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*एक*


ध्वनि समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है. ये ध्वनियाँ अलग-अलग हैं फिर भी मिलजुल कर आकाशगंगा में विचरण करती हैं. कुछ ध्वनियों को हम सुन सकते हैं, समझ सकते हैं लेकिन कुछ ऐसी भी हैं जो हम तक नहीं पहुँच पाती इसलिए वे हमारे लिये अन्जानी हैं. इस ब्रह्माण्ड के सबसे बुद्धिमान प्राणी मनुष्य की जीवनगाथा भी इन्हीं ध्वनियों की तरह है, जिसके कुछ अंश दिखाई पड़ते हैं, समझ आते हैं लेकिन उसके जीवन का अधिकतम हिस्से न दिखाई पड़ते है, न समझ आते हैं. समझ आयेगा भी कैसे? समझ के लिये खुला दिमाग चाहिए, समझने की शक्ति चाहिए और सामनेवाले के मन की बात का विश्लेषण करने की क्षमता. 
विद्याशंकर की ही बात करें, अपने विद्याशंकर मिसिर की, तो चार बच्चों के इस पिता ने एक लड़के की आस में तीन लड़कियां पैदा कर ली. लड़का धीरे-धीरे बढ़ रहा था जबकि लड़कियां फटाफट. ग्यारह साल के वैवाहिक जीवन में चार बच्चों को जन्म देने में मिसराइन की आंखें धंस गयी हैं, शरीर निचुड़ गया और दिमाग अस्थिर हो गया है. बात-बात में चिड़चिड़ाना, घर में तूफ़ान उठा लेना और नाराज़गी का भूत लड़कियों को डांट कर उतारना उनकी नियमित दिनचर्या है.
मिसिर और मिसराइन अलग-अलग कमरों में सोते हैं. बच्चों ने उनके बीच दीवार खड़ी कर दी है. वैसे, बच्चों ने ठीक ही किया लेकिन अब देर हो चुकी. मिसिर अपने काम से थक-हार कर घर वापस आते, अपना खादी का कुर्ता उतार कर खूँटी में टांगते और मुंह-हाथ धो कर जब भोजन करने के लिये चटाई पर पालथी मार कर बैठते तो उनकी बनियान के छेद देखकर मिसराइन की आँखों में आंसू आ जाते. पाटे पर बेलन से रोटी बेलते-बेलते कहा- 'नई बनियान क्यों नहीं खरीदते? तुम्हारी गरीबी सी झांकती है.'
'गरीबी है तो झांकती है.'
'अरे, तुम गरीब कब से हो गए? तुम्हारा व्यापार तो ठीक-ठाक चल रहा है न?'
'तीन लड़कियों के बाप को गरीब ही समझो, रज्जो.' मिसिर जी रोटी में गोभी की सब्जी लपेटते हुए बोले.
'लड़कियों को बोझ समझते हो?'
'बोझ तो सब होते हैं, लड़के हों या लडकियां.'
'बोझ मानो तो बोझ, न मानो तो सहयोगी.'
'सहयोग बहुत दूर की बात है. अभी तो इनको बड़ा करना, पढ़ाना है, शादी-ब्याह करना होगा. कैसे निभेगा?'
'भगवान ने दिया है तो वही व्यवस्था करेंगे.'
'भगवान ने अपना काम कर दिया लेकिन इसके बाद वह कुछ नहीं करता, सब इंसान को करना पड़ता है.'
'हाँ, ठीक है लेकिन सब उसी की कृपा से होता है.'
'अभी तक तो कृपा बनी रही, कुछ अधिक ही हो गयी हमारे साथ.'
'उसके लिये भगवान को दोष मत दो, खुद बिगड़े हुए हो, मना करती थी तो मानते नहीं थे.'
'ये भी अच्छी रही, श्रेय भगवान को दे दिया और दोष मुझे.'
'लो, एक रोटी और ले लो. फूली हुई है, कड़क सेंक दिया है.'
'पेट भर गया, अब नहीं खा सकता.'
'ले लो, प्यार से खिला रही हूँ. अगले जनम में मेरी जैसी नहीं मिलने वाली.'
'अच्छा दे दो.'
'बहुत दिन हो गये, मायके नहीं गयी मैं.'
'इलाहाबाद से कोई चिट्ठी आई?'
'हाँ, आई है. अम्मा की तबियत बिगड़ती जा रही है, दमे की तकलीफ से बेहाल हैं. बाबूजी बहुत चिंतित हैं. मुझे बुला रहे हैं.'
'जाओ, हो आओ. शायद तुम्हें देख कर उनको तसल्ली मिले.'
'कब जाऊं?'
'जब तुम जाना चाहो.' विद्याशंकर ने हाथ धोते हुए कहा.

