकिन तू तो काम फैलाती जा रही है. नौकरी भी करना है, दूकान भी जाना है, जज वाली परीक्षा भी देनी है.'
'और घर का काम भी करना है.'
'हां, पर मैं सोचती हूँ कि तुझे घर के काम से छुट्टी दे दूं.'
'नहीं मम्मी, घर का काम करना नहीं छोडूंगी. आपसे मुझे बहुत कुछ सीखना है. फिर, आप आठ लोगों की रसोई अकेले कैसे संभालेंगी? सुबह की आप संभालो. रात की मैं.'
'रात को हम दोनों मिलकर करेंगे.'
'हाँ, वही.'
'अच्छा, ये तो बता, आज वहां क्या हुआ?'
'पहला दिन था, बहुत अजीब लग रहा था, सब आदमी-आदमी थे वहां पर. मुझे उत्सुक निगाहों से घूर रहे थे.'
'फिर?'
'कुछ दिन लगेगा फिर मैं भी उनकी तरह बन जाऊँगी.'
'तुझे इतनी हिम्मत कहाँ से मिलती है बेटा?'
'अपनी मां से. आप मेरी मां को जानती हो क्या ?' विद्योत्तमा ने अपनी मां से पूछा और दोनों हंस पड़ी.
आज घर में पूरी और आलू की रसीली सब्जी बनने वाली है. रज्जो सब्जी छौंकने लगी, विद्योत्तमा आटा सानने में लगी है.
*****
आज अखबार के दफ्तर में दूसरा दिन. 'सिटी चीफ' ने विद्योत्तमा को बुलाया और कहा, 'किस स्कूल में आपकी पढ़ाई हुई है?'
'हितकारिणी में.'
'ठीक है, आज वहां चले जाओ. दस छात्राओं से मिलो, तीन शिक्षकों से और प्राचार्य से भी. सबसे स्कूल में चल रही पढ़ाई के बारे में बात करो और उसकी एक रिपोर्ट बनाओ.'
'उनसे क्या बात करूंगी?'
'जब छात्राओं से बात करोगी तो अपने-आप संभावित बात के सूत्र हाथ में आ जाएंगे.'
'ठीक है, अभी जाऊं?'
'अभी निकल जाओ. हाँ, किसी को यह मत बताना कि तुम वहां पढ़ी हो. अखबार के प्रतिनिधि के रूप में बात करना है.'
'हो सकता है कि टीचर और प्रिंसिपल मुझे पहचान जाएं, अगर पुरानी होंगी तो?'
'अच्छी बात है, तुम्हारा काम और आसान हो जाएगा.' उन्होंने कहा.
आज पांच साल बाद विद्योत्तमा अपनी स्कूल में आयी. ठिठक कर बाहर खड़ी हो गयी और स्कूल को देखती रह गयी. सात साल तक उसका इस स्कूल से नाता रहा. इसी जगह वह कम उम्र की बच्ची से बढ़कर एक युवती बनी. सहेलियों की याद आ रही है, स्कूल छूटा तो वे सब भी छूट गयी. जो मज़े स्कूल में किये वो कालेज में कहाँ? क्लासरूम में मैडम पढ़ा रही है, पढने में ध्यान किसका? सब एक-दूसरे को कनखियों से देख रही हैं, गाल फुला रही हैं, अँखियाँ फैला रही हैं और क्लास ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही हैं. बिना आवाज़ की ही-ही, खी-खी भी चल रही है. मृदुला रेखाचित्र बनाने में एक्सपर्ट थी, दास मैडम का कार्टून बनाया उसने. मैडम के जाने के बाद पूरी क्लास में 'सर्कुलेट' हो गया, ठहाके लगने लगे. 'मुझे दिखा-मुझे दिखा' के चक्कर में कार्टून की चिंदी बन गयी लेकिन 'फिकर नाट', मृदुला फिर नया कार्टून बना देगी, किसी नए ढंग का.
प्रतिमा से खूब पटी, साथ में फुलकी खाते, कुल्फी खाते और जेब में अधिक पैसे होते तो सराफा में जाकर लस्सी पीते. हाँ, सड़क में खड़े होकर लस्सी पीने में डर लगता था, किसी जान-पहचान वाले ने देख लिया और घर में खबर पहुँच गयी तो निश्चय ही लंकाकाण्ड हो जाएगा लेकिन आप तो जानते हैं, 'नो रिस्क, नो गेन.'
