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*दो*

विद्याशंकर के दादा जटाशंकर मिश्र की ख्याति जबलपुर के आसपास दस कोस तक फैली हुई थी. पुरोहिती ठाठ से करते थे, ठाठ मतलब, ऐसा नहीं कि किसी ने बुलाया और धोती की काछ पीछे खोंसते घर से निकल पड़े. यजमान को पहले अपनी वणिक बुद्धि से तौलते थे उसके बाद अपनी पुरोहिती दांव पर लगाते थे. जब तक पाँव पकड़वाकर उससे भरपूर चिरौरी न करवा लें, तब तक वे पिघलते नहीं थे. वैसे, जबलपुर में पंडितों की कोई कमी न थी, एक ढूंढो, हजार मिलते थे लेकिन पंडित जटाशंकर की बात निराली थी, उनसे अनुष्ठान करवाना सम्मान की बात थी. जब वे नये-नये थे तो घरों में सत्यनारायण की कथा बांच आते थे, अनंत-चतुर्दशी और जन्माष्टमी आदि की पूजा भी करवा देते थे लेकिन जब उनके नाम की धूम मची तो वे सत्यनारायण की कथा भूल गये और चिल्हर छाप पूजा-पाठ की पूजा-पोथियों को नर्मदा नदी के जल में विसर्जित करके तिलांजलि दे दी. उन्हें केवल शुभ विवाह, गृहप्रवेश और लक्ष्मी पूजन में पढ़े जाने वाले श्लोक याद रह गये थे.
लोकप्रियता के इस पायदान पर पहुँचने में उनके जीवन का एक चौथाई भाग खप गया था. यहाँ तक पहुँचाने में उन्हें काशी के एक दैदीप्यमान पुरोहित का मार्गदर्शन मिला. इस चेलागिरी को समझने के लिये हमें एक घटना को जानना ज़रूरी है.
हुआ यह, कि उन दिनों रिवाज़ था कि शादियों में लड़के वाले लड़की वालों के यहाँ बारात लेकर जाया करते थे. बारात में बहुत भीड़ इकठ्ठा की जाती थी. घर-परिवार और रिश्तेदारों के अलावा मोहल्ले वाले, गाँव वाले, जान-पहचान वाले, पैर दबाने वाले, तेल लगाकर मालिश करने वाले, हज़ामत बनाने वाले, नाई का नेग करने वाले, कपड़े धोने वाले, खुशामद करने वाले, कविता पढ़ने वाले, शास्त्रार्थ करने वाले और पाणिग्रहण का पूजन-अनुष्ठान करवाने वाले भी बारात में साथ में जाया करते थे. इस बारात में पूजन-अनुष्ठान करवाने वाले पुरोहित की भूमिका में थे पंडित जटाशंकर मिश्र.
बारात काशी पहुंची. धर्मशाला में लड़के वालों के ठहरने की व्यवस्था थी. उस धर्मशाले में केवल दो संडास थे जबकि जबकि बाराती बहत्तर. सुबह के समय लाइन लगी लेकिन किसी 'अति-पीड़ित' ने 'क्यू' तोड़ दिया और उनके बीच कहा-सुनी हो गयी. जब लड़के के पिता को घटना की भनक हुई, वे दौड़े-दौड़े घटना स्थल पर पहुंचे. हाथ जोड़कर उत्तेजित लोगों को शांत किया और बुजुर्गों को खुले में शौच के लिए भेज दिया. इस घटना से लड़के के पिता का अहंकार जागृत हो गया और कलेवा के समय उन्होंने लड़की वालों की कस कर खबर ली. बात बढ़ गयी और जबलपुर तथा काशी की आन-बान तक बीच में आ घुसी. उसके बाद बात-बात में विवाद होने लगा और वैवाहिक कार्यक्रम बेमज़ा होने लगे. माथा सिकोड़े और मूंछ मरोड़ते बरात की अगवानी हुई और रात को मंडप में वर-वधु फेरे के लिए बैठे.
गौरी-गणेश के पूजन के बाद लड़के वाले पंडित जी, अर्थात पंडित जटाशंकर मिश्र ने घोषणा की- 'समस्त कार्य हमारे जबलपुर के रीति-रिवाज के अनुरूप संपन्न होगा.'
'क्या जबलपुर वाले हमसे अधिक प्रमाणिक पूजन करवा सकते हैं? हम काशी के पंडित हैं, सड़क में बैठकर विद्यार्जन नहीं किया है, काशी विश्वविद्यालय से संस्कृत में आचार्य हैं.' काशी के पंडित ने मुस्कुराते हुए ताना कसा.
'हम भी किसी से कम नहीं हैं, आचार्य जी. उपाधि धारण कर लेने से कोई विद्वान नहीं हो जाता.'
'उचित है, कर्मकांड आपके आदेशानुसार ही होगा लेकिन हमें साथ में मन्त्रोच्चारण करने की अनुमति तो है न?' यदि आपकी अनुमति न हो तो हम मौन बैठे.'
'क्यों नहीं. आप भी हमारे साथ मन्त्रोच्चारण में अवश्य सम्मिलित हों.' जबलपुर के पंडित ने कहा. इस प्रकार वैवाहिक-पूजन-कार्य आगे बढ़ा.