*****

विद्याशंकर के खा लेने के बाद रज्जो ने बच्चों को परोसा-खिलाया. उसके बाद खुद खाने बैठ गयी. मुंह में कौर डाला और अम्मा की याद आ गई. आंखों की कोर से आंसू बहने लगे. अम्मा बहुत प्यार करती थी. तीन भाइयों के बीच रज्जो अकेली थी इसलिए तीनों से ऊपर थी. जब मेट्रिक पास हुई तो बाबूजी बोले- 'रज्जो बड़ी हो गयी है, अब उसकी शादी के लिये लड़का देखना चाहिए.'
'कितनी बड़ी हो गयी है कि उसको ब्याहने के पीछे लगे हो.' अम्मा बोली.
'अभी से खोजूंगा, तब तो आगे सम्बन्ध मिलेगा.'
'नहीं, हमारी रज्जो कालेज में पढ़ेगी, बी.ए.-एम.ए. करेगी, उसके बाद शादी करना.'
'ज्यादा पढ़ लेगी तो फिर लड़का नहीं मिलेगा.'
'ऐसा नहीं है, मिल जाएगा. पढ़ी-लिखी रहेगी तो पढ़ा-लिखा लड़का मिलेगा. मैं अपनी बेटी किसी साहब को ब्याहूंगी.'
'साहब से ब्याहूंगी ? घर में नहीं खाने को, अम्मा चली भुनाने को.'
'तो क्या गरीबों का कोई नहीं होता ? अपनी रज्जो सुन्दर है, जो देखेगा, फट से पसंद कर लेगा.'
'लेकिन बिना दहेज़ के कोई न मानेगा.'
'अब इस बहस में क्या रखा है? अभी तो रज्जो का कालेज में एडमीशन करवाओ, उसको पढाओ जी.' अम्मा बोली.
रज्जो यह वार्तालाप सुन रही थी और मन ही मन खुश हो रही थी कि कालेज जाऊँगी, खूब पढूंगी. ग्रेजुएट हो जाउंगी तो काला गाउन पहन कर, डिग्री हाथ में लेकर स्टूडियो में फोटो खिंचवाउंगी. खूब मज़ा आएगा. शादी-ब्याह की झंझट भी हाल-फिलहाल टल गयी, बहुत अच्छा हुआ.

*****

रज्जो सयानी होने लगी. स्कूल की उबाऊ ड्रेस से छुट्टी मिली और रंग-बिरंगी पोषाक के साथ कालेज के मनोरम दिन शुरू हुए. चुस्त कुर्ती और चूड़ीदार पैजामा पहनकर जब रज्जो बाहर निकलती तो एक नहीं अनेक हसरत भरी निगाहें उसकी ओर उठती. रज्जो को वे निगाहें दिखाई भले न पड़े लेकिन उसको समझ आती थी. इलाहाबाद की सड़क पर चलना मुश्किल होता है क्योंकि ज़रा सा चूके और पैर गोबर में घुसा. वैसे भी, तनिक सिर झुका कर चलना, खामोशी से आगे बढ़ना और कम बात करना रज्जो के स्वभाव में था. मुश्किल यह हो रही थी कि जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, घूरने वाले बढ़ रहे थे. इनमें से एक पर तो आशिकी का भूत सवार हो चुका था. रज्जो के घर से निकलने के पहले वह रोज एक पर कोण पर खड़ा रहता ताकि वहाँ से कालेज तक वह रज्जो के आस-पास सहयात्री बन कर चलता रहे. घर से कालेज की दूरी लगभग दो किलोमीटर थी, पैदल जाना होता था. जब तक कालेज आ न जाये तब तक रास्ता इतना लंबा लगता था कि मत पूछो. कई बार रज्जो के दिल में आया कि वह रुक कर उससे पूछे कि आखिर वह क्या चाहता है? पर प्रश्न तब पूछा जाता है जब उसका उत्तर मालूम न हो. उसके संभावित उत्तर का उत्तर रज्जो के पास था लेकिन फ़िज़ूल की बहस से कोई फायदा न था. वह सोचती थी कि बेवज़ह क्यों उलझना ? कुछ दिन में बेरुख़ी खुद समझ आ जाएगी और उसका उत्साह ठंडा पड़ जाएगा लेकिन उसकी दीवानगी से रज्जो का मानसिक तनाव बढ़ते जा रहा था. मन में आया कि घर में उसकी कारगुज़ारी की चर्चा की जाये लेकिन उस लड़के को कोई कुछ न कहेगा, रज्जो का घर से निकलना बंद हो जायेगा और पढ़ाई छूट जायेगी.
एक दिन वह सायकल पर रज्जो के बगल से निकला और अपना हाथ बढ़ाकर उसके लज्जा-अंगों को छूता हुआ आगे बढ़ गया. रज्जो एक क्षण के लिये काँप गयी. अगले क्षण तिलमिलाते हुए वह तेज गति से दौड़ी और उसके करीब पहुंच गयी. उसने दौड़ते हुए अपना बांया पैर पूरी शक्ति के साथ सायकल के पीछे मारा. सायकल का संतुलन बिगड़ गया. लड़का सड़क पर गिर पडा. उसके बाद रज्जो ने अपनी चप्पल उतारी और उसकी अच्छी कुटाई की. जब लड़का हाथ जोड़कर माफ़ी मांगने लगा तो रज्जो ने उससे पूछा- 'और करेगा बेअदबी? और मेरा पीछा करेगा?'