एक लड़का था, क्या मालूम क्या नाम था लेकिन रोज मेरे स्कूल आते-जाते हाज़िरी लगाता था. प्रतिमा चिढ़ाती थी मुझे, कहती थी, 'देख तेरा आशिक है, रोज ड्यूटी बजाता है, कभी तो उसे देखकर मुस्कुरा दिया कर' लेकिन मैंने उसे कभी भाव नहीं दिया. लड़कों का क्या है, जरा सी उंगली पकड़ाओ, बांह थामने लगते है. इश्क के चक्कर में पड़े तो पढ़ाई गयी और सुना है कि रातों की नींद भी चली जाती है. न बाबा, दूर रहो, वही अच्छा है.
सामने खेल का मैदान पसरा पड़ा है. हम इसमें खेलते थे, हाकी, फ़ुटबाल और कबड्डी. कबड्डी भी कितना गज़ब का खेल है, हाथी जैसी ताकत चाहिए, चीते जैसी फुर्ती चाहिए, लोमड़ी जैसी अक्ल चाहिए और चीटियों जैसा तालमेल, 'चल कबड्डी...कबड्डी...कबड्डी, चल कबड्डी आल पाल, मेरी चोटी लाल लाल...लाल लाल'. क्या मज़ा था, कितनी बेफिक्री थी? जाने कहाँ गए वो दिन!
स्कूल में पढ़ाई का समय चल रहा है. मैदान वीरान है, स्टाफ रूम में सन्नाटा है, लडकियां क्लास में बैठकर ज्ञान का घोल पी रही हैं. लगता है प्रिंसिपल कमरे है क्योंकि चौकीदार बाहर अटेंशन खड़ा है लेकिन मुझे उनसे आखिर में मिलना है, अभी क्या करूँ? सामने लायब्रेरी दिख रही है, शायद वहां कोई हो.
वहां लायब्रेरियन कुर्सी-टेबल जमाए बैठी-बैठी ऊँघ रही थी. उत्तमा को देखकर उसका चेहरा प्रश्नवाचक हो गया, 'क्या काम है आपको?'
'मैं नवभारत की रिपोर्टर हूँ, आपसे बात करना चाहती हूँ.'
'हाँ.'
'आप यहाँ कब से हैं?'
'पांच साल हो गए.'
'आपकी लायब्रेरी में रोजाना कितनी किताबें इश्यु होती है?'
'कभी-कभार कोई आ जाता है.'
'यहाँ पर बैठकर पढ़ने के लिए?'
'दो-चार लड़कियों हैं जो आती हैं.'
'ऐसी हालत क्यों है?'
'कोई पढ़ना नहीं चाहता शायद.'
'आप उन्हें उत्साहित करने के लिए क्या प्रयास करती हैं?'
'मैं यहाँ लायब्रेरी खोल कर बैठी रहती हूँ. और क्या करूं?'
'क्या कभी आप क्लासरूम में जाकर लड़कियों से पूछा कि वे लायब्रेरी का उपयोग क्यों नहीं करती?'
'क्या यह मेरा काम है?'
'आप यदि छात्राओं को अपना समझती हैं तो आपका काम है, वर्ना आपकी ड्यूटी तो किताबों की चौकीदार जैसी है.'
'मैंने इस ढंग से कभी सोचा ही नहीं.'
'तो अब सोचिये और देखिए कि कैसे आपकी लायब्रेरी में चहल-पहल बढ़े.'
'मैं कल से हर क्लास में जाकर लायब्रेरी से होने वाले फायदे के बारे में बताऊँगी.'
'कल क्यों? आज क्यों नहीं?'
'बॉस से पूछना पड़ेगा न?'
'यदि बॉस ने मना कर दिया तो?'
'तो फिर किताबों की चौकीदारी करूंगी, जो मैं कर रही हूँ.' उसने हंसते हुए कहा.
इतने में अल्प-अवकाश की घंटी बजी, लडकियां दौड़ती हुई क्लास के बाहर निकली. स्कूल के बाहर गरम मुंगोड़ी के ठेले के आसपास जमा हो गयी और हल्ला मच गया, 'पहले मेरे को दे दो भैया, पहले मेरे को'. कुछ लड़कियां बिही वाली के पास चली गयी और बिही छांटने लगी. कुछ मैदान में लगे नीम के वृक्ष के नीचे छोटे-छोटे समूह में खड़ी बतिया रही थी. विद्योत्तमा उसी ओर लपकी.
'तुम लोगों की बातचीत में मैं भी शामिल हो जाऊं?' विद्योत्तमा ने पूछा.