पंद्रह मिनट में जटाशंकर को समझ में आ गया कि काशी का पंडित, पाण्डित्य में उनसे बहुत आगे है. उन्नीस-बीस होता तो कोई बात न थी लेकिन अंतर अठारह-इक्कीस का था. कुछ देर बाद जबलपुरी पंडित का स्वर धीमा होता गया और बनारसी पंडित का एकल वर्चस्व स्थापित हो गया. वैवाहिक अनुष्ठान पूर्ण होने के पश्चात वर-वधु मंडप से उठकर चले गये, उनके परिजन भी विदा हो गये तब जटाशंकर उठे और काशी के पंडित के समक्ष दंडवत लेट गए.
'क्षमा करें आचार्य, मुझसे भूल हुई, मैंने आपका अपमान किया.' जटाशंकर बोले.
'क्षमा के लिए न कहें द्विज, आप श्रेष्ठ हैं.' पंडित कमलापति ने कहा.
'मैं अहंकार के वशीभूत हो गया था, अन्धकार में था गुरुवर.'
'बाबा विश्वनाथ आपका कल्याण करें.'
'कल्याण तो मेरा आप करेंगे.'
'कल्याण तो वे ही करते हैं.'
'वे आध्यात्मिक करते हैं, आप सांसारिक कल्याण कर सकते हैं.'
'आदेश करें.'
'आदेश नहीं गुरुवर, निवेदन है कि मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करें.'
'शिष्य? क्या शिष्यत्व है?'
'निश्चय.'
'सर्वप्रथम अहंकार त्यागें तत्पश्चात कुछ काल के लिए मेरे साथ रहें, तब, जो मेरे गुरु महराज ने मुझे सिखाया है, मैं आपको हस्तांतरित कर सकूंगा. पंडित कमलापति ने प्रश्नवाचक मुद्रा बनायी.
'स्वीकार है, मैं इसी क्षण से आपकी शरण में हूँ.' पंडित जटाशंकर ने उत्तर दिया.
जबलपुर से काशी आयी बारात लौट गयी, पंडित जटाशंकर काशी में ही रुक गए. जबलपुर वालों से कह दिया, 'कल रात्रि बाबा विश्वनाथ ने स्वप्न में दर्शन देकर मुझे तीस दिन तक का कल्पवास करने का परमादेश दिया है इसलिए मैं काशी में रहूँगा.'

*****

आप सोचते होंगे कि रज्जो की कहानी के बीच पंडित जटाशंकर कहाँ से आ टपके?
वैसे, यह कहानी रज्जो के इर्द-गिर्द ही है, उसके पांच बच्चों की है लेकिन आगे की घटनाओं को समझने के लिए अतीत की कुछ घटनाएँ मददगार हो सकती हैं इसलिए पंडित जटाशंकर का ज़िक्र आया. उसके उपरांत आप उनके पुत्र कृपाशंकर के बारे में जानेंगे, तदोपरांत कृपाशंकर के पुत्रद्वय विद्याशंकर और प्रभुशंकर का उल्लेख होगा, तब विद्याशंकर की पत्नी रज्जो का किस्सा आगे बढ़ सकेगा.
पंडित कमलापति ने जटाशंकर मिश्र के लिये घर के पास स्थित एक धर्मशाला में आवास की व्यवस्था करवा दी. जटाशंकर सुबह के अपने दैनिक कार्यक्रम से निवृत्त होकर पंडित कमलापति के घर आ जाते, रात का भोजन करके वापस जाते. इस बीच उन दोनों के मध्य सीखने-सिखाने का दौर चलता जो चालीस दिनों तक चला. पंडिताइन ने उन्हें दोनों समय प्रेम से भोजन कराया. एक दिन पंडिताइन ने जटाशंकर से पूछा, 'आपकी कितनी संतान हैं?'
'तीन हैं, गुरुमाता. एक पुत्र और दो पुत्रियाँ.' जटाशंकर ने बताया.
'तीनों अध्ययन कर रहे हैं?'
'हाँ, पुत्र कृपाशंकर संस्कृत विद्यालय जाता है और पुत्रियाँ भाग्यवंती व लाजवंती जबलपुर की हितकारिणी शाला में पढ़ती हैं.'
'उनकी पढ़ने में रूचि है?'
'लड़कियों में पढ़ने की रूचि है लेकिन लड़का 'बे-लाइन' हो रहा है, बहुत सिनेमा देखता है.'
'युवावस्था में सिनेमा का आकर्षण स्वाभाविक है.'
'आपका कथन उचित है माते लेकिन अति सर्वत्र वर्जयेत.'
'आपने समझाया नहीं?'
'राम भजो माते, अपनी ओर से भरपूर प्रयत्न किया. प्रेम से मनाया, समझाया, ठोकाई की लेकिन निष्फल रहा.'
'क्या सिनेमा देखने से बच्चे बिगड़ जाते हैं?'
'धार्मिक और इतिहास वाली कहानियां अब विलुप्त हो गयी. सिनेमा में नचनियां छा गयी हैं, प्रेम-मोहब्बत के गाने बज रहे हैं, सम्पूर्ण वातावरण दूषित हो गया है.'
'वयस्क हो जाएंगे तो सुधर जाएंगे पंडित जी, अभी से इतना भयभीत क्यों है?'
'मुझे तो भय है कि हमारा लड़का कोई-न-कोई तमाशा खड़ा करेगा. एक दिन की बात है, मैं अचानक अपने घर की छत पर गया तो वह ट्रांजिस्टर में फ़िल्मी गाना बजा रहा था. मुझे आते देखा तो झट से बंद कर दिया. राम-राम, पंडित के कुल में उत्पन्न संतान के ऐसे अशोभनीय लक्षण?'