यह अच्छा हुआ कि वहां उस समय रज्जो की जान-पहचान वाला कोई नहीं था. अगर कोई होता और घर में इस घटना की खबर घर पहुँच जाती तो घर से बाहर निकलने पर तुरंत प्रतिबन्ध लग जाता अर्थात कालेज जाना बंद.
रज्जो पढ़ने में तेज थी. बी.ए. में अच्छा 'स्कोर' किया लेकिन आगे की पढ़ाई के लिये बाबूजी ने अपने हाथ ऊपर कर लिये- 'मेरी हैसियत नहीं आगे पढ़ाने की.'
'बाबूजी, प्राइवेट में एम.ए. कर लूँगी तो कालेज की फीस नहीं लगेगी.' रज्जो घिघियाते हुए सुझाव दिया.
'मुझे ऐतराज़ नहीं लेकिन परीक्षा की फीस का क्या होगा?'
'वह मैं दे दूँगी.' अम्मा बोली.
'अच्छा, तो तुम भी पैसा जोड़ कर रखती हो?' बाबूजी बोले.
'ऐसे ही मौकों पर काम आता है हमारा जोड़ा हुआ पैसा.' अम्मा सिर पर पल्ला ढांकते हुए बोली.
'तो फिर रज्जो की शादी में भी तुम्हारा गुप्त धन बाहर निकलेगा?'
'मेरे पास कौन सा धन रखा है जो निकलेगा? हाँ, रज्जो के जेवर के लिये तुमको बाज़ार से सोना नहीं खरीदना पड़ेगा, मैं अपने जेवर दे दूँगी.'
'बहुओं के लिये भी तो लगेगा?'
'तब का तब देखा जाएगा, अभी तुम रज्जो के लिये लड़का खोजना शुरू करो. रिश्तेदारी में चिट्ठी लिखो, शायद कोई बात बने.'
'ठीक है, लिखता हूँ लेकिन...'
'क्या लेकिन?'
'लेकिन शादी का ख़र्च कहाँ से आएगा?'
'तुम खोजना शुरू करो, सब हो जाएगा. आज तक किसी भी लड़की का ब्याह पैसे के कारण नहीं रुका है.'
'अरे हाँ, मुझे याद आया, तुम्हारी बड़ी बहन के यहाँ अगले महीने शादी है, तुम झांसी जाओगी क्या?'
'जाना तो है.'
'रज्जो को भी अपने साथ ले जाओ. वहां चार रिश्तेदार रहेंगे, देखेंगे-सुनेंगे तो बात आगे बढ़ेगी.' बाबूजी ने अम्मा को सुझाव दिया. अम्मा ने स्वीकृति में अपना सिर हिलाया और अपने काम से लग गई.  

*****

झांसी में रज्जो की मौसी के घर खूब गहमा-गहमी थी. सब लड़कियां सज-धज कर इठलाती हुई इधर से उधर हो रही थी, बात-बेबात हंस रही थी. घर की बेज़ुबान मनहूसियत और बेवज़ह डांट-डपट से दूर शादी-ब्याह का यह माहौल रज्जो के लिये कितना सुकून भरा था! सुबह-सुबह सूजी का गर्म हलवा और उसके साथ दाल-भरी कचौड़ी का नास्ता, दिन के समय भोजन में पूरी के साथ आलू की रसीली सब्जी, खीरे का रायता, अचार, पापड़ हाज़िर था, जितना दिल करे खाओ. खिलाने वाले आग्रह करके खिला रहे थे और खानेवाले 'बस-बस' करते जा रहे थे.
रात को बारात आने वाली थी. मंडप सज गया था, लड़कियां सज-संवर रही थी. लड़के अपने सूट पहन कर उस जानकार व्यक्ति को खोज रहे थे जिसे 'टाई' बांधना आता हो ताकि उनका सूट धारण करना संपन्न हो सके. लखनऊ से आया एक युवक उस समय सबका दुलारा बन गया था क्योंकि वह टाई की 'नाट' बाँधने वाला अकेला जानकार था- वह बोल रहा था, 'एक-एक करके आओ यार...'
अचानक उस कमरे में रज्जो पहुच गयी. टाई बांधते समय उसकी नज़र रज्जो पर पड़ी, उसके हाथ थम गए. रज्जो ने उसे देखा तो वह भी वहीँ थम गयी. उस समय हवा भी थम गयी और समय भी थम गया. दोनों एक-दूसरे को एकटक देखते रह गए. वह मुलाकात बिना किसी मुस्कराहट के शुरू हुई और उसी तरह ख़त्म हो गयी.