'जी, लेकिन आपको हम नहीं पहचानते.' एक ने कहा.
'मैं विद्योत्तमा हूँ, अखबार की रिपोर्टर.'
'हाँ, अपन बात कर सकते हैं लेकिन अखबार में हमारा नाम नहीं आना चाहिए.'
'नाम क्यों नहीं आना चाहिए.'
'फिर हमको बात करने में डर लगने लगता है.'
'मैं अगर वादा करूं कि किसी का नाम नहीं आएगा, तब?'
'तब तो खुलकर बात होगी.'
'यह बताओ, स्कूल में पढाई कैसी चल रही है?'
'ठीक-ठाक.'
'संतुष्ट नहीं लगती तुम.'
'दरअसल हमें यह नहीं मालूम है कि जो पढ़ाया जा रहा है वह हमारे क्या काम आएगा?'
'क्यों नहीं आएगा? यह तुम्हें आत्मनिर्भर बनाएगा, दुनिया भर की जानकारी देगा.'
'इनमें बहुत सी जानकारियाँ हमारे किसी काम की नहीं हैं.'
'जैसे?'
'साहित्य.'
'साहित्य काम का नहीं है! क्या कह रही हो? देखो, साहित्य अंग्रेजी में हो या हिंदी या अन्य किसी भाषा में, यह हमारे हृदय में संवेदना और कोमलता का भाव विकसित करता है.'
'और इतिहास?'
'इतिहास हमारे अतीत को बताता है और इस बात की तुलना करने का अवसर देता है कि हम पहले कैसे थे, अब क्या हो गए हैं? हमारी पूर्वजों की उपलब्धियों और उनसे हुई गलतियों का लिखित दस्तावेज है इतिहास, यह हमें जानना चाहिए.'
'और संस्कृत?'
'अरे, तुम लोग बहुत चालक हो. मेरे सवालों का जवाब देने के बजाय मुझसे ही सवाल पूछने लगी?'
'नहीं दीदी, हमारे इन सवालों में आपके सवाल का उत्तर है. हमारा कहना यह है कि हमें जो पढ़ाया जाता है, हम बस पढ़ रहे हैं, उसकी उपयोगिता नहीं बताई जाती. जो हम पढ़ते हैं, उसमें समझने लायक कम है, अधिकतर को रटना है और परीक्षा में लिख देना है.'
'इस बात को समझो, सार्थक जीवन के लिए ज्ञान आवश्यक है. अभी तुम लोगों को जो बताया जा रहा है, वह ज्ञान प्राप्त करने की शुरुआत है, प्रथम प्रवेश-द्वार है. इनकी उंगली पकड़कर तुम्हें खुद आगे बढ़ना होगा. सभी विषयों की थोड़ी-थोड़ी जानकारी तुम्हें दी जा रही हैं ताकि उनमें से अपनी रूचि के विषय को आधार बना कर तुम लोग आगे बढ़ सको, यही स्कूली शिक्षा का उद्देश्य है. एक दिन यह ज़रूर तुम्हारे काम आएगा.' इतने में अल्पकालिक छुट्टी समाप्त होने की घंटी बज गयी. लड़कियों ने कहा, 'दीदी, आपसे बात करके बहुत अच्छा लग रहा है. आपसे और भी बातें करनी है लेकिन अभी क्लास में जाना है.'
'तो?'
'दीदी, कल सुबह हम लोग आधे घंटे पहले स्कूल आ जाएंगे, आप भी आ सकती हैं क्या?
'आ जाउंगी, कल मिलते हैं.' विद्योत्तमा ने कहा.
अखबार का दफ्तर. रात को ड्यूटी करने वाले अभी आये नहीं हैं इसलिए वीरानी है. एकाउंट्स और विज्ञापन विभाग में काम चल रहा है. संपादक आ चुके हैं. कोई उनसे मिलने आया है. पानी और चाय पहुँच गयी है. स्कूल से लौटकर विद्योत्तमा स्कूल के अनुभव को कागज़ पर उतारने के लिए कागज़ ढूंढ रही है, तब ही उसको याद आता है कि बाथरूम का काम निपटा लेना चाहिए. एक कामन बाथरूम है, वह वहां अकेली महिला है इसलिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है. पुरुषों के बाथरूम में जाना अटपटा लगता है लेकिन जाना पड़ता है. बार-बार न जाना पड़े इसलिए वह पानी कम पीती थी, इससे वहां जाने की झंझट कम होती है.
