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लिखने का सबब

लिखने का सबब ------------------- इस कहानी का लेखक अपने जीवन के सत्तर वर्ष जी चुका. मेरे हम-उम्र देखते-देखते बच्चे से बूढ़े हो गये , अब जबरिया वापसी के लिए तत्पर हैं. कुछ तो पहले ही निकल लिए लेकिन मेरे जैसे कुछ अभी भी बचे हुए हैं जो अपने अतीत की यादों को दिल में संजोए हुए कभी आंसू बहा लेते हैं  तो  कभी मुस्कुरा लेते है. इस धरती से विदा लेते समय अब सब कुछ दिमाग में उसी तरह घूम रहा है जैसे कल की ही बात हो. फिलिम चल रही है और हम बैठे-बैठे देख रहे हैं. इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हाल में नहीं जाना पड़ता , टिकट नहीं कटानी पड़ती. इस फिल्म को न देखना चाहो तो भी देखनी पड़ती है क्योंकि ' पिक्चर ' लगातार चालू है , क्या करें , रुकती नहीं है. यहाँ सवाल यह है कि इस कहानी को वह क्यों पढ़े जो इस कहानी का पात्र है नहीं ? इस संसार में आए हर मनुष्य की कोई-न-कोई कहानी है. धरती से प्रगट होने से लेकर धरती में वापस प्रविष्ट हो जाने तक की यात्रा विकट है. इस ' बिन मांगे ' शरीर और प्राण को बचाए रखने के लिए मनुष्य को जीवन भर जुगत पर जुगत बैठानी पड़ती है. विपरीत परिस्थितियों को अपने अनु...

मध्यम मध्यम : आठ :

*आठ* मध्यमवर्गीय परिवार बेहोशी में जीते हैं. बेहोशी शब्द का प्रयोग इसलिए किया कि ऐसे परिवारों की कोई पूर्व योजना नहीं होती. इन्हें भगवान और सरकार की व्यवस्था पर अकूत भरोसा होता है. हर ख़ुशी में भगवान को ख़ुशी-ख़ुशी प्रसाद चढ़ा देते हैं और यदि कोई दुःख आया तो उसके सामने बैठकर आंसू बहा लेते है. सरकार से उम्मीद करते हैं कि वह मंहगाई दूर कर देगी, शिक्षा और स्वस्थ्य का मुफीद इंतजाम करेगी, अदालतों में न्याय फटाफट मिलने लगेगा, पुलिस सज्जनता की प्रतिमूर्ति बन जाएगी, सरकारी दफ्तरों में रिश्वत बंद हो जाएगी, रेल समय पर चलेगी, वह सुबह कभी-न-कभी तो आएगी ! ये सपने हैं, मधुर सपने, जो नींद खुलते ही टूट जाते हैं लेकिन अगली रात को जब सोते हैं और वही सपने देखते हैं और फिर से खुश हो लेते हैं. वे ये भी सोचते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ने-लिखने में तेज निकलेंगे, अच्छी नौकरी में लग जाएंगे या बड़ा व्यापार करेंगे, या इंडस्ट्री लगाएंगे और ढेर सारा पैसा कमा कर लाएंगे. ये सब दिमाग में चलता है लेकिन कार्यरूप में परिणित नहीं होता, होनी को ग्रहण लग जाता है क्योंकि सारे प्रयास सार्थक योजना और पर्याप्त अर्थ के अभाव में भ...

मध्यम मध्यम : सात :