अगले दिन रज्जो को उसका नाम मालूम हो गया, नवीन और नवीन को रज्जो का लेकिन कई बार आमना-सामना होने के बाद भी कोई बातचीत नहीं हुई क्योंकि दोनों में उत्सुकता से अधिक संकोच था. वैवाहिक कार्यक्रम संपन्न हो गए, मेहमान वापस जाने लगे, रज्जो और नवीन भी अपने रास्ते चले गये लेकिन झांसी की संकरी गलियों में दोनों का कुछ छूट गया और कुछ उन दोनों के साथ अलग-अलग चला गया.
संसार में बहुत से लोग मिलते हैं, उनमें से कोई पहली नज़र में मन को भा जाता है, आँखों-आँखों में बात हो जाती है, निःशब्द संवाद हो जाता है. इसके पीछे किसी खास वज़ह का होना ज़रूरी नहीं है, युवावस्था की बेल को बढ़ने के लिये सहारा चाहिए, बलखाती बेल किसी से भी लिपट सकती है लेकिन यदि कोई मनभावन मिल जाये तो केवल तन का नहीं, मन का मिलन भी संभव हो जाता है.
जीवनसाथी कौन होगा, कैसा होगा? यह प्रश्न भविष्य के गर्भ में रहता है लेकिन आम तौर पर होता यह है कि इस बाली उम्र में जो भी करीब आता है, मन ही मन उसके बारे में गुणा-भाग चलते रहता है. यद्यपि जीवन का गणित अंकगणित जैसा सुनिश्चित नहीं है; सोचो कुछ, हो कुछ और जाता है लेकिन मनुष्य अपनी समझ से अनुमान लगाते रहता है और अपने इष्ट से अपना अनुमान सही निकलने की प्रार्थना करता है.
प्रश्न यह है कि क्या मनुष्यों के जोड़े स्वर्ग में तय होते हैं? प्राचीन मान्यता यही है कि जीवनसाथी प्रारब्ध के द्वारा निर्धारित होता है, 'ऊपरवाले' के हाथ में है लेकिन गौर से देखा जाये तो ऊपरवाले को दोष या श्रेय देना निरर्थक है. शतरंज के खेल की तरह किस गोटी को कहाँ बैठाना, यह इसी समाज में तय होता है. जोड़ी बनते-बनते बिखर जाती है या बिखरते-बिखरते बन जाती है. बहुत पेंच हैं जोड़ी बनाने और बनाए रखने में !
झांसी से लौटते समय रज्जो की अम्मा ने अपनी बड़ी बहन से कहा- 'रज्जो अब सयानी हो गयी है, उसका ब्याह करना है. कोई अच्छा लड़का दिखे तो बताना जिज्जी.'
'एक लड़का कानपुर से आया था अपने यहाँ शादी में, नवीन, हमारी रिश्तेदारी में है. तुम नहीं देखी क्या?'
'हमें किसी ने बताया नहीं.'
'देखने-सुनने में बहुत बढ़िया है, स्टेट बैंक में लगा है. उसके पिता डिप्टी कलेक्टर हैं. अच्छा संस्कारी परिवार है.'
'पर....'
'पर क्या?'
'वहां हमारा सम्बन्ध कैसे होगा? डिप्टी कलेक्टर का लड़का है, नौकरी कर रहा है, उनकी डिमांड बहुत होगी. उनके हिसाब का दान-दहेज़ हम कहाँ से लायेंगे? हमारी स्थिति तो आपसे छुपी नहीं है.'
'तुम बात तो चलाओ और उनको लड़की को दिखाओ. अपनी रज्जो बहुत सुन्दर है, देखेंगे तो पैसे को भूल जायेंगे. आगे का मैं संभाल लूंगी, वे लोग मेरी बात नहीं काटेंगे.'
'तुम्हारा ही सहारा है जिज्जी.' रज्जो की अम्मा रूंधे गले से बोली.
ट्रेन में ठंडी हवा के झोंके घुस रहे थे. रज्जो बार-बार अपने माथे पर झूल रही लट को सहेज रही थी और अम्मा अपने सिर के पल्लू को आगे-पीछे कर रही थी. मां-बेटी प्रसन्नचित्त थे. रज्जो नवीन की यादों में खोयी हुई थी और अम्मा सोच रही थी कि लड़की का रिश्ता कानपुर में हो जाये तो मेरा सपना पूरा हो.
कानपुर वाले लड़के की बात आगे न बढ़ सकी क्योंकि रज्जो के बाबूजी आगे बढ़ने में हिचकिचा रहे थे. उनका तर्क था कि शादी-ब्याह बराबरी वालों में किया जाता है. कानपुर वाले ऊंचे हैं, हम उनके सामने कुछ नहीं हैं. मान लो विवाह हो भी गया तो एक दिन की बात तो है नहीं, लेना-देना ज़िन्दगी भर कर का होता है, कैसे बनेगा? इसी संकोच में बहुत समय निकल गया. एक दिन झांसी वाली जिज्जी का पत्र आया, गुस्से वाला. चिट्ठी में उन्होंने खूब फटकारा और तुरंत कानपुर प्रस्ताव भेजने के लिये लिखा. यह भी हिदायत दी कि रज्जो की फोटो भी पत्र के साथ भेजना.