'आप निरर्थक संदेह करते हैं उस पर, आपका पुत्र है तो आप जैसा विद्वान निकलेगा.'
'युग बदल रहा है माते, संतान अब अवज्ञा करने लगी हैं. जबलपुर में मैंने यत्नपूर्वक प्रतिष्ठा अर्जित की है, प्रभु रक्षा करें.' पंडित जटाशंकर ने कहा.
समय बीतता गया और पुरोहिती का व्यवहारिक प्रशिक्षण पूर्ण होने के पश्चात् पंडित जटाशंकर की घर-वापसी का समय निकट आ गया. काशी से विदा होने के पूर्व जटाशंकर ने विवाह में मिली दक्षिणा से बनारसी सिल्क की दो धोती और दो साड़ियाँ खरीदी. एक धोती पंडित कमलापति को भेंट की और एक साड़ी गुरुमाता को. दोनों को प्रणाम किया, अपने लिए एक धोती और अपनी पंडिताइन के लिए एक साड़ी अपनी संदूक में रखकर जटाशंकर जबलपुर वापस आ गए. बहुत दिनों बाद घर लौटे पंडित का पंडिताइन ने स्वागत किया, उनकी रूचि का भोजन बनाया. 
उस रात जबलपुर की ठंडक में हल्की सी उमस भी थी. 
अगली भोर जटाशंकर देव-पूजन के पश्चात कलेवा करने बैठे. पंडिताइन रह रह कर अपने सिर का पल्लू संभाल रही थी और चुप थी. जटाशंकर को पंडिताइन की चुप्पी समझ में नहीं आ रही थी. उन्होंने पूछा, 'क्या बात है, आज मौनव्रत है?'
'मेरा वश चले तो आपसे जीवन भर बात न करूं.' पंडिताइन चिढ़कर बोली.
'क्या हुआ?'
'क्या हुआ? यहाँ से बनारस गये ब्याह करवाने और बिना बताए इतने दिन वहां रुक गए.'
'मेरा भाग्योदय हुआ वहां.'
'कोई दूसरी मिल गयी क्या?'
'नहीं महाभाग, वहां मुझे गुरु मिल गये.'
'मुझे भी बताओ कुछ, कुछ समझ में नहीं आ रहा है.'
'तुम्हें सब समझ आएगा, तनिक समय आने दो. ये बताओ कुछ पैसा जोड़कर रखी हो क्या?'
'क्यों?'
'मुझे दे दो, काम है, कुछ दिनों बाद वापस कर दूंगा.'
'तुम कितने झूठे हो, मुझे मालूम है.'
'भोलेनाथ की सौगंध, इस बार साथ दे दो. मैं भी तर जाऊँगा और तुमको सोने की करधन बनवाकर दूंगा.'
'हाँ, सोने की करधन? कितने वजन की?'
'जितना तुम बोलो.'
'ठीक है, अभी मेरे पास बारह सौ है लेकिन ग्यारह सौ दूँगी, एक सौ अपने पास रखूंगी, न जाने कौन सा खर्चा आ जाये.'
'ठीक है, अभी अपने पास रखो, मुझे जैसी आवश्यकता होगी, मैं मांग लूँगा.'
'काम तो बताओ.'
'बस, देखते जाओ, मेरी रामप्यारी.'
पंडित जटाशंकर ने सबसे पहले अपनी बैठक का कायाकल्प करना आरम्भ किया. बैठक का सामान उठाकर घर के अन्दर रख दिया और मजदूर लगाकर सफाई और पोताई करायी. बढ़ई को बुलाकर उसे अपनी योजना बतायी और एक माह के अन्दर बैठक की दीवार के दोनों तरफ आलमारियां ठुक गयी, यजमानों के बैठने के लिए सागौन की लकड़ी से बनी आरामदेह कुर्सियां लग गयी. गद्दी के बगल में लकड़ी और कांच के संयोग से बनी एक आलमारी में गणेश भगवान की संगमरमर की बड़ी मूर्ति स्थापित हो गयी. गद्दी के पीछे की दीवार पर शंकर भगवान का 'फ्रेम' किया हुआ विशाल चित्र टांग दिया गया. पंडितजी के अकेले बैठने के लिए गद्दी पर मोटा गद्दा, उस पर शुभ्र-श्वेत चादर, पीठ टिकाने के लिए चौकोर तकिया आदि बिछ गया. इतनी व्यवस्था के बाद भी बैठक खाली-खाली सी लग रही थी इसलिए टेलीफोन विभाग में जाकर नए 'कनेक्शन' की अर्जी लगा दी. खाली आलमारियों को प्रभावशाली बनने के लिए वेद-पुराण और गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तकों से ठसाठस भरकर सजा दिया गया.
शुभ मुहूर्त पर पंडित जटाशंकर सिल्क का सिन्दूरी कुर्ता, सफ़ेद धोती पहनकर, अपने माथे पर चन्दन पोतकर, मस्तक के मध्य में अबीर का त्रिनेत्र-तिलक लगाकर आसन में विराजमान हो गए और यजमानों की प्रतीक्षा करने लगे.