*सात* विद्योत्तमा के पेपर्स अच्छे गये. फव्वारे वाले बड़े हनुमान जी को प्रणाम किया और मन-ही-मन कहा, 'हे बजरंगबली, इस बार मेरी नैय्या पार लगवा दो महराज. सिलेक्ट हो जाऊँगी तो नारियल के साथ सवा सेर लड्डू चढ़ाऊँगी परन्तु अभी से बता रही हूँ, लिखित में पास होने पर केवल नारियल चढ़ाऊँगी और इंटरव्यू में सिलेक्ट होने के बाद लड्डू चढ़ेगा. अभी से बताए देते हूँ, हाँ।' लौटते में विद्योत्तमा ने कमानिया गेट ने दो लीटर दूध खरीदा और घर पहुँच गयी. मम्मी बोली, 'इतना सारा दूध क्यों ले आयी?' 'रखो इसको, कुछ काम है.' विद्योत्तमा ने कहा. 'क्या काम है?' 'नहाकर आती हूँ, फिर बताऊंगी.' कहती हुई बाथरूम में घुस गयी. अचानक घर के बाहर लगी काल-बेल बजी. रज्जो ने दरवाजा खोलकर देखा, बाहर एक रिक्शावाला खड़ा था, 'विद्योत्त्मा मिश्रा का घर यही है?' उसने पूछा. 'हाँ, यही है, क्यों?' 'फ्रिज आया है, उतार रहा हूँ. बताइये, कहाँ रखना है?' रिक्शा चालक ने पूछा. रज्जो आश्चर्यचकित हो गयी, 'फ्रिज, हमारे यहाँ?' रज्जो ने खुद से पूछा. फ्रिज अन्दर आ गया. रज्जो ते...

मध्यम मध्यम : छः :

*छः* रज्जो की ज़िन्दगी चूल्हे-चौके के इर्द-गिर्द घूम कर रह गयी. इलाहाबाद की अल्हड़ लड़की अपने ब्याह के बाद एक घरेलू मशीन की तरह हो गयी. कभी समय था जब दस-बारह बच्चे भी पल जाते थे लेकिन अब चार बच्चे पालना, उन्हें बड़ा करना, पढ़ाना-लिखाना और लाइन से लगाना बहुत कठिन काम हो गया है. शुरू में लड़का हो गया होता तो ये फ़ौज न बनती, लेकिन 'एक ट्राई और' के चक्कर में चार हो गये. पुश्तैनी जायदाद के नाम पर एक पुराना घर है जो किसी भी दिन आधा हो जाएगा क्योंकि उसमें रज्जो के देवर का हिस्सा है. किसी प्रकार विद्याशंकर की खुद की दूकान हो गयी है, अभी नयी है, कुछ समय लगेगा लेकिन धीरे-धीरे जम जाएगी. ज़िंदगी भी ऐसे ही बीत रही है, कल का कुछ पता नहीं, पर भरोसा है कि धीरे-धीरे सब व्यवस्थित हो जाएगा. रज्जो की सबसे बड़ी फ़िक्र यह है कि विद्योत्तमा का क्या होगा? उसने जज बनने की ठान ली है, उसकी उम्र बढ़ती जा रही है. छोटी बहन की शादी हो गयी, बड़ी कुँवारी बैठी है. ब्राह्मणों में वैसे ही लड़कों का टोटा है, लड़की बुढ़ा जाएगी तो कौन ब्याहेगा? जज कब बनेगी? बनेगी भी या नहीं. आजकल की लड़कियां किसी की कुछ सुनती नहीं, जबरपेली मे...

मध्यम मध्यम : पांच :

*पाँच* विद्योत्तमा का सिविल जज के रूप में चयन नहीं हुआ. यह खबर उसे प्रेस में मिल गयी. खबर पढ़ते ही उसका दिल डूबने लगा. उसने खुद से पूछा, 'क्या मैं जज बनाने के काबिल नहीं?' शाम को प्रेस से छुट्टी मिली, वह अपनी दूकान गयी. उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर पापा ने पूछा, 'क्या बात है? आज बहुत उदास दिख रही है.' 'पापा, मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ.' 'अरे, कैसे?' 'क्या पता?' 'फिर?' 'अभी मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है. बाद में देखूँगी कि क्या करना है.' विद्योत्तमा ने अपनी रुलाई रोकते हुए कहा. उस रात  विद्योत्तमा  सो न सकी. प्रतियोगिता की तैयारी का परिश्रम, अखबार की नौकरी और संध्या का ब्याह उसकी बंद आँखों में तैरता रहा. बीच-बीच में आंसू बहते और उसके गाल पर लुढ़क जाते. सुबह उसकी आँखें लाल थी. मम्मी ने पूछा, 'बेटा, रात को सोयी नहीं क्या?' 'नींद नहीं आयी मम्मी.' 'क्या इतना दुःख हो गया तुझे?' 'नहीं होना चाहिए?' 'होना चाहिए लेकिन इतना नहीं होना चाहिए.' 'मम्मी, मेरा सपना टूट गया.' कहते हुए वह रो प...