अगले दिन बाबूजी रज्जो को स्टुडियो लेकर गए, फोटो खिंचवाई. फोटो आने के बाद चिट्ठी लिखी, शंकर भगवान को हाथ जोड़कर याद किया और लिफाफा पोस्ट कर दिया.

*****

उस दिन रज्जो के घर में साफ़-सफाई अभियान चल रहा था. कानपुर वाले रज्जो को देखने आ रहे थे. घर में ख़ुशी का माहौल था. 'रज्जो क्या पहनेगी?' इस विषय पर अम्मा और बाबूजी में मतभेद हो गया. अम्मा सलवार-सूट के लिये कह रही थी और बाबूजी साड़ी के लिये. बहुत देर बहस चली. रज्जो के अलावा सबने बहस में भाग लिया. अंततः अम्मा की चली क्योंकि उनका तर्क मज़बूत था- 'जिस ड्रेस में फोटो खिंची थी, उसी में रज्जो को दिखाएंगे.'
रज्जो का दर्पण से रोज का साथ था लेकिन आज उसने दर्पण से मुस्कुराते हुए पूछा- 'बताओ, कैसी लग रही हूँ मैं?'
शाम को लगभग पांच बजे लड़की देखने वाले घर आये. नवीन और उसके मम्मी-पापा आये. उनके लिये सेवई की खीर बनी, बाज़ार से गरम समोसा आया, नमकीन और चाय दी गयी. रज्जो बिना मेक-अप के आई और उनके सामने बैठ गयी. मम्मी-पापा ने कुछ हल्के-फुल्के प्रश्न किये, रज्जो ने सहजता से जवाब दिये. उसके बाद वह उनसे इजाज़त लेकर वहां से चली गयी. नवीन के पापा की रज्जो के पिता से वार्तालाप शुरू हुआ- 'शादी के लिए क्या सोचा है आपने?'
'मैं समझा नहीं.'
'हमारी कोई खास डिमांड नहीं है फिर भी आपके यहाँ हम बारात लेकर आएँगे, हमारे रिश्तेदार आयेंगे. उनका बढ़िया स्वागत-सत्कार होना चाहिए.'
'जी, हमारी पूरी कोशिश होगी.'
'और?'
'हम तो कमजोर हैसियत के हैं, कुछ खास नहीं कर पाएंगे, अपनी प्यारी बच्ची आपको दे रहे हैं.'
'ठीक है, मंजूरी अभी हम नहीं दे सकते क्योंकि नवीन के दादा-दादी मालिक हैं. हम अपनी रिपोर्ट उनको दे देंगे, फायनल वो ही करेंगे.'
'ठीक है, जैसा आप उचित समझें.' रज्जो के बाबूजी ने उत्तर दिया.
'कानपुर पहुंचकर आपको समाचार देते हैं.'  नवीन के पापा ने कहा और वे सब विदा हो गए.
कुछ समय बीता फिर कानपुर से खबर आई कि लड़की की कुंडली भेजिए. रज्जो के बाबूजी को कुछ खटका हुआ. यदि कुंडली मिलाना था तो लड़की देखने के पहले मिला लेना था, अब कुंडली की बात क्यों आई? उन्होंने कानपुर ट्रंक-काल लगाया और नवीन के पापा से फोन पर बात की- 'सब कुशल-मंगल है?'
'हाँ, यहाँ सब ठीक है.'
'आपने कुंडली भेजने के लिये खबर भेजी है.'
'भाई साहब, मैं तो कुंडली पर विश्वास नहीं करता इसलिए आपसे पहले नहीं कहा था लेकिन अब घर में कुछ ऐसी बात हुई कि दोनों की कुंडली मिलवा ली जाये. मैंने तो मना किया, बहुत समझाया लेकिन आप तो जानते हो, एक बार मन में वहम आ गया तो उसका निराकरण हो जाना ठीक है. कल के दिन कुछ ऊंचा-नीचा हो गया तो सारा दोष मुझ पर आ जाएगा.'
'ठीक है, मैं भेज देता हूँ. आप भी नवीन जी की कुंडली मुझे भेज दीजिए, मैं भी यहाँ पंडितजी से मिलवा लेता हूँ.'
'उसकी ज़रुरत नहीं है, यहाँ एक प्रकांड विद्वान् हैं, उनको दिखाकर राय लेता हूँ और आपको तुरंत खबर करता हूँ.'  नवीन के पापा ने जवाब दिया.