जब अच्छे दिन आते हैं तो सब कुछ अनुकूल हो जाता है. काशी के पंडित कमलापति ने पंडित जटाशंकर को पुरोहिती के वे गुण सिखाये थे जो जबलपुर जैसी पुरानी बस्ती के लिये एकदम नवोदित और मनमोहक थे. शनैः शनैः पंडित जटाशंकर की चर्चा आसपास फैलनी लगी, वे 'हाई प्रोफाइल' पुरोहित हो गए. किसी पूजन समारोह में वे जब मन्त्र पढ़ते तो लोग उनकी मधुर वाणी को सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते. उनकी विशेषता यह थी कि पूजन के समय वे केवल मन्त्रों का पाठ करते और यजमान को अपनी उँगलियों से सांकेतिक मार्गदर्शन देते. प्राप्त दक्षिणा को हेय दृष्टि से देखते और निर्विकार भाव से समेटकर अपनी जेब में रख लेते, घर में जाकर गिनते. एक वर्ष के अन्दर उन्होंने पंडिताइन को रुपये वापस करके स्वयं को ऋण मुक्त कर लिया और अगले वर्ष की लक्ष्मी-पूजन की रात्रि में बीस तोले सोने का करधन भेंट करके अपना वचन भी निभाया.

*****

कहते हैं, प्रभु की लीला विचित्र है. जीवन में छांह है तो धूप भी. धूप तो मनुष्य सह लेता है लेकिन जब ताप अत्यधिक होता है, लू चलती है तब त्वचा झुलसने लगती है, बेचैनी बढ़ जाती है. बेचैन करने वाली प्रतिकूल परिस्थितियां हम पर अनायास आ टपकती हैं, स्वाभाविक है, मन की शांति भंग हो जाती है.
घर का कोई सदस्य किसी बीमारी की चपेट में आ जाए तो उसके समुचित उपचार के यत्न करना, सेवा-सुश्रुषा करना और स्वस्थ होने की प्रतीक्षा करना तनिक धैर्य मांगता है. मरीज़ जब स्वस्थ हो जाता है तो प्रसन्नता होती है. वहीँ पर घरेलू परेशानियां गंभीर बीमारियों से भी अधिक समय मांगती हैं, कई बार कोई उपाय नहीं सूझता.
पारिवारिक और सामाजिक नियम हमें बांधकर रखना चाहते हैं और जबकि नयी पीढ़ी उनसे छुटकारा पाकर मुक्त होना चाहती है. समय के साथ सोच में परिवर्तन आता है लेकिन पुरानी मान्यताओं की जकड़न इतनी मजबूत होती है कि उससे बाहर होना बेहद मुश्किल होता है.
पंडिताइन ने जब पंडित जटाशंकर को बताया कि उनका पुत्र कृपाशंकर पड़ोस की एक कन्या के प्रेम में अरझ गया है तो उनके समक्ष अभूतपूर्व संकट आ खड़ा हुआ. जटाशंकर ने क्रोध में पूछा, 'तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ?'
'कल मैंने कृपाशंकर की रफ कापी में यह पत्र देखा जो उस लड़की ने लिखा है.' पंडिताइन डरते हुए बोली.
'पत्र? लाओ दिखाओ मुझे. मुझे पूर्वाभास था कि यह लड़का एक दिन कोई-न-कोई तमाशा खड़ा करेगा.' जटाशंकर ने भड़कते हुए उस पत्र को हाथ में लिया और उसे गौर से पढ़ने लगे.

'प्रिये,
मैं कितनी बार कह चुकी कि मैं तुम्हारी हूँ, और किसी की नहीं. क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं? बस, होली के बाद तुम आ जाओ या होली के दिन भी आ सकते हो, ये घर तुम्हारा है. कोई कुछ कह कर तो देखे. कल मैं दोपहर नहीं मिल सकूंगी क्योंकि घर में कुछ मेहमान खाने के लिए आने वाले हैं. बताओ, तुम भूखे रहोगे और मुझे औरों को बनाकर खिलाना पड़ेगा, कैसी बदकिस्मत हूँ मैं! तुम भी आ जाते तो अच्छा था. तुम मुझे बुलाते हो. तड़पते हो और मुझे भी तड़पाते हो. दो दिन धीरज रख लो, तुम एक बार मेरे यहाँ आ जाओ. मैं सबके सामने तुम्हें अपना हाथ दे दूँगी लेकिन इतना बेकरार मत हो. मैंने कह दिया न, अब किसी से नहीं डरती. तुम जैसा खूबसूरत जीवन साथी हो फिर मुझे क्या कमी है?
तुम्हारे घर का फैसला भी तो सुन लूं. यदि तुम्हें मजबूर किया गया तो फिर बोलो, मेरा साथ तो नहीं छोड़ोगे? तुम समझते हो, मैं धोखा दूँगी? कभी नहीं. प्यार मैंने नहीं बढाया था, अपने आप बढ़ते चला जाता है और यदि सच्ची लगन हो तो प्राप्त भी हो जाता है. फिर तुम साथ दो तो किसी की ताकत नहीं रोक सकती. मुझे किसी की परवाह नहीं है. अपने दिल पर ज़रा काबू रखो. क्या मेरा दिल नहीं होता, तुम्हारे पास आने को लेकिन अभी तो मजबूर हूँ सिर्फ तुम्हारे आने की देरी है. मेरे अंदाज़ में मेरे घर वाले राजी हो जाएँगे. तुम्हें शक है कि मेरे घर वाले इंकार कर देंगे तो भी मैं उनके सामने तुम्हारे साथ चल पडूँगी. फैसले की बात कैसे मालूम होगी जब तक तुम मेरे घर नहीं आओगे?