वह कोशिश कर रही है कि रपट जल्दी बना ली जाए ताकि जो कुछ दिमाग में सुरक्षित है, वह कागज़ में सुरक्षित हो जाए. आज तो अधूरी बन पाएगी, कल सुबह फिर जाना है, तब फायनल रपट तैयार होगी. उसने लिखना शुरू किया, जो कुछ हुआ, थोड़ी देर में कागज़ पर उतर आया. एक बार उसने उसे फिर से पढ़ा, कुछ शब्द रिपीट हो गये थे, उनको काटा. कुछ वाक्य फ्लो में नहीं थे, उनको फिर से लिखा. एक गहरी सांस ली, अचानक हल्की सी ख़ुशी उसके दिल और दिमाग में तैर गयी. दोनों हाथों की उँगलियों को फंसा कर उसने हाथ ऊपर किये और अंगड़ाई ली तब ही संपादक का बुलावा आ गया.
'क्या हुआ?'
'स्कूल गयी थी सर, कल फिर जाऊँगी.'
'क्यों?'
'बात अधूरी रह गयी.'
'क्यों?'
'टाइमिंग गलत हो गयी थी. मैं जब स्कूल गयी तब पढ़ाई चल रही थी, कई लोगों से मुलाक़ात नहीं हो सकी.'
'फिर?'
'कल स्कूल खुलने के पहले पहुँच जाऊँगी ताकि अधिक लोगों से बात हो सके. यदि आप अनुमति दें तो कल सुबह यहाँ न आकर सीधे वहीँ पहुँच जाऊं.'
'ठीक है.' संपादक ने कहा.
*****
घर में आज गकड़िया बनी है और साथ में बैगन का भरता. बैगन का भरता बनाना जितना आसान है, गकड़िया बनाना उतना कठिन. बहुत मगजमारी है, सेंकने में समय भी बहुत लगता है. यह दादी से लेकर गप्पू तक सबको पसंद है. मम्मी के हाथ में तो जादू है. जो भी बनाती हैं, खाओ और उंगलियाँ चाटते रह जाओ. जबलपुर आकर यहाँ का खाना बनाना सीख लिया है, इलाहाबाद की पाक-विधा में पहले से पारंगत हैं. गृहिणी होने का फायदा मिला है उन्हें, बढ़िया खाना बनाती हैं. अब पराठा को ले लीजिए, कितना स्वादिष्ट और मुलायम बनाती हैं! वही आटा, वही घी, वही पटा-बेलन, वही आंच, हमसे वैसा नहीं बनता. उन्हें ज़रूर नानी से सिखाया होगा. मैं भी सीखना चाहती हूँ. मम्मी बोलती है, 'जब बाल पाक जाएंगे, तब अपने-आप सीख जाओगी.' बताओ, पराठा बनाना सीखने के लिए बुढ़ापे का इंतज़ार करना होगा! अभी सीख लिया तो सीख लिया, अन्यथा जब नौकरी में चली जाऊँगी तो फिर खाना बनाने का समय कहाँ मिलेगा? सोचती हूँ, चाहे जहाँ नौकरी में जाऊं, खुद का बनाया खाना बैठ कर खाऊँ.
थाली लग गयी है. सब घेरा बनाकर बैठ गए. मम्मी सेंक रही है और विद्योत्तमा परोस रही है. दादी को गकड़िया और भरता बहुत पसंद है लेकिन दांत झर गए हैं इसलिए गकड़िया चबाई नहीं जाती इसलिए मिक्सी में पीस कर परोसा गया है. पापा खाए जा रहे हैं, संभवतः उन्हें पसंद आ गयी है. मम्मी की प्रशंसा हो रही है लेकिन मौन भावाभिव्यक्ति के माध्यम से. दादी के सामने वे अपना मुंह नहीं खोलते, दादी के नाराज़ हो जाने का ख़तरा रहता है. खाने के बाद एक घूँट पानी पिया, एक डकार ली और हाथ धोने के लिए उठ खड़े हुए. अंगोछा से हाथ पोछते हुए बोले, 'अब तुम लोग भी खा लो.'
'हाँ खाते हैं.' मम्मी बोली.
'क्यों विद्योत्तमा, कैसा लग रहा है वहां?'
'ठीक है पापा. नई जगह है, नया काम है.'
'जो काम करो मन लगाकर करो.'
'जी पापा.'
'आज इलाहाबाद से तुम्हारे मामा जी का फोन आया था, तुम्हारे लिए उन्होंने एक लड़का देख रखा है.'
