लिखने का सबब
लिखने का सबब
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इस कहानी का लेखक अपने जीवन
के सत्तर वर्ष जी चुका. मेरे हम-उम्र देखते-देखते बच्चे से बूढ़े हो गये, अब जबरिया वापसी के लिए तत्पर हैं.
कुछ तो पहले ही निकल लिए लेकिन मेरे जैसे कुछ अभी भी बचे हुए हैं जो अपने अतीत की
यादों को दिल में संजोए हुए कभी आंसू बहा लेते हैं तो कभी मुस्कुरा लेते है. इस धरती से विदा लेते समय
अब सब कुछ दिमाग में उसी तरह घूम रहा है जैसे कल की ही बात हो. फिलिम चल रही है और
हम बैठे-बैठे देख रहे हैं. इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हाल में नहीं जाना
पड़ता, टिकट
नहीं कटानी पड़ती. इस फिल्म को न देखना चाहो तो भी देखनी पड़ती है क्योंकि 'पिक्चर' लगातार चालू है, क्या करें, रुकती नहीं है. यहाँ सवाल यह है
कि इस कहानी को वह क्यों पढ़े जो इस कहानी का पात्र है नहीं?
इस संसार में आए हर मनुष्य की कोई-न-कोई कहानी है. धरती से प्रगट होने से
लेकर धरती में वापस प्रविष्ट हो जाने तक की यात्रा विकट है. इस 'बिन मांगे' शरीर और प्राण को बचाए रखने
के लिए मनुष्य को जीवन भर जुगत पर जुगत बैठानी पड़ती है. विपरीत परिस्थितियों को
अपने अनुकूल बनाने के लिए जूझना पड़ता है. इधर एक अनुकूल हुई, उधर नवीनतम प्रतिकूल स्थिति
का जन्म होने लगता है. यह जद्द-ओ-जहद ताउम्र हमारे साथ टहल-कदमी करती है. जिन्हें
शर्म है वो बेचारे भुगतते हैं, जो
बेशर्म हैं वो मस्ती से जीते हैं.
परिवार उस वृक्ष की तरह होता
है जिसकी घनी छांह में हम खुद को सुखद स्थिति में महसूस करते हैं. यहाँ भी सिनेमा की कहानी की तरह सुहृद और दुष्ट दोनों किस्म के पात्र होते हैं. ये भूमिकाएं हम सब अपनी योग्यता और क्षमता के अनुरूप
निभाते हैं. इसी तरह सबकी गृहस्थी चलती है, जीवनचक्र चलता है.
हर पीढ़ी संघर्ष के दौर से गुजरती है. आंसू और मुस्कान, दुःख और सुख, सफलता और असफलता की तरंगों
में थपेड़े खाता इंसान जब अपनी जीवन यात्रा पूर्ण करता है तो उसकी आँखों से आंसू बहते दिखाई पड़ते हैं लेकिन यदि गौर से झांक कर देखो तो उन आँखों के भीतर मुस्कान
की एक झलक दिखेगी; जैसे हमसे कह रही हो, '
"हम चले, अब तुम झेलो".
"हम चले, अब तुम झेलो".
यह लेखक बीसवीं सदी के मध्य में आया, आज़ादी के तुरंत बाद. वह जो दुनिया थी और आज यह जो
दुनिया है, इस बीच बहुत कुछ
बदल गया. रहन-सहन, बात-व्यवहार, जीवन मूल्य और आजीविका का
संघर्ष. आज आपको हमारी बातों पर भरोसा न होगा और न ही हमें नए ज़माने की जीवन
शैली समझ में आ रही है परन्तु वह भी सच था और यह भी सच है. बीते हुए दिनों की कुछ
यादें इस उपन्यास में वर्णित हैं जो आपको ऐसे अतीत में ले चलेंगी जिन्हें जानकार
आपके विस्मित होने की पूरी संभावना है. इन यादों के भीतर घुसकर देखिए, शायद आपके काम का कोई ऐसा मोती
मिल जाए जिसे आप अपने पास संजो कर रखना चाहें.
कथा के सभी पात्र सच्चे हैं, नाम बदल दिए गए हैं. घटनाएं यथावत हैं,
स्थल बदल दिया गया है. कहानी इसी दुनिया की है इसलिए आपकी पहचान के किसी व्यक्ति से टकरा सकती हैं,
पढ़ते समय सतर्क रहें.
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
15 अगस्त 2018
15 अगस्त 2018
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