तुम कहीं भी मिलने को कहते हो, मेरी कोई ऐसी सहेली नहीं, जो साथ दे. सारी दुनिया बेवफा है, बस एक तुम मेहरबान हो. मेरा सब कुछ तुम्हारा है, तुम समझते क्यों नहीं? मुझे तुम्हारे प्यार ने इतनी शक्ति दी है कि बिना खाए जी रही हूँ. तुम बिलकुल निराश न हो, तुम्हें मैंने यकीन दिला दिया, मेरा हाथ तुम्हारे हाथों में जाकर कभी नहीं छूटेगा.
ये हर समय मरने-मरने का नाम मेरे सामने मत लिया करो. मुझे गुस्सा क्यों दिला रहे हो, मैं सच में नींद की १८ गोलियां एक साथ खा लूंगी. मेरा नाम ही दुनिया से मिट जाएगा. दो दिन धीरज रख लो और गुस्सा नहीं होना. तुम्हारी हंसी और गुस्से ने ही मुझे इतना दीवाना बना दिया, मैं क्या बताऊँ! आओगे न? बिना डर के आ सकते हो. तुम घर में खाना नहीं खाते हो तो चक्कर नहीं आएगा? क्या हेल्थ बनेगी? घर में नहीं खाते तो क्या मैं बना कर दूं? तुम खाओगे?
बस, अब बहुत काम पड़ा है घर का. जल्दी में क्या लिख दिया, कोई गलत बात हो तो माफ़ कर देना. तुम्हारी प्यारी तुम्हारे पास आने को कितनी प्यासी है, तुम्हें क्या मालूम?
मैं तुम्हारी हूँ. तुम्हारी हूँ. तुम्हारी हूँ. तुम्हारी हूँ. तुम्हारी हूँ. अब आया यकीन कि नहीं मेरे प्रियतम?'

पंडित जटाशंकर अपना माथा पकड़कर बैठ गए. खिन्न होकर बोले, 'ये पांच बार 'तुम्हारी हूँ, तुम्हारी हूँ' लिखने वाली लड़की कौन है जो हमारी बहू बनना चाह रही है?'
'अपने पड़ोसी गप्पू कसेर की लड़की है.'
'हे प्रभु भोलेनाथ, रक्षा करो. कैसे संकट में पड़ गया मैं? मेरी रक्षा करो. मैं पहले से जानता था कि सिनेमा देख-देख कर हमारा लड़का कोई गुल खिलाएगा. एक दिन छत में मैंने उसे गाना बजाते देखा था तब ही मुझे सावधान हो जाना था. मुझे यह अनुमान नहीं था कि ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर यह मूर्ख लड़का किसी कसेरन बहू को घर लाने की बात सोचेगा?'
'पर ये विवाह कैसे होगा? नीची जाति की बहू आ गयी तो हमारी दोनों बेटियों को कौन ब्राह्मण परिवार अपने घर की बहू बनाएगा?'
'वह तो है. कैसे अपना मुंह दिखाऊंगा मैं समाज को? प्रभु, कोई राह दिखाओ.' पंडित जटाशंकर की आँखों से टप-टप आंसू बहने लगे. कुछ देर में जटाशंकर शांत हुए तो बोले, 'आने दो कृपा को घर में, हड्डी-पसली तोड़कर उसके इश्क का भूत उतारता हूँ.'
'तनिक समझदारी और शांति से काम लो जी. बात अगर बिगड़ी तो और बिगड़ जाएगी. चिट्ठी में पढ़े नहीं क्या? दोनों एक-दूसरे के लिए जहर खाकर मरने को उतारू हैं! अपना एक अकेला लड़का है, कुछ कर लिया तो?'
'तो उसकी आरती उतारूँ? मोहल्ले में प्रसाद बंटवा दूं?'
'कुछ दिन चुप रहो, कोई रास्ता अवश्य निकलेगा. भोलेनाथ अपने भक्तों का ध्यान रखते हैं, वे कुछ करेंगे. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ, तुम कृपा से कुछ न कहना.'
'कुछ न कहना, तुम्हारी इसी छूट ने लड़के को नष्ट किया है, अब फिर कह रही हो, कुछ न कहना.'
'तुम अभी गुस्से में हो. बैठे तुम्हारे लिए नीबू का शरबत बनाती हूँ, पी लो, फिर बाद में देखेंगे.' पंडिताइन बोली.
पंडित जटाशंकर के जिगरी दोस्त थे, अनोखेलाल, जिनकी कोतवाली रोड पर कपड़े की दूकान थी. शाम के समय दोनों की बैठक होती, सप्ताह में छः दिन अनोखे लाल की दूकान में और मंगलवार को पंडित जटाशंकर के घर में. समाज और राजनीति की चर्चा होती, घर-परिवार की बात होती. आज गुरूवार है, बैठक ज़ारी है लेकिन पंडित जटाशंकर चुप-चुप से बैठे हैं. अनोखेलाल ने पूछा, 'आज मुंह में दही जमाये बैठे हो पंडित?'
'क्या बताऊँ? तुमसे मेरा कुछ भी छुपा नहीं है लेकिन बात ऐसी है कि बताने की हिम्मत नहीं हो रही है.' जटाशंकर बोले.
'अरे, हमसे कैसी पर्देदारी? क्या हुआ महाराज?'
'लड़का गलती कर बैठा है, पड़ोस की एक लड़की के चक्कर में फंस गया है.'