'क्यों मेरे पीछे पड़े हो आप लोग? मैंने कह दिया न कि मैं शादी नहीं करूंगी.'
'अच्छा रिश्ता है बेटा, लड़का जज है. तू जज बने या न बने, जज की घरवाली तो बन जाएगी.'
'मतलब आपको अपनी लड़की के ऊपर भरोसा नहीं है? मैं क्या जज नहीं बन सकती?'
'प्रारब्ध को कौन जानता है बिटिया? हम तो चाहते हैं कि बन जाओ लेकिन यदि न बन सकी और इस बीच तुम्हारी उम्र बढ़ गयी तो फिर अच्छा लड़का नहीं मिलने वाला.'
'आप सोचते बहुत हो, शुभ-शुभ सोचा करो. मेरी शादी की चिंता छोड़ो, मैं शादी नहीं करने वाली. मेरा कहा मानो, उस लड़के की बात संध्या के लिए चला दो.'
'पर संध्या तुझसे छोटी है, ऐसे कैसे चला दें?'
'मेरी बात मानो पापा. मेरे चक्कर में कहीं संध्या की उम्र न बढ़ जाए!' विद्योत्तमा ने हंसते हुए कहा.
सुबह का दस बज चुका है. नास्ता करके विद्योत्तमा घर से निकलने वाली है. मम्मी ने आवाज़ लगाई, 'टिफिन तैयार है, भूलना मत.'
*****
दस बजकर बीस मिनट हो गए हैं. स्कूल खाली पड़ा है. झाड़ू लग रही है, धूल उड़ रही है. विद्योत्तमा स्कूल के भीतर चली गयी, फिर सीढ़ियों से ऊपर. उन सभी कक्षाओं को जाकर नज़दीक से देखा जिनमें उसने पढ़ाई की. कितने सारे सहपाठी याद आये, पढ़ाने वाले याद आये, घटनाएं याद आयी.
मालूम? दसवीं कक्षा में वार्षिक बोर्ड परीक्षा चल रही थी. हमारी कुर्सियां दूर-दूर लगायी गयी थी पर इतनी दूर भी नहीं थी कि बगल वाले का पेपर झांक न सकें. परीक्षा निरीक्षक सख्त थी. क्या मजाल कि कोई नक़ल कर ले, बात कर ले या ताक-झांक कर ले. तीन घंटे का पेपर होता है, पर निरीक्षण को थकना चाहिए, इधर-उधर देखना चाहिए लेकिन वह न थके, न कमरे के बाहर देखे, बस पूरे कमरे में घूम-घूम कर खुद भी हलाकान थी और हम भी परेशान थे. अब मान लो, किसी ने किसी से कुछ पूछ कर लिख लिया तो उसका क्या जाता था? पर नहीं, वह अनुशासन के नाम पर दुस्शासन कर रही थी.
मेरे बगल में मेरी एक सहेली बहुत परेशान दिख रही थी, बार-बार माथे का पसीना पोछ रही थी. पेपर जरा कठिन आया था. मैंने इशारे से पूछा, 'क्या हो गया?'
'नहीं बन रहा है, गयी भैंस पानी में.' उसने अंगूठा नचाकर बताया. मैंने अपनी उत्तर-पुस्तिका का एक पन्ना बाहर लटका दिया ताकि वह मेरा लिखा पढ़ सके और उसका काम बन जाए. निरीक्षक को पास आता देख मैं चल रहे घपले को छुपा लेती. आधा घंटा इसी प्रकार चलता रहा. अचानक उसकी नज़र मेरी हरकत पर पड़ गयी और वह आँखें तरेरते हुए मेरे पास आयी और मुझ पर भड़की, 'क्या हो रहा है?'
'पेपर बना रही हूँ मैडम.' मैंने कहा.
'झूठ बोल रही है, बगल वाली को नक़ल करवा रही है?'
''नहीं तो. मैं क्यों करवाऊंगी?'
'मैंने देख लिया है, तुमने अपनी कापी का पन्ना उसकी ओर लटकाया था और वह पढ़ रही थी.'
'धोखे से हो गया होगा मैडम, सॉरी, अब सावधानी रखूंगी.'
'लड़की, मेरे से होशियारी मत करना. दोनों की कापी जब्त कर लूंगी. दोनों फेल हो जाओगी.'