उधर झांसी वाली जिज्जी को जब कुंडली वाली बात मालूम पड़ी तो उसने बैंक में फोन लगाकर सीधे नवीन से बात की- 'नवीन, क्या हुआ रे? तुम लोग अभी तक फायनल नहीं कर पाये?'
'घर में विचार चल रहा है चाची.' नवीन ने कहा.
'कितना दिन लगेगा विचार करने में?'
'मैं क्या बताऊँ?'
'अच्छा, यह तो बता सकता है कि रज्जो तुझे पसंद है या नहीं?'
'यह भी नहीं बता सकता.'
'अरे, क्यों? तूने देखा है न रज्जो को? कैसी लगी?'
'देखा तो है लेकिन मेरी राय का कोई महत्व नहीं है.'
'तू 'हाँ' बोल, बाकी मैं तेरे पापा से बात कर लूंगी.'
'मेरी 'हाँ' अगर पापा तक चली गयी तो फिर मेरी खैरियत नहीं. पापा मुझे घर से निकाल देंगे.'
'शादी तेरी हो रही है या तेरे पापा की?'
'यही तो मुश्किल है कि मेरी शादी का 'डिसीजन' मैं नहीं ले सकता, घर के लोग लेंगे.'
'अच्छा ये बता, कहीं और भी तेरी शादी की बात चल रही है क्या?'
'हेलो, हेलो, हेलो....आपकी आवाज़ नहीं आ रही है...' नवीन ने कहा और फोन संपर्क अनायास कट गया.
सीमित आय वाले परिवार में लड़की की शादी करना बहुत बड़ी समस्या होती है. यह समस्या रज्जो के विवाह के लिए भी आई. रज्जो पढ़ी-लिखी और सुन्दर थी लेकिन उसके परिवार का अर्थसंकट बहुत बड़ी बाधा थी. पैसे की तंगी न होती तो उन दोनों की जोड़ी बन जाती लेकिन जैसे ही नवीन के लिये अनुकूल 'कम्बीनेशन' सहारनपुर में मिला, रज्जो की कुंडली में दोष निकल गया और वह 'रिजेक्ट' हो गयी.
कितना अच्छा होता कि रज्जो और नवीन जीवनसाथी बन जाते ! लेकिन नहीं बन पाये. सच तो यह है कि लम्बे समय तक ये दिल एक-दूसरे के लिये धड़कते रहे लेकिन इन्हें जोड़ने वाले, अर्थात दोनों परिवार, उस गहरी बात को समझने में असफल रहे.
रज्जो अकेली लड़की नहीं है, हमारे आसपास असंख्य लड़कियां हैं जिनकी मनमाफ़िक शादी नहीं हो पाती, संतुलित जोड़े नहीं बनते और उनकी पसंद का वजन नहीं होता. पुराने लोगों का कहना है कि जवानी में लिये गये फैसलों में गंभीरता नहीं होती इसलिए अनुभव का सहारा लिया जाना चाहिए. इसी आधार पर विवाह के लिये व्यक्तिगत निर्णय को पारिवारिक स्वरुप दिया गया ताकि अनुभवसिद्ध निर्णय का लाभ लिया जा सके.
रज्जो का खिला हुआ चेहरा मुरझाने लगा. वह विवाह के लिए उत्सुक नहीं थी लेकिन जिस प्रकार से उसके माता-पिता निराश हो रहे थे, उसे अपने लड़की होने का अपराधभाव घेर रहा था. उसके दिमाग में हर समय वे लोग घूमते रहते जिन्होंने उससे पूछा था- 'कहाँ तक पढ़ी हो?'
'खाना बना लेती हो?'
'आज तुमने क्या बनाया है?'
'पिक्चर देखती हो क्या?'
'कौन सा हीरो पसंद है?'
'शादी के बाद अपने पति के साथ अलग रहना पसंद करोगी या परिवार के साथ?'
'मां और सास में क्या अंतर होता है?'
'पढ़ी-लिखी लड़की का नौकरी करना ज़रूरी है क्या?'
कानपुर वाला सम्बन्ध नहीं हुआ, कन्नौज नहीं हुआ, बाँदा नहीं हुआ तब रज्जो के घर वालों को समझ में आया कि यूपी के बाहर निकलना पड़ेगा. झांसी वाली जिज्जी ने बताया कि एक लड़का जबलपुर में है, उसकी किताब की दूकान है. 'साहब' से बिटिया ब्याहने की इच्छा के तीन अवसर हाथ से निकल जाने के बाद अब अम्मा का 'साहब' से ब्याह करने वाला आग्रह कमजोर पड़ गया. जबलपुर बात चलाई गयी. बात बन गयी.
अब रज्जो को ब्याह कर आये हुए दस साल हो गए. अब वह विद्याशंकर मिसिर की मिसराइन हो गयी हैं. अम्मा की याद आई तो पुरानी बीती बातें किसी चलचित्र की तरह मष्तिष्क में आज घूम गयी. समय कितनी तेजी और बेरहमी से बीतता है!