'लड़का कितने साल का हो गया है?'
'अठारह का हो गया है.'
'तो ब्याह कर दो उसका, इसमें समस्या क्या है?'
'कसेर की लड़की है, भैया अनोखेलाल.'
'अरे बाप रे!'
'वही तो बात है. मेरी बुद्धि काम नहीं कर रही है.'
'रुको, मुझे सोचने दो.'
'सोचो यार, कुछ सोचो और मुझे इस संकट से उबारो.'
'ठीक है, मंगल को मेरी दूकान बंद रहती है, उस दिन फुर्सत रहती है. तब तक कोई उपाय सोचता हूँ. तुम चिंता न करो. और हाँ, लड़के को कुछ न कहना, मैं घर आकर उससे बात करूंगा.' अनोखेलाल ने पंडित जी को आश्वस्त किया.
अनोखेलाल कुशल व्यापारी थे. उनके यहाँ कपड़ा कम बिकता था, उनकी बातें अधिक बिकती थी. ग्राहक से अपनापन जोड़कर, मीठी-मीठी बातों से लुभाकर अपनी छोटी सी दूकान में वे भरपूर व्यापार किया करते थे. आम तौर पर जबलपुर में बुन्देलखंडी भाषा बोली जाती है लेकिन यहाँ इस बोली के अक्खड़पन में लोच आ गया है, संवाद में व्यंग्य और मुहावरों की बहुतायत होने के बावज़ूद हल्की सी मिठास है. जबलपुर में रहने वालों की तासीर है कि वह समझाएंगे तो प्यार से समझाएंगे और समझा भी लेंगे लेकिन यदि बिफर गये तो कोई कसर नहीं छोड़ते. शारीरिक मार-पीट का काम नहीं, किसी को भी मौखिक अस्त्र से लहूलहान के देने का माद्दा हर जबलपुरिया में होता है. यह जबलपुर की मिट्टी का असर है जो रानी दुर्गावती के काल से अब तक अपना असर बनाए हुए है.
अनोखेलाल चिंता में पड़ गये कि पंडित जटाशंकर की समस्या का क्या समाधान निकला जाए. लड़का न माना तो कैसा होगा? जवानी में प्यार-मोहब्बत का दिमाग पर ऐसा असर हो जाता है कि उचित-अनुचित का बोध समाप्त हो जाता है. ऐसा न हो, दोनों नर्मदा मैया में छलांग लगाकर डूब जाएं. यह विवाह हो नहीं सकता क्योंकि लड़की ब्राह्मण कुल की नहीं है. कहीं लड़का लड़की को लेकर घर से भाग गया तो सारा मामला हाथ से निकल जाएगा, पंडित जी की बड़ी बदनामी हो जाएगी. यह भी नहीं मालूम कि इश्क कितना आगे बढ़ चुका है, कही लड़की हमल से न हो? ये ससुरा सिनेमा सबको बिगाड़ रहा है. हमारे जमाने में भी सिनेमा था लेकिन ऐसा नंगपन न था. राजकपूर अच्छी फिल्म बनाता था, कुछ सन्देश होता था, अब 'बाबी' बना दिया. जिसको देखो, वो गा रहा है, 'हम तुम इक कमरे में बंद हों और चाभी खो जाए...', हो गया बंद कमरा और चाभी भी खो गयी और हमारे ऊपर जिम्मेदारी आ गयी, अनोखेलाल, बिना चाभी के ताला खोलो, क्या मुसीबत है!
अगले दिन अनोखेलाल प्रातः भ्रमण के लिये निकले. सराफे के पास उनके बालसखा बालमुकुन्द मिल गए. दोनों तेज रफ़्तार में चल पड़े. श्याम टाकीज के पास एक टपरियानुमा दूकान में रुके और चाय पीने बैठ गए. अनोखेलाल ने पूछा, 'कितना समय है तुम्हारे रिटायर्मेंट में?'
'अभी बहुत समय है, दस साल बचा है.' बालमुकुन्द बोले.
'बच्चे कितने बड़े हैं?'
'बड़ी लड़की सत्रह साल की है, लड़का चौदह का है.'
'क्या सोचे हो?'
'लड़की बांस की तरह बढ़ रही है, उसी की चिंता है. साल-दो साल में उसका ब्याह करना है.'
'दहेज़ की व्यवस्था किये हो?'
'बिद्युत मंडल में तनख्वाह इतनी कम है कि घर का ख़र्च चल जाता है, वही बहुत है. बच्चों की फीस भी बहुत है, हर महीने साठ रुपया इसी में निकल जाता है, फिर घर-गृहस्थी में मेहमानों का आना-जाना लगा रहता है.'
'एक लड़का मेरी नज़र में है, बढ़िया गोरा-नारा, अपनी बिटिया ब्याहोगे? तुरंत ब्याह करना होगा.'
'किसका लड़का है?'
'वह बाद में बताऊंगा, पहले यह बताओ अपनी बिटिया देखने में कैसी है?'
'चलो, अभी वापसी में घर चलते हैं, स्वयं देख लेना. एक बात बताओ, तुम सच कह रहे हो अनोखेलाल?
'हाँ, दुबे जी, मेरे हाथ में एक रिश्ता है. बिना दान-दहेज़ के आपका काम बन जाएगा.' अनोखेलाल ने बालमुकुन्द को समझाया.