'जी मैडम.' उत्तमा ने कहा. आधे घंटे के उस नक़ल कार्यक्रम से मेरी सहेली का काम बन गया. पेपर खत्म होने के बाद जब हम क्लास से बाहर निकले तो दोनों ने हाथ मिलाया और ठहाका मार कर हँसे. हंसी की आवाज़ सुनकर निरीक्षक कमरे के बाहर आयी और हम दोनों को गुस्से से देखा, उसके नथुने फड़फड़ा रहे थे. हम दोनों दौड़ कर वहां से भाग लिये.
सबसे पहले वे लडकियां आयी जिन्होंने जल्दी आने की बात कही थी. पेड़ की छांह में बैठकर वार्तालाप शुरू हुआ. 'क्या बनने की सोचा है?' विद्योत्तमा ने पूछा.
'कुछ नहीं सोचा.' पहली ने कहा.
'फिर?'
'फिर क्या? घर वाले कह रहे हैं, पढ़ो, तुम्हारे काम आएगा, इसलिए पढ़ रहे हैं.'
'क्या काम आएगा?'
'क्या पता? वैसे बोलते हैं कि अगर ससुराल में कुछ गड़बड़ हो गयी तो अपने पैर पर खड़े होने की ताकत रहेगी.'
'अभी शादी हुई नहीं और गड़बड़ होने का डर घर में आ गया?'
'कुछ भी हो सकता है मैडम. पति-पत्नी में नहीं पटी, सास-बहू में ठन गयी, ननद-भौजाई में तकरार हो गयी.'
'क्या ज़रूरी है कि झगड़ा हो ही?'
'हा हा हा, मेरा तो अभी से झगड़ा चल रहा है, मम्मी से अपनी बिलकुल नहीं जमती.' दूसरी बीच में बोल उठी.
'क्यों?'
'किसी न किसी बात के लिए मेरे पीछे पड़ी रहती हैं. सुबह जागने से लेकर सोने तक मेरे हर काम पर नज़र रखती हैं. 'नहाए म इत्ती देरी लगत है का', 'सज गयीं हो तो इतै आ जाओ, बहुत काम पड़ो है.', 'काम के नाम से छाती फटत है', 'जब देखौ टीवी से चिपकी रहत हो', 'पढ़वै का नाम पे नींद आत है'. हर समय नाक में दम किये रहती हैं.'
'लगता है कि मेरी मम्मी और तुम्हारी मम्मी सगी बहनें हैं. अच्छा ये बताओ कि कोई सपना देखती हो?'
'सपना हम रोज देखते हैं पर जब नींद खुलती है तो टूट जाता है.'
'अरे यार, वो वाला नहीं, अपने भविष्य का?'
'वो हमारा काम नहीं है, मम्मी-पापा जानें, हमें कुछ नहीं मालूम.'
'तुम लोगों में से किसी ने नहीं देखा?'
'मैंने देखा है.' तीसरी बोली.
'क्या देखा?'
'मैं बम्बई जाऊँगी, हीरोइन बनूंगी.' उसने शर्माते हुए कहा.
'और तुम?' उत्तमा ने चौथी लड़की से पूछा.
'मैं आपकी तरह अखबार में काम करूंगी.' उसने कहा.
'मेरी तरह? मैं तो जज बनना चाहती हूँ, ये तो मेरा टाइमपास है.'
'सच दीदी, आप जज बनोगी?'
'हाँ, उसी के लिए कोशिश कर रही हूँ.'
'फिर तो मज़ा आ जाएगा, 'आर्डर...आर्डर...ये अदालत है'. चलो मैं अपना आइडिया बदलती हूँ, मैं भी आपकी तरह जज बनूगी.' चौथी ने खुश होकर कहा.
'तुम चुपचाप बैठी मुस्कुरा रही हो, तुम्हारा क्या इरादा है? विद्योत्तमा ने पांचवीं से पूछा.
'अपन ये सब टेन्शन नहीं पालते. मेट्रिक हो जाए तो पढ़ाई से छुट्टी. पापा कहते हैं, 'अपनी लड़की को किसी बड़े घर में ब्याहूँगा.' इधर शहनाई बजी और उधर मैं कार में बैठकर ससुराल चली. वहां लकदक साड़ियाँ और गहने पहनूंगी, ज़िन्दगी के मज़े लूंगी.' पांचवीं ने अपनी योजना बतायी.
स्टाफरूम में एक टीचर बैठी हुई हैं. पुरानी हैं. विद्योत्तमा ने उन्हें नमस्ते किया, उन्होंने जवाब दिया और बोली, 'तुमको कहीं देखा है!'