*****

न दिनों पूरे जबलपुर में सब तरफ तालाब थे, हनुमान ताल, चेरी ताल, भंवर ताल, सूफा ताल, रानी ताल, फूटा ताल, मढ़ा ताल, माढ़ो ताल, देव ताल, गोकलपुर ताल, बेला ताल, ठाकुर ताल, महानद्दा ताल, पाण्डु ताल, खंभा ताल, गुलौवा ताल, शाही ताल, हाथी ताल, गंगासागर, भान तलैया, कदम तलैया, बेनी की तलैया, श्रीनाथ की तलैया, तिलकभूमि तलैया, ककरैय्या तलैय्या, गोपालबाग की तलैय्या, जलपरी लेक, संग्राम सागर आदि 52 तालाब हुआ करते थे. विद्याशंकर मिसिर का घर हनुमानताल में था. पुरखों का बनाया हुआ. पत्थर में चूने की जोड़ाई से खड़ा मज़बूत घर जिसकी दीवारें डेढ़ फुट मोटी थी, छत ऊंची थी लेकिन दरवाजे छोटे थे. इन दरवाजों को देखकर ऐसा अनुमान लगता है कि  विद्याशंकर के पूर्वज कद में ठिगने रहे होंगे लेकिन वर्तमान पीढ़ी का कद बढ़ गया है. विद्याशंकर ५' ११" हैं इसलिए झुककर आते-जाते हैं. बच्चे भी लंबे-लंबे  हैं.
हनुमान ताल कोई छोटा-मोटा तालाब नहीं है. इस पार से उस पार देखने के लिए अपना सिर उठाना पड़ता है. पानी हर समय लबालब भरा रहता है लेकिन न पीने लायक, न नहाने लायक. आस-पास की गलियों से आया पानी इस तालाब को दूषित करते रहता है. तालाब के चारों तरफ मंदिर बने हुए है. भक्तिनें सुबह पांच बजे से आना शुरू होती हैं और नौ बजे तक ताँता लगा रहता है. पूजा के पश्चात बचा हुआ सामान, जैसे फूल-पत्ती-दूब इत्यादि भी तालाब में फेंक जाती हैं.
घर के सामने इतना बड़ा तालाब है लेकिन पीने के पानी की बहुत किल्लत है. घर के बाहर नगरपालिका का नल लगा हुआ है जिसमें सुबह-शाम दो-दो घंटे के लिये पानी आता है. रज्जो को सुबह ज़ल्दी उठकर जल-संग्रह करना पड़ता है ताकि पीने, बर्तन धोने और सबके नहाने के लिये पानी इकठ्ठा किया जा सके. इधर पानी भर कर रखने की ज़द्दोज़हद रहती है, उधर मिसिरजी की आवाज़ गूंजती है- 'रज्जो, चाय बन गयी क्या?'
'बनाती हूँ, बनाती हूँ, ज़रा पानी भर लूं, पानी धीमा हो जाएगा तो फिर नल के पास घंटों बैठना पड़ेगा.' रज्जो ने झल्लाकर जवाब दिया.
'चाय बनाने में कित्ता टाइम लगता है? पांच मिनट का काम है.'
'तुम क्यों नहीं बना लेते? देख रहे हो, मैं काम में लगी हूँ.'
'बना लेता लेकिन तुम्हारे हाथ की बनी चाय में जो मज़ा है, वह हमारी चाय में नहीं आता.'
'मेरी चाय का मज़ा लेना है तो फिर आधा घंटा रुको.'
'तुम हर मज़े के काम में जानबूझकर देरी करती हो.'
'सुबह-सुबह इस तरह की बात करने में तुमको शर्म नहीं आती?'
'हम तो चाय की बात कर रहे हैं.'
'मैं सब समझती हूँ, गाँव की लड़की नहीं हूँ, इलाहाबाद की हूं.'
'अब बहस मत बढ़ाओ यार, चाय बना दो मेरी रज्जो.' पति ने कहा.
'तुम यहाँ खड़े हो जाओ, पानी भरो, मैं चाय बनाती हूँ.' पत्नी ने सुझाया. इस तरह जबलपुर के हनुमानताल के एक परिवार में खुशनुमा सुबह की शुरुआत हुई.

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विद्याशंकर के पिता ने अन्धेरदेव में पुस्तक की दूकान शुरू की थी. दादा पुरोहिती करते थे लेकिन पिता को पुरोहिती पसंद नहीं थी इसलिए किराये की दूकान लेकर धार्मिक पुस्तकें, पूजन-पोथी, डायरी, कैलेण्डर बेचने लगे. विद्याशंकर के पिता रज्जो के बहू बन कर घर आने के दो साल बाद संसार से विदा हो गए. दूकान की पूरी जिम्मेदारी विद्याशंकर पर आ गयी. ग्राहक कम आते थे इसलिए दूकान में पाठ्य पुस्तक और स्टेशनरी की सामान भी रखने लगे.