मंगलवार आ पहुंचा. अनोखेलाल घड़ी देखकर साढ़े चार बजे पंडित जटाशंकर के घर पहुँच गये. जटाशंकर उनकी प्रतीक्षा में थे. अनोखेलाल ने पूछा, 'कहाँ है कृपा, बुलाओ उसको.'
'कृपा, देखो अनोखे कक्का आये हैं, तुमको बुला रहे हैं.' पंडित जटाशंकर ने पुकार लगाई.
'कक्काजी प्रणाम.' कृपाशंकर ने झिझकते हुए कहा. उसको यह समझ में नहीं आ रहा था कि कक्का को उससे क्या काम है!
'कृपा बेटे, बहुत दिन से हम गोपाललाल के मंदिर नहीं गए हैं, तुम हमारे साथ चलकर दर्शन करवा दो.'
'अवश्य, चलिए, मैं साथ चलता हूँ.' कृपाशंकर ने खुश होकर कहा. 
मंदिर पास में ही था, प्रभु दर्शन हो गए. उसके बाद अनोखेलाल कृपा से बोले, 'यहीं बरामदे में बैठते हैं, तुमसे कुछ जरुरी बात करनी है.'
'जी.'
'सुना है कि तुम विवाह करना चाहते हो?'
'नहीं तो, आपसे किसने कहा?' 
'हमारे पास चर्चा आयी थी. अब तुम हमसे छुपाओगे तो बताओ तुम्हारा ब्याह कैसे होगा?'
'ऐसी कोई बात नहीं है.'
'इसका मतलब यह हुआ कि पड़ोस में तुम्हारा जो चक्कर चल रहा है, वह खिलवाड़ है?'
'आपको कैसे मालूम हुआ?'
'ये छोड़ो कि कैसे मालूम हुआ, कौन बताया. ये बताओ कि हमारे पास जो खबर है, वह सच्ची है या नहीं?'
'खबर तो सच्ची है.'
'तो कहाँ तक पहुंचे तुम लोग?'
'मतलब?'
'अब पूरा खुल कर पूछेंगे तब बताओगे?'
'आप क्या जानना चाह रहे हैं, मेरे समझ में नहीं आ रहा है.'
'उसके पेट में तुम्हारा बच्चा है क्या?'
'आप कैसी बात कर रहे हैं कक्का जी?'
'क्यों? मुझे यह नहीं पूछना चाहिए था?'
भगवान के 'मंदिर में बैठा हूँ मैं, गोपाललाल जी की सौगंध,  मैंने उसे आज तक छुआ भी नहीं.'
'अरे, मुझे तो मालूम हुआ था कि तुम दोनों के बीच प्यार-मोहब्बत वाली बात है.'
'हाँ, हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते है, वह मुझे प्राणों से भी प्यारी है, वह भी मुझे बहुत चाहती है.'
'तो?'
'कक्का जी, आप मेरी उससे शादी करवा दो, बप्पा आपकी बात अवश्य मानेंगे.'
'पर जैसी बात तुमने अभी बतायी, उस हिसाब से तुमको विवाह की बात नहीं सोचनी चाहिए, उससे राखी बंधवानी चाहिए.'
'आप मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं.'
'मज़ाक नहीं उड़ा रहे हैं. हमारा-तुम्हारा मजाक का रिश्ता है क्या,  जो तुमसे मज़ाक करेंगे.'
'फिर मैं क्या करूँ? मैं उसके बिना जी नहीं पाऊंगा. अब आपका ही सहारा है कक्का जी.'
'मेरा कहा मानोगे फिर?'
'मानूंगा.'
'पक्का?.'
'पक्का.'
'तो फिर इस लड़की से शादी की बात अपने दिमाग से निकाल दो.'
'ये आप क्या कह रहे हैं?' कृपाशंकर की आँखों में आंसू आ गए. उसने अनोखेलाल के चरण पकड़ लिये और कहा, 'जहर दे दो कक्का जी, हम दोनों खा कर मर जाएंगे.'
'उठो, दुखी मत हो. कुछ करते हैं तुम्हारा.' अनोखेलाल ने कहा. कृपा के आंसू रुके तब अनोखेलाल ने अपनी मोटरसायकल की चाभी उसे देते हुए कहा, 'जाओ तुम्हारे घर के बाहर मेरी राजदूत खड़ी है, यहीं ले आओ. अपन दोनों सिनेमा देखने चलते हैं.'
'सिनेमा देखने?'
'हाँ, क्यों मेरे साथ सिनेमा जाने में कोई परेशानी है? मैंने अपने एक दोस्त को टिकट कटाने के लिए पहले से कह दिया था, आज छुट्टी का दिन है, भीड़ होगी.'
'ठीक है, मैं भी आपके साथ चलता हूँ.' कृपाशंकर ने कहा. 
ज्योति टाकीज में उस शाम फर्स्ट शो में बहुत भीड़ थी. उस भीड़ में से अचानक एक हाथ उठा. अनोखेलाल उसी ओर बढ़े. उनके मित्र टिकट लेकर खड़े थे, साथ में एक कन्या थी. अनोखेलाल ने कृपा से उनका परिचय कराया, 'इनसे मिलो, ये मेरे सहपाठी हैं, बालमुकुन्द दुबे, विद्युत विभाग में हैं.' कृपा ने उन्हें हाथ जोड़कर नमस्ते कहा. उसके बाद अनोखेलाल ने बालमुकुन्द से पूछा, 'ये बिटिया कौन है?'