'मैं आपकी स्टूडेंट रही हूँ मैडम.' उत्तमा ने कहा.
'तुम्हारा नाम विद्या है न?'
'विद्या नहीं, विद्योत्तमा.'
'क्या कर रही हो आजकल?'
'अखबार में काम कर रही हूँ.'
'वाह. कहो कैसे आना हुआ?'
'आपसे बात करनी है.'
'जरूर करो.'
'आप यहाँ कई वर्षों से पढ़ा रही हैं, लड़कियों में पढ़ाई के प्रति रुझान घटा है या बढ़ा है?'
'बढ़ा है. पहले लडकियां पढ़ाई के प्रति उतनी जागरूक नहीं थी, क्लास में केवल दो-चार होशियार होती थी लेकिन अब आधी क्लास सजग रहती है और उनमें प्रतिस्पर्धा भी है.'
'ऐसा परिवर्तन क्यों आया?'
'पढ़ाई रोजगार से जुड़ गयी और लड़कियां घर से निकल कर नौकरी के लिए पुरुषों के मुकाबले आ खड़ी हुई.'
'क्या लड़कियों का नौकरी करना आपको जरूरी लगता है?'
'मैं भी तो नौकरी कर रही हूँ, है न? पहले के समय में हम लोग अपनी बेसिक जरूरतें पूरी करने के लिए नौकरी करते थे, अब बेसिक के साथ आर्थिक सम्पन्नता और स्वावलंबन भी शामिल हो गया है.'
'पढ़ने-पढ़ाने में क्या अंतर आया है?'
'अब कोर्स बहुत बढ़ गया है. बहुत तैयारी करके आना पड़ता है. पहले लड़कियां चुपचाप बैठती थी, अब ऐसे-ऐसे सवाल पूछती हैं कि कि सिर घूम जाता है. अब हमारा काम कठिन हो गया है.'
'स्टाफ में आपसी तालमेल कैसा है?'
'मत पूछो.'
'क्या हुआ?'
'जब आपसी संवाद नहीं है तो तालमेल कैसा?'
'संवाद क्यों नहीं है?'
'कोई किसी से बात नहीं करता, सब खुद में मगन हैं. हाँ, एक संवाद है लेकिन एकतरफा.'
'मैं नहीं समझी.'
'प्राचार्य हमें आफिस में बुलाकर लेक्चर देती है, हम सुनते हैं लेकिन बोल नहीं सकते. वोई अकेले बोलती है.'
'ऐसा तो आप लोगों के बारे में लडकियां भी सोचती होंगी?'
'हो सकता है. हमारे लेक्चर छात्राएं सुनती रहती हैं, एक तरफ़ा श्रवण है. किसी ने अगर एक-दो सवाल कर दिये तो पक्के तौर पर टीचर उससे चिढ़ जाती हैं.'
प्राचार्य अभी तक आयी नहीं है. कब आएगी, क्या पता? दफ्तर पहुंचना है, रपट बनानी है. रुकूँ या चलूँ? चलती हूँ.
प्रेस आकार विद्योत्तमा aने रपट बनायी.
"संस्कारधानी जबलपुर में लड़कियों की शिक्षा के लिए अनेक वर्षों से प्रयासरत हितकारिणी उच्चतर माध्यमिक शाला का शानदार इतिहास है और अनुकरणीय वर्तमान. २३०० छात्राओं को छठवीं कक्षा से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा प्रदान कर रही है. यहाँ पढ़े विद्यार्थी इस शाला का नाम बड़े आदर से लेते हैं. यहाँ की छात्राओं ने देश-विदेश में नाम कमाया है, ऊंचे पद पर स्थापित हुई हैं और समाज की प्रगति के लिए अपना योगदान दिया है. आज भी उसी उत्साह से शाला में अध्यापन का महत्वपूर्ण कार्य चल रहा है. ख़ुशी की बात यह है कि इस शाला का उद्देश्य धन कमाना नहीं है बल्कि विद्यादान करना है. मध्यवर्ग की छात्राओं के लिए यह शाला किसी वरदान से कम नहीं है.
शाला में अनुभवी शिक्षकों का समूह है जो छात्राओं को आधुनिक शिक्षा, व्यक्तित्व विकास और खेल की प्रतिभा बढ़ाने में सराहनीय सहयोग कर रहा है. पढ़ाई का स्तर दिन-ओ-दिन सुधर रहा है इस कारण शहर में पब्लिक स्कूलों की आयी बाढ़ का भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा. यहाँ की लडकियां कबड्डी, हाकी और खो-खो में राज्य स्तर का प्रदर्शन कर रही हैं.