घर में विद्याशंकर की अम्मा की चलती थी. दूकान के मामले में वे दखल नहीं देती थी लेकिन घर की हर खबर पर नज़र रखती थी. दिन भर घर के दरवाजे के पास लकड़ी की कुर्सी पर बैठी रहती. कौन बाहर जा रहा है? क्यों जा रहा है? कब लौटेगा? इन बातों का हिसाब-किताब मन में रखती थी और प्रत्येक व्यक्ति के आगमन पर प्रश्न करने का उनका अधिकार सुरक्षित था. कुर्सी पर बैठे-बैठे यदि उन्हें नींद आने लगती तो अपनी आँखें मूंद लेती लेकिन किसी भी आहट पर उसी क्षण जागृत होकर दाएं से बाएं सिर घुमाकर मुआयना करती और आहट के कारण की गहराई में जाकर फटाफट सवाल तैयार कर लेती थी. रज्जो की गतिविधियों पर भी उनकी कड़ी नज़र रहती. सोकर उठी कि नहीं? पानी भर लिया? नहा लिया? बच्चों को नहला दिया? पूजा हो गयी? खाने में क्या बनेगा?
इस समय दिन के साढ़े ग्यारह बज चुके हैं. अम्माजी का पूजा-पाठ संपन्न हो चुका है. मौसम में ठंडक है इसलिए उन्होंने पूरे बांह की स्वेटर पहन रखी है. माथे पर चन्दन का गोल टीका लगा हुआ है. सिर पर रखे पल्लू के अन्दर से मोटे कांच का चश्मा पहने उनका गौरवर्णी मुखमंडल बहू की गतिविधियों को देखने के लिए आतुर है. बहुत देर की चुप्पी के बाद उनके आवाज गरजी- 'रज्जो...रज्जो.'
'आई अम्माजी.' रज्जो ने कहा.
'क्या कर रही हो?'
'खाना बनाने की तैयारी कर रही हूँ.'
'दाल धो ली क्या?'
'धुल गयी.'
'और सब्जी का क्या किया?'
'क्या बनाऊं? आप क्या खाओगी?'
'अरे, हमारे मर्जी की सब्जी कब से बनने लगी, घर में?'
'जो आप बताती हो, वही तो बनाती हूँ.'
'हमने बता दिया तो क्या वो हमारे मन की है?'
'घर में सब आपके मन का ही तो होता है अम्माजी.'
'इस बात का क्या मतलब ?'
'आप घर की बड़ी हो, मालकिन हो, जैसा आप कहती हो, हम सब मानते हैं. नहीं मानते क्या?'
'ये बात तो है. हाँ, अच्छा बताओ, क्या है घर में?'
'लौकी है, भिन्डी है और मटर रखे हैं.'
'तुम क्या बना रही हो?'
'अभी तो कुछ सोचा नहीं.'
'अभी तक नहीं सोचा तो क्या शाम तक सोचोगी?'
'लौकी बना लें?'
'न, हम तो लौकी खा-खा के उबिया गए हैं. कुछ और बनाओ.'
'तो भिन्डी बना लें.'
'भिन्डी खाने से घुटना का दर्द बढ़ जाता है, बादी करती है.'
'तो मटर बना लें?'
'हाँ, आलू-मटर ठीक है. लाओ हम बैठे-बैठे मटर छीले देते हैं.' अम्मा बोली.
अम्मा ने मटर छीले. इस बीच रज्जो ने दाल में पानी डालकर कुकर गेस पर चढ़ा दिया और आलू छीलने-काटने बैठ गयी. आलू-मटर की सब्जी छौंकने के बाद आटा गूंथ लिया और विद्याशंकर के घर आने की प्रतीक्षा करने लगी.
विद्याशंकर अपने रोज के समय पर घर आए, चटाई पर बैठ गए. पास में अम्माजी भी बैठ गयी. रज्जो ने दोनों को थाली में खाना परोसा. रोटी खाते-खाते विद्याशंकर बोले- 'वाह आलू-मटर की सब्जी तो लाजवाब बनी है. रज्जो, तुम्हारे हाथ में जादू है.'
'लेओ, इतै मटर छीलत-छीलत हाथ की उंगरिया टूट गई, उतै रज्जो के हाथ में जादू !' अम्मा भड़की.
'हमाओ जो मतलब न हतो. तुमाओ हाथ लगो है ज मालूम होतो तो रज्जो को नाम बीच में कभौ न आतो अम्मा.' विद्याशंकर ने अपना और रज्जो का बचाव किया.
'तुमाओ दोष नई आ विद्या. हमाए भागई फूटे हैं. का करें हम तो ऊपर से ई अपजस लिखवा के आए हैं.'
'नईं अम्मा, हम सब्जी खा रए थे तब सोचत रहे कि आज मटर बहुतै मिठा रए हैं, का बात है? अब समझ में आई.' विद्याशंकर ने वार्ता का पटाक्षेप किया और चुपचाप खाने लगे.

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