'मेरी बेटी रत्ना है.' बालमुकुन्द ने बताया. 
'अच्छा-अच्छा, पढ़ती हो तुम?'
'बारहवीं में हूँ.' लड़की बोली. 
'चलो, ज़ल्दी करो, लगता है, पिक्चर शुरू हो गयी है.' अनोखेलाल बोले और सब सिनेमा हाल में घुस गए. फिल्म ख़त्म होने के बाद बालमुकुन्द अपनी बेटी के साथ घर लौट गए. 
'चलो, आज 'दिगंबर लाज' में खाना खाएँगे.' अनोखेलाल ने कृपा से कहा.
'जी.'
'पिक्चर कैसी लगी?'
'अच्छी थी.'
'रत्ना कैसी लगी.'
'अच्छी थी.'
'इससे शादी करोगे?'
'कक्का जी, मैं आपसे कितनी बार कहूं कि शादी मैं उससे करूंगा जिससे प्यार करता हूँ.'
'ठीक है, उसी से करना. कौन मना करता है? लेकिन ईमानदारी से बताना कि तेरी प्रेमिका के मुकाबले ये लड़की कैसी है?'
'ये लड़की अधिक खूबसूरत है, लेकिन...'
'मैं तेरे दिल की बात समझता हूँ कि तुमने उससे प्यार किया है, उसे शादी का वचन दिया है.'
'आप सही बोल रहे हैं.' कृपा ने कहा. इतने में दिगंबर लाज आ गया. दोनों कोने की एक टेबल में बैठ गये. खाने का आर्डर दिया. अनोखेलाल ने बातचीत का छोर फिर पकड़ा, 'तुम अपनी प्रेमिका से शादी करना चाहते हो, प्रेमविवाह, है न?'
'हाँ कक्का जी.'
'तुमको यह मालूम है कि प्रेम अलग बात होती है और विवाह अलग?'
'क्यों जिससे प्रेम करते हैं, क्या उससे विवाह करना क्या गलत है?'
'मैंने यह तो नहीं कहा.'
'तो आप मुझे बहका क्यों रहे हो?'
'बात को समझो बच्चू. जिससे प्यार हो उससे विवाह करने में समझदारी नहीं है क्योंकि प्यार में जिस मधुर जीवन की कल्पना की जाती है, वह गृहस्थी की झंझट में जल्दी ही भसक जाती है.'
'सच्चा प्यार होगा, तब भी?'
'हाँ, तब भी. प्यार क्षणिक आवेग है जबकि विवाह लम्बे समय तक चलने वाला साथ होता है इसलिए प्यार किसी से भी हो सकता है लेकिन विवाह किसी से भी नहीं किया जाता, बहुत सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए.'
'आपकी बात मुझे जम रही है लेकिन सच में, मैं उसके बिना नहीं जी सकता.'
'मैं तुम्हारा दुःख समझता हूँ. एक बात बताओ, 'मेरा नाम जोकर' देखे थे?'
'हां, देखा था.'
'स्कूल की टीचर झाड़ी के पीछे खड़ी होकर कपड़े बदलती है, वह दृश्य तुमको याद है?'
'हाँ, याद है.'
'और वह दृश्य याद है जब रूसी हीरोइन अपने देश वापस जाने से पहले राजू से मिलने उसके घर जाती है?'
'याद है.'
'वो राजू से क्या कहती है?'
'वो तो याद नहीं.'
'तुम छोकरों में यही खराबी है कि औरत के कपड़े के भीतर झांकते हो, उसके दिमाग के अन्दर नहीं झांकते. मैं याद दिलाता हूँ, उसने राजू से कहा था, "मिलना बिछुड़ना और बिछुड़ना मिलना, यही ज़िन्दगी है'', याद आया?'
'कुछ-कुछ याद आया.'
'उसके जाने के बाद क्या राजू ने अपने जीवन ख़त्म कर लिया? नहीं न? उसने नयी ज़िन्दगी शुरू की. इस जीवन में जो भी हमसे मिलता है वह ट्रेन में सफ़र करने वाले यात्री की तरह है. उसका स्टेशन आएगा, वह तुम्हें छोड़कर उतर जाएगा; तुम्हारा स्टेशन आ जाएगा, तुम उसे छोड़कर उतर जाओगे.' कक्का जी ने उसे जीवन की रीत समझाई. 
कृपाशंकर ने उसके बाद कोई प्रश्न नहीं किया और चुपचाप भोजन करता रहा. अनोखेलाल ने भी चुप्पी साध ली. भोजन के बाद कक्का ने भतीजे को उसके घर छोड़ा और अपने घर चले गए.
आप सही समझे हैं, मिट्ठू को ताज़ी हरी मिर्च दिखी तो उसका व्रत भंग हो गया और उसने लपक कर मिर्च खा ली. 
कालांतर में 'इन्हीं' कृपाशंकर और रत्ना के दो पुत्र हुए, विद्याशंकर और प्रभुशंकर. विद्याशंकर और उसकी पत्नी रज्जो के बारे में तो आप जानते ही हैं, प्रभुशंकर अब कहानी में प्रवेश करने वाले हैं.
पूरे बांह की स्वेटर पहने और माथे पर चन्दन का गोल टीका लगाये जो भद्र महिला हनुमानताल वाले घर में बैठी सब गतिविधियों पर नज़र रख रही हैं, रज्जो की सास, वे हैं स्वर्गीय कृपाशंकर की पत्नी रत्ना.

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