छात्राओं से बात करने से यह तथ्य उभरकर आया है कि वे शाला में शिक्षा ले रही हैं लेकिन दिशाहीन हैं और अपने भविष्य को लेकर भ्रम की शिकार हैं. संभव है कि वे अपने माता-पिता की राय पर अधिक निर्भर होने के कारण अपनी स्वतंत्र राय बनने में असमर्थ हैं. यह ज़रूर है कि कुछ लड़कियां अपने सुरक्षित भविष्य के लिए अपने पैरों में खड़ी होना चाहती हैं जो नारी सशक्तिकरण के लिए अनुकरणीय उदाहरण बन सकता है. इस शाला की एक और विशेषता है कि यहाँ पढ़ाई का माध्यम हिंदी है और अंग्रेजी तथा संस्कृत को भी सहयोगी भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है.''
विद्योत्तमा ने अपने पत्रकारिता जीवन की पहली रपट संपादक को दी. रपट के साथ वहां हुई बातचीत के नोट्स भी नत्थी कर दिये. संपादक ने उसे पढ़ा और प्रबंध संपादक के पास भेज दिया. दस मिनट बाद संदेशवाहक ने विद्योत्तमा से कहा, 'बड़े साहब बुला रहे हैं.'
वह तनिक घबराई सी उनके चैंबर में गयी.
'यह रपट तुमने तैयार की है?' बड़े साहब ने पूछा.
'जी.'
'किसी से मदद ली थी?'
'जी नहीं.'
'तुम पहले किसी अखबार में काम कर चुकी हो क्या?'
'नहीं.'
'ठीक है. तुमने अपना पहला टास्क अच्छा किया है. स्कूल के कुछ फोटोग्राफ लिये क्या?'
'सर, मेरे पास कैमरा नहीं है.'
'कोई बात नहीं, अपने कैमरामेन से बात कर लो और कल फिर से स्कोल जाओ. वहां की बिल्डिंग, क्लासरूम, खेल का मैदान और टायलेट का फोटो लेकर आओ. एक बात और, रपट के साथ लड़कियों और टीचर से हुई बातचीत का एक-एक टुकड़ा बॉक्स में जाएगा, मैं एडिटर डेस्क से बात कर लेता हूँ.'
'जी, धन्यवाद सर.' विद्योत्तमा ने कहा. उसकी सांस में सांस आयी. वह खुश भी थी क्योंकि उसे अपनी ही स्कूल की रपट बनाने का अवसर मिला और ऐसा लगता है कि रपट सर को पसंद आ गयी, पूछ रहे थे न, 'किसी अखबार में काम कर चुकी हो क्या?'
*****
दादी से मिलने उनकी सहेली घर में आयी हुई है. दोनों स्कूल में साथ पढ़ी हैं, दादी जबलपुर में ही ब्याह गयी और उनकी सहेली दमोह जिले के हटा में. दोनों बहुत दिनों बाद मिली हैं, कमरे बैठकर खुसुरपुसुर बतिया रही हैं. कभी-कभी हंसने की आवाज़ आती है. अचानक एक सुरीला स्वर उठा, दादी की सहेली का था. उत्तमा चुपचाप कमरे के बाहर खड़े होकर सुनने लगी.
'तारो लगाय कुंजी लै गये, बलम बंबई को चले गये
न कछु दे गये, न कछु ले गये, बलम बंबई को चले गये.
छप्पन भोग थे मैंने बनाया, बड़े जतन से थाल सजाया
बिना कछु खाये खिसक गये, बलम बंबई को चले गये.
पान का बीड़ा मैंने बनाया, केसर वाला दूध मंगाया
बिना कुछ लिये निकस गये, बलम बंबई को चले गये.
बड़े जतन से सेज बिछाया, सोलह सिंगार कर रूप सजाया
बिना कछु देखे निकल गये, बलम बंबई को चले गये.
नदिया किनारे बैठी पियासी, बिन सजना के हुई उदासी
कैसे बलम से हम फंस गये, बलम बंबई को चले गये.
तारो लगाय कुंजी लै गये, बलम बंबई को चले गये
न कछु दे गये, न कछु ले गये, बलम बंबई को चले गये.'
विद्योत्तमा ने खुश होकर ताली बजा दी. कमरे के अन्दर से दादी की आवाज़ आयी, 'कौन है वहां?'
* * * * * * * * * *
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