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मध्यम मध्यम : छः :

*छः* रज्जो की ज़िन्दगी चूल्हे-चौके के इर्द-गिर्द घूम कर रह गयी. इलाहाबाद की अल्हड़ लड़की अपने ब्याह के बाद एक घरेलू मशीन की तरह हो गयी. कभी समय था जब दस-बारह बच्चे भी पल जाते थे लेकिन अब चार बच्चे पालना, उन्हें बड़ा करना, पढ़ाना-लिखाना और लाइन से लगाना बहुत कठिन काम हो गया है. शुरू में लड़का हो गया होता तो ये फ़ौज न बनती, लेकिन 'एक ट्राई और' के चक्कर में चार हो गये. पुश्तैनी जायदाद के नाम पर एक पुराना घर है जो किसी भी दिन आधा हो जाएगा क्योंकि उसमें रज्जो के देवर का हिस्सा है. किसी प्रकार विद्याशंकर की खुद की दूकान हो गयी है, अभी नयी है, कुछ समय लगेगा लेकिन धीरे-धीरे जम जाएगी. ज़िंदगी भी ऐसे ही बीत रही है, कल का कुछ पता नहीं, पर भरोसा है कि धीरे-धीरे सब व्यवस्थित हो जाएगा. रज्जो की सबसे बड़ी फ़िक्र यह है कि विद्योत्तमा का क्या होगा? उसने जज बनने की ठान ली है, उसकी उम्र बढ़ती जा रही है. छोटी बहन की शादी हो गयी, बड़ी कुँवारी बैठी है. ब्राह्मणों में वैसे ही लड़कों का टोटा है, लड़की बुढ़ा जाएगी तो कौन ब्याहेगा? जज कब बनेगी? बनेगी भी या नहीं. आजकल की लड़कियां किसी की कुछ सुनती नहीं, जबरपेली मे...

मध्यम मध्यम : पांच :

*पाँच* विद्योत्तमा का सिविल जज के रूप में चयन नहीं हुआ. यह खबर उसे प्रेस में मिल गयी. खबर पढ़ते ही उसका दिल डूबने लगा. उसने खुद से पूछा, 'क्या मैं जज बनाने के काबिल नहीं?' शाम को प्रेस से छुट्टी मिली, वह अपनी दूकान गयी. उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर पापा ने पूछा, 'क्या बात है? आज बहुत उदास दिख रही है.' 'पापा, मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ.' 'अरे, कैसे?' 'क्या पता?' 'फिर?' 'अभी मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है. बाद में देखूँगी कि क्या करना है.' विद्योत्तमा ने अपनी रुलाई रोकते हुए कहा. उस रात  विद्योत्तमा  सो न सकी. प्रतियोगिता की तैयारी का परिश्रम, अखबार की नौकरी और संध्या का ब्याह उसकी बंद आँखों में तैरता रहा. बीच-बीच में आंसू बहते और उसके गाल पर लुढ़क जाते. सुबह उसकी आँखें लाल थी. मम्मी ने पूछा, 'बेटा, रात को सोयी नहीं क्या?' 'नींद नहीं आयी मम्मी.' 'क्या इतना दुःख हो गया तुझे?' 'नहीं होना चाहिए?' 'होना चाहिए लेकिन इतना नहीं होना चाहिए.' 'मम्मी, मेरा सपना टूट गया.' कहते हुए वह रो प...

मध्यम मध्यम : चार

*चार* प्रत्येक परिवार के सामने हर समय कोई-न-कोई चुनौती रहती है, सामान्यतया अस्तित्व और सम्मान का संकट. वैसे तो सारा खेल मनोविज्ञान का है लेकिन शतरंज की चाल की तरह उलझा हुआ है. सामने वाला खिलाड़ी समय है जिसकी चाल समझ नहीं आती क्योंकि वह खेल के नियम को नहीं मानता जबकि हम अपनी चाल खेल के नियम के अनुसार चलते हैं. यहीं गड़बड़ हो जाती है, वह बाज़ी जीतते जाता है और हम उसका विजयी विद्रूप चेहरा देखते रह जाते हैं. रज्जो समर्पित गृहिणी है. उसने अपनी इच्छाओं को आलमारी में रखे कपड़ों की तह में दबाकर रख छोड़ा है. साफ़-सफाई के दौरान यदा-कदा वे यादें उभर कर सामने आ जाती हैं तब दो आंसू टपक पड़ते हैं, बस हो गया. जब से रज्जो ससुराल आयी है, सिर्फ ससुराल की होकर रह गयी. वैसे तो इलाहाबाद और जबलपुर दोनों नदियों के किनारे बसे हैं लेकिन उनमें बहुत फर्क है. गंगा का पाट बहुत चौड़ा है, वैसे ही वहां के लोगों का दिल भी चौड़े हैं जबकि नर्मदा का पाट औसतन छोटा है उसका असर जबलपुर में रहने वालों पर भी है. औरतों के लिए घर के बाहर की दुनिया भी घर के अन्दर की दुनिया जैसी संकुचित है. दुनिया केवल उनके लिए अवश्य खुल गयी है जो संप...